गौरव वाजपेयी ‘स्वप्निल’
मेरे प्यारे दादा जी
जीते जीवन सादा जी।
कहते- करो अगर तुम कोई-
सदा निभाओ वादा जी।

पढ़ने की तुम आदत डालो
रोज पढ़ो इक नई किताब।
देखो समझो जानो सीखो
बनो महकते हुए गुलाब।
उनकी सीख गुना करता हूं
मैं ज्यादा से ज्यादा जी!

कभी कहानी कहें सुनाएं
कभी मनोहर सी कविता।
कभी बताते सूरज को ही
कहते हैं दिनकर सविता।
उनके पास बैठ मन करता
और बताएं दादा जी!

अंक नहीं बस ज्ञान सदा ही
उन्नति का पैमाना हो।
जो भी देखो समझो सीखो
रहे न कुछ अनजाना हो।
जी! दादा जी! पढ़कर सीखूं
अपना यही इरादा जी!