तान्या अपनी सांसों में बारिश की खुशबू जज्ब करती है और एक लंबी सांस लेती है, मन का कोहरा छंटने लगता है। तान्या को अपने हिसाब से जीना है, अपनी सांसों में महक का गुलदस्ता लिए हुए। राकेश सैगल उसका पार्टनर है। अरे भाई, लाइफ पार्टनर ही सही… आदमी ठीक-ठाक है, पर उसकी सांसों में उतरने का हुनर नहीं जानता। वे दोनों एक साथ रहते हुई भी अलग-अलग दुनिया के वासी हैं। राकेश और तान्या ही क्यों, दुनिया के तमाम पति-पत्नियों के हालात कुछ ऐसे ही हैं। अरे यार! मुझे तो बारिश के बारे में बातें करनी थीं, पर यहां तो कुछ और ही बात कर रही हूं मैं। जहां नहीं जाना चाहिए वहीं तो दुनिया की आधिकतर औरतें जाती हैं, इसीलिए तो गम के साए में उदास सूरतों का कुनबा लिए अपनी किस्मत का रोना रोती रहती हैं… चलो इस बात को यहीं छोड़ती हूं और बारिश की बात करती हूं। दुनिया के तमाम मौसमों में बारिश सबसे बेहतरीन मौसम है मेरे हिसाब से और जब बात बारिश की हो रही हो तो मैं कहूंगी कि यह शहर बारिशों का है, जहां बादल हंसते हैं और बिजलियां नृत्य करती हैं। और तो और यहां के पहाड़ जो हर मकान की खिड़की से ताका-झांकी करते रहते हैं उनके चेहरों पर शायरी चस्पां रहती है। यह शहर सिलीगुड़ी, अपनी तबियत में आशिकी लिए हुए पहाड़ों, जंगलों और दरख्तों में कुछ ऐसे भटकता है जैसे कभी मजनंू भटका करता था लैला की चाहत में।
पिछले चार दिनों से बारिश लगातार गिर रही है… बिजली के तारों पर बूंदों की कतारें कुछ ऐसे चलती हैं जैसे लेफ्ट-राईट के सुर में उन्हें आदेश दिया जा रहा हो। सामने वाले घर की खिड़की के शेड में कबूतर, मैना, गौरैया की भीड़ बारिश रुकने की प्रतीक्षा में ऐसे खड़ी है जैसे यह खिड़की कोई चौराहा हो और सब रिक्शे के इंतजार में हों। पंखों से पानी झटकती गौरैया तान्या को किसी अल्हड़ लड़की की तस्वीर जैसी लगी… तान्या ने इन चार दिनों में गजलें सुनी, चाय-समोसों का दौर चलाया और बारिश की महक को अपने दिल में जज्ब करती रही, पर अब बहुत हो गया, उसे बाहर जाना है और बारिश की अल्हड़ मस्ती में डूब जाना है। उसने राकेश से कहा- ‘आज संडे है न, चलो सेवक तक चलते हैं गौतम रेस्तरां में बैठ कर मौसम का मजा लेंगे।’
‘अरे यार! बारिश कितनी तेज है, ऐसे में मुश्किल होगी गाड़ी ड्राइव करने में।’ राकेश ने कहा था।
‘बारिश रुक गई तो क्या खाक मजा आएगा?’ तान्या ने नाराजगी दिखाते हुए कहा था।
‘तुम औरों से इतनी अलग क्यों हो तान्या!’ राकेश ने कहा था।
‘तुम्हें नहीं चलना तो साफ-साफ बोलो, मैं खुद चली जाऊंगी। तुम तो जानते हो सेवक के जंगलों के रास्ते से गुजरना…।’ उसने तरकश से वह तीर छोड़ा, जो राकेश के दिल में सीधे जा लगा। अब तो न की गुंजाइश ही नहीं थी। तान्या तैयार होने चली गई। जब लौट कर आई तो टाइट जींस और खुले गले का टॉप पहन रखा था। उसकी खूबसूरत आंखें काजल और मस्कारे में गजब ढा रही थीं। उसकी गोरी और चमकीली रंगत पर डार्क ब्राउन लिपस्टिक और कंधों तक झूलते बाल ने उसके व्यक्तित्व को मनमोहक बना दिया था। राकेश ने उसे देख कर सीटी बजाई और ड्राइविंग सीट पर जा बैठा था। तान्या उसकी बगल वाली सीट पर जा बैठी। सड़क गीली और फिसलन भरी थी इसलिए राकेश का पूरा ध्यान ड्राइविंग पर था और तान्या सेवक के रास्ते से गुजरती सड़क के दोनों तरफ के घने जंगलों में खोई शेर, हाथी और हिरणों के काल्पनिक चित्र उकेरती लंबे और घने दरख्तों के बीच फंसे स्याह अंधेरों में बारिश की बूंदों का तेजी से गिरना देख रही थी। बारिश रुक-रुक कर हो रही थी। बादल जब लंबे दरख्तों के ऊपर मंडराते हैं तो लगता है जंगलों का नजारा देख कर वापस आसमान में अपने घर लौट रहे हों। गाड़ी के सीडी प्लेयर पर जगजीत सिंह गजल गा रहे थे- तेरे आने की जब खबर महके…’। राकेश को ड्राइविंग करने में दिक्कत महसूस हो रही थी… सड़क पर पानी की वजह से फिसलन बहुत थी, उसे तान्या पर खीझ हो रही थी… वह सिर्फ तान्या की जिद की वजह से घर से बाहर निकला था, वरना इस मौसम में घर पर बैठ कर बीयर पी रहा होता।
तान्या जब बच्चों की तरह उछल-उछल कर तालियां बजाती है तो उसे बड़ी हैरत होती है कि पता नहीं क्या देख लेती है वह इन पहाड़ों और जंगलों में। बेहद जिद्दी है तान्या। उसने तान्या को तिरछी निगाहों से देखा। बरसात पूरी कायनात को कुछ यों खूबसूरत बना रही थी कि आदमी पूरी तरह मस्ती में डूब जाए। उसे लग रहा था कि तान्या ने ठीक ही किया, वरना इतना प्यारा नजारा कहां देखने को मिलता… बादल, बारिश, पहाड़ और दरख्त, सबने मिल कर समां बांध दिया है। यकायक उसने गाड़ी को ब्रेक लगाया और तान्या से बोला- ‘लो आ गया डेस्टिनेशन- तुम्हारा आधुनिक ढाबा। हवा में तरह-तरह के पकवानों की मिली-जुली खुशबू तैर रही थी और चहल-पहल के बीच जिंदगी पूरी रफ्तार से दौड़ रही थी। वे दोनों गाड़ी से उतरे और ढाबे की कोने वाली सीट पर जा बैठे। तान्या उस चेयर पर बैठी थी, जहां से सामने बैठी भीड़ का नजारा ठीक-ठीक दिखाई दे। सामने के ऊंचे पहाड़ों पर लंबे-लंबे दरख्तों का काफिला था, जिनके बीच से बादल ऐसे गुजर रहे थे जैसे दरख्तों ने सिगरेट पीकर धुआं उगला हो। वह और भी बहुत कुछ देख रही थी- सामने लकड़ी के मकानों का झुंड और उनकी छोटी-छोटी खिड़कियों से घर के भीतर का दृश्य। लकड़ी के आलने यानी खूंटियों पर करीने से टंगे कपड़े, छोटी चारपाइयां और आलमारियां… छोटी-सी रसोई में चमचमाते हुए स्टील के बर्तन, रसोई के लिए जरूरत के सामान।
यह जगह बिलकुल ‘लैंस डाउन’ जैसी दिखती है उसे। पौड़ी गढ़वाल का एक पहाड़ी कस्बेनुमा खूबसूरत शहर, जो उसकी यादों में शिद्दत से रहता है। कभी उस शहर में उसके पापा की पोस्टिंग थी और वह अपने छोटे से परिवार के साथ वहां रहा करती थी।
तान्या इस दृश्य में डूबी खुशी से चहकती हुई बोल पड़ी- ‘वाऊ वाट अ ब्यूटिफुल सीन… लुक राकेश। उसने राकेश को साथ लेना चाहा, पर वह था कहां? बीयर और सिगार के धुएं में डूबा हुआ नींद की हल्की-सी खुमारी में।
तान्या ने आर्डर लेने आए बेयरे को खुद ही खाना आर्डर कर दिया- ‘स्नेक्स में प्याज के पकौड़े और दो कॉफी लाओ और फिर एक घंटे बाद लंच में रोहू मछली और भात। तान्या जानती है- रोहू मछली को पकाने का ढंग यहां अलग है। सरसों के कच्चे मसाले और दही में पकी मछली का स्वाद उसके उत्तर प्रदेश की रोहू मछली से बहुत अलग है। हां एक बात और, मछली-भात के मेनू में सिर्फ मछली-भात नहीं होता। दो तरह की सब्जी… सूखी और तरी वाली, छौंक वाली दाल और नीबू-प्याज, खीरे और गाजर का सलाद भी। उसे बेहद पसंद है यह खाना।
जल्द ही कॉफी और पकौड़े की प्लेट लिए आ गया था वह लड़का, जिसने आर्डर लिया था। तान्या ने राकेश को मुश्किल से जगाया और उसकी कॉफी और पकौड़े की प्लेट उसकी और बढ़ा दी। वाकई बेहद स्वादिष्ट हुआ करते हैं यहां के पकौड़े, झाग वाली कॉफी भी कम लाजवाब नहीं होती।
तान्या पकौड़े खाते हुए भी सामने के लकड़ी के मकानों की खिड़की से इन पहाड़ियों की घरेलू जिंदगी को देख-परख रही थी और उसे अतीत का वह शहर याद आ रहा था। साथ ही हरीश ढोलकिया भी, जिसके पापा के साड़ियों की दुकान उस शहर में खूब फेमस थी। हरीश की वजह से ही वह राकेश को अब तक समझ पाने में नाकाम साबित हुई थी। तब वह दसवीं में थी और हरीश बारहवीं में। वह जब उसे देखता, एक खूबसूरत स्माइल उसके होंठों पर चस्पां होती। बाजार में आते-जाते उसकी दोस्ती हरीश से हो गई। फिर तो वह स्कूल में भी उसके आसपास मंडराता रहता। धीरे-धीरे यह दोस्ती इतनी बढ़ी कि वह तान्या के दिल में कहीं गहरे बैठ गया। एक-दूसरे के साथ जीने की चाहतें लिए वे बार-बार मिलते, पर जिंदगी बेहद बेरहम हुआ करती है, वह इंसान को उसके हिसाब से जीने नहीं देती।
दो साल बाद जब पापा का ट्रांसफर हुआ तो तान्या को वह जगह छोड़नी पड़ी और हरीश का साथ भी। हरीश ब्याह की बात सोचने लायक भी नहीं था और न तान्या की इतनी औकात थी कि वह पापा से कुछ कह सके। वहीं से हरीश उसके लिए एक मीठी याद बन कर रह गया।
वह लाख चाहे कि हरीश को अतीत के तहखाने में बंद कर देना चाहिए, पर हर बार वह राकेश और उसके बीच आ जाता है। आज फिर हरीश की याद उसे शिद्दत से आ रही है और उसकी आंखें भर रहीं हैं। यकायक राकेश की तेज आवाज उसके कानों में पड़ी ‘कहां हो यार! खाना ठंडा हो रहा है।’ वह अपने अतीत से वर्तमान में लौट आई। सामने गरमागरम माछ-भात, दो तरह की सब्जी, दाल तड़का और सलाद की प्लेटें सजी हुई थीं। तान्या की भूख खाना देखते ही बढ़ गई। दोनों पूरी तबियत से खाना खाने लगे। ‘लाजवाब!’ तान्या के मुंह से निकला, तो राकेश ने भी उसकी हां में हां मिलाई- ‘वाकई बेहद स्वादष्ट बनी है मछली।’
उन्होंने महसूस किया कि ढाबे के बेसमेंट से शोर-गुल की काफी आवाजें आ रहीं हैं, तभी बेयरे ने बताया था कि भीतर किसी की मैरेज एनिवर्सरी की पार्टी चल रही है। वे दोनों अगर चाहें तो ज्वाइन कर सकते हैं, बशर्ते उन लोगों को एतराज न हो, क्योंकि उनका खर्च ढाबा अपनी ओर से देगा। यह इस ढाबे का नियम है, जिसकी वजह से पार्टियों की रौनक बढ़ जाया करती है। तान्या ने सोच लिया था कि आज उसे भी डांसिंग फ्लोर पर उतरना है और थोड़ी-सी शैंपेन लेनी है। पर कुछ देर बाद, क्योंकि उसने अभी-अभी लंच लिया है।
तान्या फिर से एक बार सोचों की बंद हवेली में। उसकी शादी को दस साल हो गए हैं, पर अभी तक वह मां नहीं बन सकी। उसे अकेलापन खाने को दौड़ता है, उदासी उसके भीतर घर करने लगी है। इसीलिए तो वह इतना हंसती है… हरीश न जाने कहां होगा? यादों का पारा छलक रहा है। लैंस डाउन की यादें ही उसे पहाड़ों तक खींचती हैं और स्मृतियों के जरिए वह सुकून का पल तलाशती फिरती है।… उसके अंदर उदासी का एक कुआं है, इसीलिए तो इतना हंसती है। राकेश से उसके रिश्ते में एक अजनबीपन का अहसास आज भी है।
उसे फूल बहुत पसंद हैं। वह अपनी उदासी के बीजों को गमले में लगा कर उसे फूलों में बदल देती है। उसकी फ्लावर शॉप बहुत फेमस है सिलिगुड़ी में। गमलों में लगे फूलों के साथ कस्टमर तान्या की हंसी मुफ्त में अपने घर तक ले जाते हैं और फ्लावर शॉप की इस मालकिन को आंखों में बिठा कर अपने दिल में कहीं न कहीं जगह दे ही देते हैं। सोचों से घिरी तान्या के कानो में बेसमेंट से आती आवाजें धूम मचाने लगी हैं। उसे कोई आवाज बुला रही हो जैसे… हे…हे… कम… कम, एन्जॉय द पार्टी। तान्या उस आवाज की ओर खिंची चली गई और डांस में शामिल हो गई। वेस्टर्न डांस का अच्छा तजुर्बा है उसे। वह उस गीत की धुन पर थिरकने लती, जो बेसमेंट के हल्के उजाले में नशा घोल रहा था।
मस्ती के आलम में डूबी तान्या को एक चेहरा ऐसा नजर आया, जो उसे हरीश की याद दिला रहा था। उसने उस लड़के को डांस के लिए आमंत्रण दिया। वे दोनों फ्लोर पर पूरी मस्ती के साथ थिरक रहे थे। उसे लग रहा था कि वह हरीश के साथ है। वह उस लड़के के इतने करीब है कि दोनों की सांसें एक-दूसरे को छूने लगी हैं… एक कोहरा छंट रहा है, एक समय फिर से उसकी मुट्ठी में आ रहा है… उसे लगा, वह गौतम रेस्तरां के बेसमेंट में नहीं, बल्कि लैंस डाउन के पोस्ट आॅफिस वाले चौराहे पर उस चाट की दुकान में है, जहां वह हरीश के साथ समोसे और आलू टिक्की खाया करती थी और कभी-कभी उस शॉप के बेसमेंट में चल रही डिस्को पार्टी में शामिल हो जाती थी।
तान्या नीम बेहोशी में उस लड़के के कान में फुसफुसाई… हे हरीश… आय लव यू यार… आय ऐम डार्इंग।… और वह लड़का तान्या से चिपक कर मजे ले रहा है… सारी सीमाएं तोड़ने पर आमादा है कि तभी तान्या का एक करारा थप्पड़ उसके गालों पर पड़ा। वह दहाड़ उठी… ‘हाउ डेयर यू… आय विल किल यू मिस्टर…। शायद वह नींद से चेतन अवस्था में आ गई थी और पछतावे से भर कर जोर-जोर से रोने लगी थी।
राकेश ने उसके रोने की आवाज सुनी तो बेसमेंट की ओर गया। तान्या को इसके पहले उसने इतना परेशान कभी नहीं देखा था राकेश ने। तान्या को पुचकारते हुए वह उसे बाहर ले आया। तान्या खामोश थी। तान्या की चुप्पी दरअसल उसकी शर्मिंदगी थी। वह सोच रही थी कि वह कब तक ख्वाबों में जिएगी।… राकेश उसके सिर पर हाथ फेर रहा था, उसे इतने प्यार से निहार रहा था कि तान्या के भीतर अपराधबोध जन्म लेने लगा। उसे राकेश की आवाज सुनाई दे रही थी- ‘हे तान्या, खामोश मत रहो यार। तुम चीखती-चिल्लाती ही अच्छी लगती हो मुझे। बताओ न क्या हुआ था वहां… अच्छा छोड़ो, ऐसी बातों को कभी मत याद करो, जो तुम्हें दुख देती हैं… माय लव… माय स्वीट-स्वीट डार्लिंग… मैं हर वक्त, हर गम में तुम्हारे साथ हूं… चलो पहले गरमागरम कॉफी पीते हैं।…’
तान्या के चेहरे पर वही हंसी खिल गई, जो बरसों बाद अंधेरे को चीर कर नरम धूप बन कर लौटी थी। बैरे ने दो कप झाग वाली कॉफी उन दोनों के सामने लाकर रख दी थी। तान्या राकेश को ऐसे देख रही थी जैसे पहली बार मिली हो। सामने पहाड़ों पर बादल मंडरा रहे थे। …बारिश फिर आएगी, लेकिन अब हरीश को वह कभी नहीं आने देगी अपने और राकेश के बीच। इस सोच ने उसे सुकून से भर दिया था। उसे महसूस हुआ कि उसके भीतर के जंग लगे तमाम ताले खुल गए हैं… और उसके पास की चीजें खुशी से चीख-चिल्ला रही हैं- कुर्सी-टेबल, प्लेट-चम्मच यहां तक कि वहां की सारी की सारी भीड़ सिर्फ और सिर्फ उसके इशारे पर नाच रही है। पूरा का पूरा दृश्य उसके साथ ठहाके लगाने को आतुर है। उसने देखा, ढाबा हंस रहा है। चूल्हे में जलती आग के चेहरे पर नारंगी रंगों वाली हंसी है। सब के सब उसे ही पुकार रहे हैं- हे तान्या फॉरगेट द पास्ट, वी आर योर्स… ओनली योर्स…माय स्वीट तान्या… लाइफ इज वेरी ब्यूटिफुल।… तान्या ने धीरे से अपना सिर राकेश के कन्धों पर रख दिया और मुस्करा उठी। (रंजना श्रीवास्तव)

