बचपन से ही मन्मथ नाथ गुप्त आजादी के दीवाने थे। मात्र तेरह साल की उम्र में वे स्वतंत्रता संग्राम में कूद पड़े और हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गए। 1925 में हुए काकोरी कांड में उनकी महत्त्वपूर्ण भूमिका थी। इसकी वजह से उन्हें चौदह साल जेल में रहना पड़ा। वे भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के क्रांतिकारी और सुपरिचित लेखक थे। उन्होंने हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला में साहित्य की रचना की थी। आजादी के कुछ साल पहले 1946 में उन्हें रिहा किया गया। उन्होंने भारतीय स्वतंत्रता संग्राम के संघर्ष पर कई पुस्तकें लिखी हैं। वे ‘आजकल’ पत्रिका के संपादक भी रहे।
प्रारंभिक जीवन
मन्मथ नाथ गुप्त का जन्म बनारस में हुआ था। उनके दादा बंगाल के रहने वाले थे, जो बाद में 1880 में बनारस आकर बस गए। उनके पिता नेपाल में स्कूल शिक्षक थे। मन्मथ नाथ की शुरुआती शिक्षा नेपाल में ही हुई। फिर जब उनके पिता की नौकरी बनारस में लग गई, तो मन्मथ नाथ का दाखिला काशी विद्यापीठ में करा दिया गया।
क्रांतिकारी कार्य
मन्मथ नाथ गुप्त स्वतंत्रता संग्राम में तेजी लाने के लिए भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस में भी शामिल हुए। वे गांव-गांव जाकर कांग्रेस का संदेश लोगों तक पहुंचाते थे। पर वे कांग्रेस के काम से खुश नहीं थे, क्योंकि वहां उनकी मेहनत का कोई परिणाम नहीं दिख रहा था। 1922 में चौरा चौरी कांड के बाद जब महात्मा गांधी ने असहयोग आंदोलन का आह्वान किया तो मन्मथ नाथ को निराशा हुई। वे कांग्रेस और गांधी दोनों से नाखुश थे। बाद में वे हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन के सक्रिय सदस्य बन गए। यह क्रांतिकारियों का एक ऐसा समूह था, जो ब्रिटिश सरकार के खिलाफ काम कर रहा था। चंद्रशेखर आजाद को भी इस एसोसिएशन में शामिल कर लिया गया था।
जिंदगी का मोड़
मन्मथ नाथ की जिंदगी का मोड़ काकोरी कांड रहा। 9 अगस्त, 1925 को मन्मथ नाथ समेत दस क्रांतिकारियों ने काकोरी के पास एक ट्रेन रोकी और सरकारी खजाना लूट लिया। इस योजना में शामिल क्रांतिकारियों को मृत्युदंड मिला, लेकिन मन्मथ नाथ उस समय किशोर थे, इसलिए उन्हें मृत्युदंड नहीं दिया गया। उन्हें चौदह साल कारवास की सजा मिली।
आजादी के बाद
मन्मथ नाथ गुप्त को आजादी के कुछ साल पहले ही जेल से रिहा किया गया था। वहां से निकलने के बाद उन्होंने ब्रिटिश सरकार के खिलाफ लिखना शुरू किया। चौरा चौरी कांड पर अपने विचार रखते हुए मन्मथ नाथ ने कहा कि भारत को आजादी 1922 में ही मिल जाती, लेकिन गांधी के असहयोग आंदोलन से यह सफल नहीं हो पाया। बहुत से लेखकों ने गांधी के चौरा चौरी घटना पर रोक लगाने का विरोध किया है। बाद में मन्मथ नाथ कम्युनिस्ट पार्टी आॅफ इंडिया के सक्रिय सदस्य बन गए। उन्होंने सूचना एवं प्रसारण मंत्रालय में भी काम किया।
लेखन कार्य
मन्मथ नाथ ने आजादी की लड़ाई केवल अपने शरीर से नहीं, बल्कि कलम से भी लड़ी। उन्होंने जो भी लिखा वह आजादी के लिए था। उन्होंने लगभग एक सौ बीस किताबें हिंदी, अंग्रेजी और बांग्ला में लिखीं। उन्होंने कथा साहित्य और समीक्षा के क्षेत्र में भी महत्त्वपूर्ण कार्य किया। उन्होंने योजना, बाल भारती और कई साहित्यिक पत्रिकाओं का संपादन किया।
निधन :26 अक्तूबर, 2000 को दिल्ली में मन्मथ नाथ गुप्त का निधन हो गया।

