दिव्या विजय

मधुसूदन जी को रिटायर हुए करीब छह महीने हो गए हैं, पर उनकी दिनचर्या में कोई अंतर नहीं आया है। उसी चुस्ती-फुर्ती से रोज का काम निबटाते और दस बजते-बजते स्कूटर उठा कर निकल पड़ते हैं। उनका कहना है निठल्ले बैठे रहने से शरीर को जंग लग जाता है। इसलिए अपने कल-पुर्जे चालू रखने का इंतजाम उन्होंने कर लिया है। बैंक में क्लर्क की नौकरी से रिटायर हुए हैं मधुसूदन बाबू। छोटा-सा शहर। कौन ऐसा है, जो उन्हें नहीं जानता। उनकी कर्मठता के चर्चे शहर भर में होते हैं। उन-सा ईमानदार और मेहनती इस शहर में बिरला ही होगा। लोग अपने बच्चों को उनकी मिसाल देते हैं। अपने काम में इतने माहिर कि मजाल है, हिसाब में कोई गलती रह जाए। इसलिए रिटायर होते ही बहुत-से लोग उन्हें अपने यहां बुलाने के लिए लालायित थे। एक-दो कोचिंग इंस्टिट्यूट ने तो उन्हें अपने यहां एकाउंट्स पढ़ाने तक का ऑफर दे डाला। इतने अनुभवी और उद्यमी व्यक्ति की आवश्यकता सबको थी, पर मधुसूदन बाबू सबको एक-सा जवाब देते, ‘इतने साल सरकार की चाकरी कर ली। अब कुछ हजार रुपल्ली की खातिर अपनी आजादी नहीं दूंगा। यही तो समय है अपने मन की करने का।’

हां, यह बात अलग है कि यहां उनका और पत्नी का मन अलग पड़ गया। जहां पत्नी बरसों से प्रतीक्षा कर रही थी कि मधुसूदन बाबू रिटायर होंगे तो उन्हें समय देंगे। उन्होंने मंसूबे बांध रखे थे कि अब वे सुबह की सैर पर साथ जाएंगे, रिश्तेदारों से मिलना-जुलना करेंगे, तीर्थ-स्थलों के दर्शन को निकल पड़ेंगे। इतने सालों में लाख चाहने पर भी ऐसा नहीं हो पाया था। वे देर रात तक अपनी फाइलों में उलझे रहते, सुबह उठते ही फिर वही फाइलें, दिन भर दफ्तर। बाकी कामों के लिए समय निकल ही नहीं पाता। कई बार तो खाना भी कंप्यूटर या फाइल में सिर घुसाए-घुसाए खाते। रिश्तेदारों के काम हों या बच्चों के, सब बरसों-बरस वे अकेली निपटाती रहीं। वे सोच रही थीं कि जिस साथ का उन्हें इंतजार था वह अब मिलेगा, पर उन पर घड़ों पानी फिर गया जब मधुसूदन बाबू ने सेवा-संगम में अपनी सेवाएं देना तय कर लिया।

सेवा-संगम एक गैर-सरकारी संस्था है, जो बहुत-से क्षेत्रों में पिछड़े और कमजोर वर्ग के उत्थान के लिए काम कर रही है। मधुसूदन बाबू ने सोचा कि क्यों न यहीं काम किया जाए। पैसा तो इतने सालों में जरूरत भर का कमा लिया। अब कुछ समाज सेवा भी कर ली जाए। तो, वे पहुंच गए सेवा-संगम के दफ्तर। उधर सेवा-संगम वाले भी उन्हें देख कर गदगद। हाथों-हाथ लिया उन्हें। इतना सत्कार पाकर मधुसूदन बाबू तो फूले न समाए। नौकरी में रहते सारा आदर-सत्कार नौकरी की बदौलत होता है, लेकिन उसके बाद जो सम्मान मिलता है वह व्यक्ति के रूप में मिलता है। उनकी इच्छा जानते ही संस्था वालों ने कहा, ‘हमें भी अपने अकाउंट संभालने के लिए कोई चाहिए था। आपसे बेहतर हमें कौन मिल सकता है।’

सुन कर मधुसूदन बाबू खिल उठे। ‘कहिए, कब से आऊं?’
‘आपका दफ्तर है, जब चाहें आएं। न हो तो आज ही से शुरू कर दें।’ कहते हुए सामने वाला व्यक्ति अपनी कुर्सी छोड़ कर खड़ा हो गया।
‘अरे आप क्यों खड़े हो गए। आप बैठिए। आज तो संभव न होगा। कल से आता हूं।’ वे भाव-विभोर थे।
‘अरे साहब, आपका जब मन हो आइए, जब मन न हो न आइए। यह तो सेवा है। मन से होगी। आप पर कोई बंदिश थोड़े ही है।’ उसकी मुस्कराहट से मधुसूदन बाबू का मन हिलोरें ले रहा था।
‘लेकिन आपकी सेवा का कोई शुल्क हम नहीं दे सकेंगे।’ कुर्सी वाले व्यक्ति ने झिझकते हुए कहा।
‘जी, जी जानता हूं मैं। इसीलिए यहां आया हूं। सेवा का मूल्य चाहिए होता तो यहां कतई न आता। आप निश्चिंत रहिए।’ वह सामने वाले की झिझक खत्म कर देना चाहते थे।
‘तो ठीक है। कल से यह कमरा आपका हुआ।’

मधुसूदन बाबू मिठाई लेकर घर पहुंचे तो पत्नी सिल्क की साड़ी में लिपटी तैयार बैठी थी। ‘कहां लगा दी इतनी देर? कबसे इंतजार कर रही हूं।’ उनके हाथ में मिठाई का डब्बा देख कर वे खीज गर्इं। ‘यह मिठाई क्यों। अभी मुंडन-संस्कार में जाना है। मीठा तो वहां भी होगा।’ उनके भांजे के बेटे का मुंडन था। मधुसूदन बाबू को उन्होंने पहले ही कह दिया था कि आज देर नहीं होनी चाहिए। उनका क्या, वे तो पुरुष हैं। औरतों के बीच बैठ कर ताने तो उन्हें सुनने पड़ते हैं। यही सब सोच कर उन्हें कोफ्त हो रही थी। ऊपर से यह मिठाई। इस उम्र में ज्यादा मिठाई पचती नहीं। फिर बांटते रहो धोबी और सफाई वाली में। अब रिटायर हो गए हैं। इतने खुले हाथ से खर्चा करेंगे तो कैसे चलेगा। पर ये कुछ समझें तब न।

‘अरे यह मिठाई मेरी दूसरी पारी शुरू करने की है। लो खाओ।’ कहते हुए उन्होंने मिठाई पत्नी के मुंह में ठूंस दी और बेटे को फोन लगा दिया।
सारी बात सुन कर बेटे की वही प्रतिक्रिया थी, जो किसी भी फरमाबरदार बेटे की होती। उधर से आवाज आई, ‘पापा, क्यों इन चक्करों में पड़ रहे हो। घूमो-फिरो, आराम करो। कमाने के लिए मैं हूं न।’ बेटे को इतनी चिंता करते देख मधुसूदन बाबू मन ही मन मुस्कुराए, ‘अरे नहीं बेटा, पैसे कमाने के लिए नहीं, स्फूर्ति रहती है मन और शरीर में। तुम चिंता मत करो।’
सुन कर पत्नी भुनभुनार्इं, ‘लेना एक न देना दो। न पैसे मिलेंगे, वक्त जाएगा सो अलग। क्या जरूरत है वहां जाने की।’ ‘भई, हर काम पैसे के लिए थोड़े न होता है। कुछ काम मन की खुशी के लिए भी होते हैं। और कौन-सा बंध गया हूं। तुम्हारा जब मन हो रोक लेना। नहीं जाऊंगा।’ कहते हुए उन्होंने मिठाई का दूसरा टुकड़ा उठा लिया।

मगर यह सिर्फ कहने की बात थी। वह दिन था और आज का दिन है। मधुसूदन बाबू को सेवा-संगम का काम ऐसा रास आया कि फिर वे किसी के रोके नहीं रुके। आंधी हो, तूफान हो या जलजला ही क्यों न आ जाए, वहां जाने से उन्हें कोई ताकत नहीं रोक पाती। तबियत खुद की खराब हो या पत्नी की, कहीं जाना हो या बेटा छुट्टी पर घर आया हो, उनकी पहली प्राथमिकता थी सेवा-संगम। सिनेमा का कार्यक्रम बनता तो या तो टिकट बर्बाद हो जाते या उनके बगैर सबको जाना पड़ता। खुदा न खास्ता कभी मेहमान आ जाएं तो उनके इंतजार में ऊंघने लगते। अब तो खैर किसी ने आना ही बंद कर दिया है। होली जलाने के लिए अब कॉलोनी में उनका इंतजार नहीं किया जाता। चंदा इकट्ठा करने के लिए उन्हें कोई बुलाने नहीं आता। दफ्तर से लौट कर शाम को होने वाली बैठकों ने दम तोड़ दिया है। सबको पता है मधुसूदन बाबू अब व्यस्त रहते हैं। जो बात लोग समझ नहीं पाए वो यह कि मधुसूदन बाबू ऐसा क्या काम करते हैं, जिसमें नौकरी से भी अधिक व्यस्तता रहती है।

इधर सेवा-संगम से फोन आए, उधर मधुसूदन बाबू झट हाजिर। अलादीन का जिन्न हो गए हैं वह उनके लिए। ‘आता हूं अभी थोड़ी देर में, बस मैं अभी आया’, सुनते-सुनते सब जान गए हैं कि इस अभी की मियाद निश्चित नहीं है। अमूमन यह उनके अंदाजे से ज्यादा ही निकलती है। अब मधुसूदन बाबू भी क्या करें। बतरस का जो मजा सेवा-संगम में है, वह घर में कहां। घर में अकेली पत्नी, सेवा-संगम में इतने सारे लोगों का जमघट। और सिर्फ लोग ही नहीं, असल बात तो वहां मिलने वाले सम्मान की है। यों सम्मान उन्हें हमेशा मिला, सबसे मिला पर यहां कुछ था जो अलग था। अभी तक उनके जीवन में घटी बातों से कुछ अलग। बैंक में उन्होंने हमेशा किसी के अधीन काम किया, लेकिन इस ब्रांच के तो वे सर्वेसर्वा हो चले थे। मजाल है उनसे पूछे बिना कोई काम हो जाए। सब जगह उन्हीं की पुकार, उन्हीं की हांक। नोटों के बंडल तिजोरी में और तिजोरी की चाबी उनके पास। बैंक की चेकबुक, पासबुक सब उनके पास। कोई जलसा हो उनके हस्ताक्षर, कोई बिल पास होगा उनकी हामी पर। बाहर कहीं जाना हो तो मधुसूदन बाबू हाजिर, अपने शहर से संस्था की नुमाइंदगी करनी हो तो वे हैं ही। वे आए तो थे एकाउंट्स संभालने, पर धीरे-धीरे सब संभाल लिया। बाकी लोग भी मजे में। न कोई काम, न गड़बड़ी होने पर उनकी जिम्मेदारी। वे लोग पूरी तनख्वाह उठाते और आराम करते। इधर मधुसूदन बाबू बेगार करते। मगर उनको तो यह बेगार न लगती। बदले में जो उन्हें मिल रहा था उसकी बराबरी तो दुनिया की कोई मुद्रा न कर पाती। शक्कर में पड़ी चींटियों-सी उनकी हालत थी। वे और उनका सेवा-संगम। सब मीठा-मीठा महसूस होता।

पत्नी के अरमान, अरमान ही रह गए। वह मधुसूदन बाबू को देख-देख कर कुढ़ती रहतीं। उनकी जिंदगी तो तब भी ऐसी, अब भी ऐसी। बस एक फेसबुक भर का बदलाव था। अब वही उनके अकेलेपन का साथी हो चला था। वे उसी से अपना मन बहलातीं। लेकिन थोड़े दिनों बाद फेसबुक जले पर नमक छिड़कने लगा। सेवा निवृत्त दूसरे लोगों को देखतीं तो तीर उनके सीने से आरपार हो जाता। कोई अपने घर की छत को बगीचे में बदल रहा होता, कोई बीवी के साथ मंदिरों के बहाने पहाड़ की ठंड में, कंबल में दुबक पुरानी बातें याद कर रहा होता। किसी घर में मियां-बीवी के ठहाके गूंजते तो कोई बीवी की फरमाइश पर कच्चे-पक्के चावल बना कर खिला रहा होता। लेकिन उनके पति… वे अब भी रात गए तक फाइलों में सिर खपाए रहते। सुबह उठते ही फिर वही सब। जाने कैसी-कैसी फाइलों का अंबार लग गया था घर में। श्रीमती जी का काम और बढ़ गया था। घर का काम कम था, जो फाइलों को सहेजने-समेटने का काम और गले आ पड़ा। जिधर देखो उधर फाइलें।

उम्रदराज होते जाना बड़ी टेढ़ी शय है। खासकर घर में प्रतीक्षारत स्त्रियों पर उम्र भारी बीतती है। अच्छे दिनों की प्रतीक्षा में झींक-झींक कर मधुसूदन बाबू की पत्नी दुबला गई थीं। कब उन्हें जटिल रोगों ने आ जकड़ा वे जान नहीं पार्इं। कभी चलते-चलते चक्कर आ जाता, तो कभी घर का काम करते हुए सांस धौंकनी की तरह चलने लगती। सर अलग दर्द से फटा रहता। फिर भी मरने से पहले तक अपने कर्मों से विमुख न होने वाली भारतीय स्त्री की विशिष्टता से लैस वे अपने काम निबटाती जातीं। अगले हफ्ते बेटा आने वाला था। उसके साथ डॉक्टर के जाएंगी। बड़ी भाग्यशाली हैं। पति न सही, बेटा उनका बहुत खयाल रखता है। पिछले हफ्ते अपने एक डॉक्टर दोस्त को भेजा था। घर पर ही चेकअप हो गया। अस्पताल की लंबी लाइन से छुटकारा मिला। उसने कुछ टेस्ट लिखे थे। उसी के लिए बेटा लंबी छुट्टी लेकर आ रहा है। कह रहा था, ‘मां, हम एक साथ वक्त बिताएंगे और आपके टेस्ट भी हो जाएंगे।’

सुन कर उन्होंने उलाहना भरी दृष्टि से मधुसूदन बाबू को देखा, पर वह तो प्रसन्नचित्त, बिना किसी ग्लानि के अपने काम में डूबे थे। वाहवाही का ऐसा भी क्या लोभ कि अपने जीवन-साथी का सुख-दुख बिसरा दिया जाए। दूसरे लोगों का साथ क्या आधा अंग मानी जाने वाली पत्नी को भी विस्मृत कर देता है। पत्नी को पहले तो क्रोध आया, फिर एक गहरी उदासी उनके मन पर चस्पां हो गई। सामने बैठा पुरुष जिसे वह अपना मानती आई हैं, क्या वह सचमुच उनका अपना है। इतने सालों में आपस में उन्होंने कितने शब्द कहे होंगे? कितना समय सिर्फ एक-दूसरे के साथ बिताया होगा? वे अपलक उन्हें देखती रहीं। उनकी दृष्टि मधुसूदन बाबू के होंठों पर अटक गई। वहां मंद हास था। औंचक ही उनका मन नए तरह के भाव से भर गया। कैसी उत्फुल्लता है उनके चेहरे पर, अपने मन का काम कर सकने की संतुष्टि भी। वे स्वयं न सही, पर मधुसूदन बाबू तो अपने मन का जीवन व्यतीत कर रहे हैं। वे क्यों रोड़ा बनें इसमें? सांझ की दहलीज पर आ ठहरे जीवन में किसी एक के जीवन में पुलक शेष है, तो उन्हें अधिकार नहीं कि वे उसे अपनी अपेक्षाओं की भट्टी में झुलसा दें। वे एकाएक उदार हो चली थीं। हर प्रकार के द्वेष से मुक्त हो उन्होंने अपने मन में उनके लिए आशीर्वचन पढ़े। उन्होंने खुद से वादा किया कि मधुसूदन बाबू से झगड़ना एकदम बंद। वे करें अपना काम, वे कुछ नहीं कहेंगी। न बन पाए हों मधुसूदन बाबू उनके मन के साथी, वे स्वयं तो कभी अपने कर्तव्य से विमुख नहीं हुर्इं। यह बात उनकी संतुष्टि के लिए पर्याप्त है। सोचते हुए भीषण सिरदर्द के बावजूद वह मुस्कुरा दीं।

अगली सुबह मधुसूदन बाबू जल्दी-जल्दी अपने काम निबटा रहे थे। आज संस्था के क्षेत्र प्रमुख आने वाले हैं। वे रोज से अधिक उत्साह में थे। वे जल्द-से-जल्द सेवा-संगम पहुंच कर सारे इंतजाम परख लेना चाहते थे। वे नहीं चाहते कि कोई कमी रह जाए। क्षेत्र प्रमुख फोन पर कह रहे थे उनकी काफी तारीफ सुनी है। वह इन तारीफों को झुठलाना नहीं चाहते। उनके आने से पहले सब अपनी आंखों से देख लेना चाहते हैं। कहीं कोई कमी-बेसी न रह जाए। कल फोन पर हुई बातें उनके मन में अब तक गुदगुदी मचाए हुई हैं। वे यहीं नहीं, बल्कि प्रदेश तक में प्रख्यात हो चुके हैं। उनके नाम अब अनजान नहीं रह गया है। वे बाहर से तो कुछ नहीं कह रहे, पर मन बल्लियों उछल रहा है। एक सुगबुगाहट सेवा-संगम में भीतर ही भीतर पर फैला रही है, जो उन तक भी पहुंच चुकी है। सब कुछ ठीक रहा, तो आज उन्हें सर्वश्रेष्ठ कार्यकर्ता के खिताब से नवाजा जाएगा। एक अनूठे रस से सराबोर थे वह आज।

वे निकलने को थे कि घर की शांति उन्हें कुछ अखरी। न बर्तनों की खटपट, न पत्नी की बड़बड़ाहट। आज क्या वह अभी तक जागी नहीं? कल तबियत कुछ अधिक ही खराब लग रही थी। उसे कह देते हैं कि खाने के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं। आज उनका खाना वहीं संस्था में है। पत्नी के लिए भी वहीं से लेते आएंगे। पत्नी को यह बात कहने कमरे तक आए, तो उनके होश उड़ गए। कमरा बदबू से भरा था। बिस्तर मूत्र-पाखाने में लिथड़ा था। पत्नी चित्त पड़ी थीं। कोई हरकत उनके शरीर में नहीं दिखाई दी, तो वह डरते-डरते बिस्तर तक आए और उनकी नाक के आगे हाथ लगा दिया। न, सांस नहीं थी। उन्होंने पास पड़ी कुर्सी का हत्था पकड़ लिया। कब हुआ होगा यह? कोई आवाज, कोई आहट तक नहीं। भनक तक नहीं पड़ी। उन्हें तो आज नींद ही नहीं आई थी। सारी रात दूसरे कमरे में बैठ क्षेत्रीय प्रमुख को दिखाए जाने वाले कागजों का मिलान करते रहे थे। उन्होंने उनका चेहरा देखा। पीड़ा का कोई चिह्न नहीं, न संघर्ष का संकेत। क्या यों ही, रात के किसी पहर!
लेकिन अब? अब क्या करें वे? बेटे को फोन करें या किसी स्थानीय संबंधी को खबर करें। या जाकर किसी पड़ोसी को बुला लाएं। वह हतबुद्धि-से मन ही मन सारे विकल्प परख रहे थे। तभी हवा का झोंका आया। खिड़की से होकर उन पर से गुजरते हुए पत्नी की बगल में रखे कागज पर आ ठहर गया। यह नोटपैड था, जिस पर वे हिसाब लिखती थीं। क्या अंतिम वक्त भी वे हिसाब लिख रही थीं। उत्सुकतावश उन्होंने नोटपैड उठाया। जिस पन्ने पर पेन फंसा था वहां दो पंक्तियां थीं, ‘मुझे कभी कुछ हो जाए तो आप पीछे मुड़ कर मत देखिएगा। जो भी काम कर रहे हों वह पूरा कर ही आइएगा। इसे मेरी पहली और अंतिम इच्छा मानिए।’

यह क्या कह गर्इं वे! उन्होंने प्रेमवश ऐसा कहा या प्रतिशोध के प्रयोजन से! वे हतप्रभ खड़े उन पंक्तियों को दोहरा रहे थे। जीवन भर वे यही तो करते रहे। उनका काम ही सदा उनकी प्राथमिकता रहा। अब अंतिम समय पत्नी ने इसी की इच्छा व्यक्त कर क्या अनर्थ कर दिया? उन्होंने यही तो चाहा कि जो आज तक होता रहा, वही अब भी हो। तो क्या वह उनकी मृत देह को छोड़ सेवा-संगम चले जाएं? पत्नी की इच्छा मानते हैं तो उसका अनादर होता है, उसकी इच्छा का मान नहीं रखते, तो भी उसका तिरस्कार होता है। अब मधुसूदन बाबू क्या करेंगे?