अजीब-सी कशमकश है

भीड़ में अकेला आदमी तल्लीन है
कल और कल के लिए
एक युद्ध के लिए भी,
जो कि अघोषित है

प्रक्रिया के बीच तड़पता
जहां पंच कोई और परिणाम कोई
एक धनबाद के कोयला खदान का मजदूर
वहीं ईराक की विधवा का जवान हुआ बेटा
और गंगा किनारे बैठी
कफन बेचने वाली औरत
सबके सब परिणाम ही तो हैं
युद्ध की विभीषिका की प्रक्रिया के बीच के
जो अघोषित माना गया है अब तक

स्तूपों में शांति अपना राग गा रही है
कैसा है यह निर्गुण, जिसे काल की आहट है
संसार को धकेल कर ज्वालामुखी के मुख में
तुम तो योग में तल्लीन हो गए हो विश्व
देखो न उस पेड़ की जटाएं,
वह भी हिला कर अपना हाथ
अपनी उपस्थिति का अहसास भर रही है शायद

घोषणा से डर लगता है मुझे
चाहती हूं रह ही जाए वह फाइल विचाराधीन।

बेबसी:

धीरे-धीरे बढ़ते कदम
और सरकती जिंदगी
कैंची से कटी पेट को जाती नली
जहां पखाल भात गया था कुछ दिन पहले
उठती गिरती सांसों के बीच
ताकता गया वह

मैं जीना चाहता हूं दीदी जिंदगी
दौड़ना चाहता हूं रांची से चाईबासा
भाग कर स्कूल देखना बेटे का
और बेटी की डोली के साथ चलना
बहुत कुछ करना भी तो है
मगर बोलता कैसे
मेरे कांपते अधूरे शब्द
आवाज ऐसे घुटती रही
मानो कैंची मेरी थी
और कटा मेरा स्वर!

एक कविता गांव वाली:

गांव में धूप है
गांव में रौशनी है
गांव में धरती है
उसमें हैं कुछ लत्तरदार झिंगनी
कुछ गोभी के पौधे
इस बार भी हैं

गांव में है स्कूल
एक मास्टर साहब हैं
जो रोशनी धूप पर कविता पढ़ाते हैं
लंबाई चौड़ाई को गुणा कर दो
क्षेत्रफल निकलता है
गिरवी रखे हैं कागज
वे अंधेरे में हैं
गांव में अंधेरा भी है

गांव में है एक बस स्टैंड
जहां से दिल्ली के लिए निकलती है बस
वहां जमा हैं कुछ विद्यार्थी
कार्बन कॉपी लिए उन कागजात की
रवाना होते अपने भूत को बचाने
नेताओं के शहर
भूलभुलैया में समय बीतता जाएगा
बची रहेगी साथ में एक कविता
गांव वाली।

(निवेदिता झा)