प्रदीप कुमार

नब्बे के दशक से जारी आर्थिक उदारीकरण और निजीकरण ने भारत के सामाजिक संरचना में काफी बदलाव किया है। आक्सफेम के अनुसार देश में आर्थिक असमानता तेजी से बढ़ी है। विगत एक दशक में मजदूरों की आय दो प्रतिशत बढ़ी है, जबकि लखपतियों की आय में छह गुना से ज्यादा वृद्धि हुई है। इसमें भी ऊंची जातियां तेजी से अमीर हो रही हैं, जबकि नीचे की जातियां या तो अपनी जगह स्थिर हैं, या फिर गरीब हो रही हैं। आर्थिक असमानता ने जातिगत भेदभाव को बढ़ाया है। वाटरएड इंडिया के एक अध्ययन में दलितों के साथ पानी भरने को लेकर होने वाले भेदभाव की पड़ताल की गई है। रिपोर्ट के अनुसार आज भी गांवों में दलितों के साथ अत्याचार होते हैं, इनमें पानी भरने से लेकर मंदिरों में घुसने तक में भेदभाव किया जाता है। पानी भरने को लेकर कुएं, तालाबों आदि प्राकृतिक जलस्रोतों पर किए जाने वाले भेदभाव सबसे क्रूर और अमानवीय हैं, क्योंकि हमारे देश में आज भी प्राकृतिक जल स्रोतों की कोई कीमत तय नहीं है।

वैश्विक स्तर पर बढ़ती असमानता पर फ्रांस के अर्थशास्त्री थॉमस पिकेटी ने काफी काम किया है। उनके अधिकतर लेख बढ़ती असमानता और कारणों की पड़ताल करते हैं। पिकेटी के निर्देशन में ‘वर्ल्ड एनइक्वेलिटी डाटाबेस स्टडी’ पर नितिन कुमार भारती ने भारत से जुड़े आकंड़े जुटाए हैं। उन्होंने 1951 से 2012 तक भारत की आर्थिक असमानता के वर्गीय और जातीय चरित्र का अध्ययन किया है। अध्ययन के अनुसार आर्थिक और जातीय असमानता साथ-साथ बढ़ रही है। एक तरफ शिक्षा के निजीकरण ने शिक्षा की कीमत बढ़ा दी है, वहीं दूसरी तरफ नौकरियों के लिए तरह-तरह की दक्षता की मांग बढ़ती जा रही है। नतीजतन, लोगों को शिक्षा पर ज्यादा खर्च करना पड़ रहा है। चूंकि ज्यादातर निचली जाति के लोग शिक्षा पर खर्च नहीं कर पाते, इसलिए उनको अच्छी नौकरी नहीं मिल पा रही है। तेजी से बढ़ रही आर्थिक असमानता को जाति के आधार पर दिया जाने वाला आरक्षण भी रोकने में कारगर नहीं हो पा रहा है।

एक औसत दलित महिला सवर्ण महिला की तुलना में चौदह साल पहले मर जाती है। जीवन प्रत्याशा में असमानता एक नए किस्म की असमानता है, जोकि कहीं न कहीं आर्थिक असमानता से जुड़ी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन की रिपोर्ट भारत में दलितों के खराब स्वास्थ्य की ओर इशारा करती है। यह बताती है कि सामान्य तौर पर दलित आबादी को शुद्ध पानी नहीं मिलता। उन्हें गांव या क्षेत्र के प्राकृतिक जल स्रोतों पर ही निर्भर रहना पड़ता है। ये जलस्रोत बीमारियों का कारण बनते हैं, जिससे उनका स्वास्थ्य खराब रहता है और दवा-इलाज पर ज्यादा खर्च करना पड़ता है। पानी की कमी के कारण दलित महिलाएं थकावट, कमजोरी और रक्ताल्पता से ग्रस्त हो जाती हैं। दलित महिलाओं में अस्सी प्रतिशत गर्भवती महिलाएं रक्ताल्पता से पीड़ित होती हैं, जबकि बीस प्रतिशत महिलाओं का कद सामान्य से कम होता है।

कुपोषित महिलाएं गर्भवती होती हैं, तो उन्हें कई प्रकार की जटिलताओं का सामना करना पड़ता है। बेहतर इलाज के अभाव में इसका सीधा प्रभाव शिशु के स्वास्थ्य पर पड़ता है। सामाजिक भेदभाव के बीच पलने-बढ़ने वाले दलित आबादी का स्वास्थ्य सवर्ण आबादी की अपेक्षा खराब रहता है, जिसके चलते उसे दवा इलाज पर काफी खर्च करना पड़ता है। अध्ययन बताता है कि वैश्वीकरण, जनसंख्या वृद्धि और तकनीकी क्रांति ने आर्थिक असमानता को और बढ़ाया है। वैश्वीकरण और उदारीकरण ने निजीकरण को बढ़ाया है, जिससे 1980 के बाद बड़े पैमाने पर सार्वजनिक संपत्ति का हस्तांतरण निजी क्षेत्र में हुआ। नतीजतन, एक प्रतिशत आबादी की संपत्ति में बेहताशा वृद्धि हुई है। उक्त सार्वजनिक संपत्ति का निर्माण सरकारों ने आजादी के बाद आदिवासियों, किसानों, दलितों, पिछड़ों आदि को विस्थापित करके किया था।

बाद में यह संपत्ति उच्च जातियों के कुछ मुट्ठी भर लोगों को हस्तांतरित हुई। अर्थव्यवस्था के निजीकरण से उच्च जातियों के व्यवसायियों को वित्तीय संस्थाओं ने बड़ी मात्रा में कर्ज दिया और बाद में उस कर्ज को सरकारों ने माफ कर दिया। आम दलित आबादी का इन संस्थाओं में कोई हस्तक्षेप न होने के कारण उन्हें कर्ज मिला नहीं या फिर बहुत कम मिला। शहरीकरण के बाद हाउसिंग कॉलोनी या बैंक फाइनेंस में भी उच्च जातियों को ही ज्यादा फायदा मिला है। भारतीय समाज की विडंबना यह है कि तीन हजार साल पुरानी जाति प्रथा के जाल में अब भी फंसा है और दलित आबादी बराबरी के लिए संघर्ष कर रही है।

राष्ट्रीय अपराध रिकॉर्ड ब्यूरो के आंकड़ों के अनुसार विगत दशक में दलितों पर होने वाले अपराधों की संख्या में बढ़ोतरी हुई है। दस सालों में दलितों के साथ होने वाले अपराध में पचीस प्रतिशत वृद्धि हुई है। 2006 से 2016 के बीच पूरे देश में दलित और आदिवासियों से जुड़े पांच लाख से ज्यादा मामले दर्ज किए गए हैं। इनमें से निन्यानबे प्रतिशत मामलों की जांच-पड़ताल लंबित है। इन मामलों में सबसे ज्यादा केस दलितों के साथ छोटी-मोटी लड़ाइयों से जुड़ी हैं, जो बताती हैं कि अब भी दलितों के साथ छोटी-छोटी बातों पर मारपीट या भेदभाव करना सामान्य बात है।
जाति-व्यवस्था हमारे समाज की कू्रर हकीकत है, जिसकी सूरत तो बदल रही है, लेकिन सीरत जस की तस है। यानी जाति-व्यवस्था इस कदर हमारे दिलो-दिमाग में पैठ बनाए है कि लोकतंत्र में सबको बराबरी का दर्जा दिए जाने के कानून के बावजूद हर जातियों में भेदभाव अब भी अस्तित्व में है। ब्राह्मण अपने आप को श्रेष्ठ समझता है, जबकि दूसरी जातियां भी अपने आप को श्रेष्ठ समझते हुए लड़ती हैं। इनमें भी दलितों को सबसे नीच जाति का माना जाता है।

बुंदेलखंड में सत्तर से अस्सी फीसद आबादी गांवों में रहती है। इनमें करीब पच्चीस से तीस प्रतिशत आबादी दलित है, जिन्हें नाममात्र की सुविधाएं मिलती हैं। दलितों में कई जातियां और उप-जातियां हैं। यों बुंदेलखंड में छियासठ अनुसूचित जाति और जनजातियां सरकारी दस्तावेजों में दर्ज हैं, लेकिन इनमें भी आपस में भेदभाव व्याप्त है। वाल्मिकी और भंगी सबसे नीचे आते हैं। आश्चर्यजनक बात यह है कि सवर्णों और दलितों के बीच भेदभाव तो है ही, दलितों में भी आपसी मनमुटाव है।

बुंदेलखंड के गांवों की संचरना में पैंसठ प्रतिशत आबादी सवर्ण है, जबकि बीस प्रतिशत दलित और शेष अन्य जातियां हैं। अमूमन सवर्णों के गांवों में करीब एक दर्जन वाल्मिकी परिवार निवास करते हैं, जिन्हें गांव से बाहर रहने को दिया गया है। वे गांव के पानी का इस्तेमाल नहीं कर सकते। एक दर्जन से ज्यादा परिवार के बीच एक हैंडपंप और एक कुआं होता है। अगर कुआं सूख जाता है तो हैंडपंप भी सूख जाते हैं। ऐसे में उन्हें नहर के पानी पर निर्भर रहना पड़ता है। कुआं सूखने पर वे अपने दलित भाइयों से पानी मांगते हैं, तो वे उन्हें पानी नहीं देते, क्योंकि वे उन्हें सबसे नीच मानते हैं।
अधिकतर गांवों के सरपंच ब्राह्मण या सवर्ण होते हैं। आरक्षण के तहत कई गांवों के प्रधान दलित हैं, लेकिन वे नाममात्र के अधिकार रखते हैं। वे एक तरह से सवर्णों के रबर स्टांप होते हैं। दलितों का हैंडपंप खराब होना भी उनके लिए एक समस्या है। उन्हें जल्दी मिस्त्री नहीं मिलते हैं। ऐसी स्थिति में बुंदेलखंड के सरकारी स्कूलों के हैंडपंप ही दलितों का एकमात्र सहारा होते हैं।