वंदना शुक्ल
क्या और कुछ दिन ‘बच्चा’ नहीं बना रह सकता था? क्यों अब उसमें इच्छाएं सिर उठाने लगी हैं?’ गई रात छह बरस के शैफू को सीने से चिपकाए लेटी नसीबा ऐसा ही कुछ सोचती रही। जाड़े की रात बेहद ठंडी और अंधेरी थी, लेकिन उसके मन में क्षोभ की चिंगारियां-सी फूट रही थीं। उन चिंगारियों में जैसे शैफू की शक्ल कौंध रही थी। वही कल वाली शक्ल, जब वह रोज की तरह उसकी उंगली थामे और बगल में सींक की झाडू दबाए काम पर जाते हुए मांडवी बाजार की उस भरी हुई सड़क पर पहुंची थी। त्योहार का शोर-शराबा, खरीद-फरोख्त, मोल भाव। उत्तरायण (मकर संक्रांति) की भीड़, पूरी सड़क रंग-बिरंगी पतंगों से भरी दुकानों के आगे जमीन पर बच्चे, गरीब औरतें बेचने के लिए पतंगों के ढेर रखे बैठे थे। ये पतंगें उन्होंने पिछले दो दिनों में ‘लूटी’ थीं।
शैफू बार-बार मिठाइयों के ठेले, उन रंग-बिरंगी पतंगों, बजने वाली पीपली, गुब्बारों चाट पकौड़ी के ठेले को देख कर रुक जाता। नसीबा उसका हाथ खींचती और वह फिर ठिलता-सा चलने लगता।
अम्मी… उसने ठुनकते हुए रास्ते में कई बार कहा, लेकिन नसीबा ने सुनते हुए भी नहीं सुना।
अम्मी… वह जोर से बोला और पैर पटकता हुआ खड़ा हो गया। उसने अपना हाथ नसीबा के हाथ से छुड़ा लिया।
क्या है? चलो न मुझे काम पर जाने में देरी हो रही है। सब दुकानदार चिल्लाएंगे… कह कर नसीबा रुक गई और पीछे मुड़ कर देखने लगी।
अम्मी ये वाली पतंग चैए… शैफू ने एक दूकान पर लटकी निहायत खूबसूरत बड़ी-सी लाल पतंग की ओर इशारा करते हुए कहा, जो हवा में गर्व से झूम-सी रही थी।
नसीबा ने पतंग की ओर देखा, अपने अनुमान से उसकी कीमत का अंदाजा लगाया, जो उसे अपनी जेब में रखे छोटे से बटुए के भार से बहुत भारी लगी।
तुमसे कहा है न कि तोहार कल है? कल तक दिला देंगे?
लेकिन अम्मी ये तो रोज कहती हो कि कल दिला देंगे लेकिन…
अब तुम बहस मत करो… चलो सीधे से… नसीबा ने शैफू का हाथ जबरन खींचते हुए कहा था।
बहना ले जाइए पतंग, बच्चे का मन है, थोड़ा रेट कम कर दूंगा… सिर पर चिकन की सफेद गोल टोपी लगाए दुकानदार ने कहा।
नहीं भाईजान, अभी नहीं लेना… कह कर नसीबा शैफू का हाथ पकड़े वहां से चली गई थी।
उसका जी हो रहा था कि वह अपने बिन बाप के इस इकलौते चश्मे-नूर को पूरा बाजार खरीद कर दे दे।
नसीबा को न जाने क्यों लगा कि शैफू आज इतनी जल्दी थक रहा है। और अब वह करीब-करीब घिसटते हुए चलने लगा है। अब तो छोटा भी न रहा कि गोद में ही उठा लेती। झाडू मारने रोजाना घर से कित्ती तो दूर आना पड़ता है। हंफनी भर जाती है उसकी।
खैराती अस्पताल के डॉक्टर ने कहा था कि हरी सब्जी खाया और दूध पिया कर। उसने फीकी-सी हंसी हंस दी। लौंडे को तो मिला नहीं दूध, वालिदा दूध पीएगी!…
चौक पहुंची तो बाजार पर शबाब चढ़ने लगा था। सजी-धजी औरतें, मचलते उत्साहित बच्चे और दुकानदारों से मोल-भाव करते पुरुष। उधर सड़क कटी-फटी पतंगों, गोल गप्पे के जूठे दोनों, पटाखों की बारूद, नीम की पत्तियों और कूड़े से भरी हुई थी। ‘यहां तोहार भी हफ्ते भर चलते हैं कम्बखत।’ नसीबा का दिल बैठ गया। उसने रोज की तरह शैफू से नीम के पेड़ के नीचे पत्थर की बेंच पर बैठ जाने को कहा। जेब से ‘मिराज’(खैनी) की पुड़िया निकाली इस अफसोस के साथ कि आज घर से निकलने में देरी हो जाने के कारण घर में ही तम्बाखू फांक नहीं पाई, कुछ नशा तो रहता। और फिर आधी बची पुड़िया वापस कमर के बटुए में खोंस झाडू से सड़क झाड़ने लगी। हवा भी चलने लगी थी। धूल के उड़ते गुबार के उस पार बैठे शैफू की ओर उसने एक और बार देखा। वह ठुड्डी पर हाथ रखे बैठा पतंगों की सजी-धजी दुकानों की तरफ अपलक देख रहा था। मन के भीतर एक उदास पीली-सी लकीर खिंच गई।
अम्मी भूख लगी है। अचानक शैफू ने खड़े होकर कहा।
लेकिन घर से चाय रोटी खाके तो चले थे… नसीबा कहते-कहते रुक गई, क्योंकि शैफू सामने साबूदाने और मूंग की दाल के पापड़ों से भरे ठेले की ओर देख रहा था। उसने झाडू एक तरफ टिकाई और दुपट्टे के पल्लू की गांठ खोली। उसमें दस रुपए और एक का सिक्का था। चल… कह कर वह सड़क पार खड़े उस ठेले के पास पहुंच गई। भाईजान पापड़ कित्ते का दिया… जरा रेट कम लगा दो… छोरा जिद्दिया रहा है।
बहन एक ही रेट है, तीन रुपए का सौ ग्राम।
लाओ दे दो सौ ग्राम।
पुड़िया में रखे पापड़ को लेकर उसने शैफू को दे दिया। शैफू बैठ कर खाने लगा। बेटे की आंखों में संतृप्ति देख कर उसे राहत हुई।
नसीबा ने झाड़ कर कूड़े का ढेर कोने में लगा दिया और दूसरी ‘खेप’ साफ करने लगी। उस भरे बाजार में छोटे-छोटे बच्चे अपने माता-पिता के साथ पतंग, मिठाइयों, खिलौनों आदि की खरीदारी कर रहे थे और खूब प्रसन्न थे। झाडू लगाती नसीबा की आंखों से आंसू टपक रहे थे। उन्हीं आंसुओं में अटकी वह लाल खूबसूरत पतंग भी झिलमिला रही थी।
अम्मी हमें लाल वाली बड़ी पतंग नहीं चैए… शैफू ने वहीं बैठे-बैठे कहा तो नसीबा चौंक गई। वह झाडू रख कर इसकी बगल में आकर बैठ गई।
हां बेटा… हम लोग पतंग उतंग थोड़े ही उड़ाते हैं? ईद पर तो मामू के यहां गए थे याद है? तुम्हें वो फैनी भी दिलाई थी?
हां और उससे पेले ताजिए भी देखे थे।
हां, याद है तुझे? नसीबा ने बेटे के गाल को चूम लिया।
अम्मी हम लाल वाली पतंग नहीं लेंगे… बस वह चूहे के मुंह वाला फुग्गा दिला देना। शैफू ने सामने बड़ी डंडी पर रंग-बिरंगे गुब्बारे लिए उस आदमी की ओर इशारा करते हुए कहा तो नसीबा की खुशी थोड़ी बुझ गई। कम्बखत ए तोहार आते ही क्यों हैं? रोज तो सड़क खाली रहती है, लेकिन….
बोलो न अम्मी… दिला दोगी न?
अच्छा तुझे पापड़ कैसा लगा?
अच्छा।
तो फिर और ले लो।
नई अब नई… तुम्हारे पेसे खतम हो जाएंगे तो फुग्गा नहीं आएगा।
पहले सफेद वाला पापड़ लिया था न, अब ये पीला वाला ले लो… कह कर नसीबा उंगली पकड़ कर शैफू को पापड़ के ठेले पर ले गई और तीन रुपए का पीला वाला पापड़ दिला दिया।
शैफू फिर बैठ कर खाने लगा।
कैसा लगा? नसीबा ने झाडू सड़क पर मारते हुए हंसते हुए पूछा।
ये वाला और भी अच्छा है… शैफू ने कहा।
कल अपन और लेंगे… कह कर नसीबा ने उसे बहलाया।
अम्मी… अब हम न फुग्गा लेंगे और पतंग भी नहीं लेंगे।
माशाअल्लाह बाबू तो बड़ा हो गया? वाह अल्ला खैर करे। नसीबा ने खुश होकर उसके सिर पर हाथ फेरा। अब चार रुपए बचे हैं, तमाकू की दो पुडिया आ जाएंगी। कल की कल देखी जाएगी। वह सोच रही थी। तभी एक कार वहां आकर खड़ी हुई। उसमें से पति-पत्नी और दो गोल-मटोल बच्चे निकले। लकदक कपड़े, हंसते-मुस्कुराते हुए। और फिर बड़ी-बड़ी दुकानों में खो गए। शैफू बच्चों को गौर से देख रहा था।
नसीबा अब बरामदा झाड़ने लगी थी। उसने वहीं से देखा शैफू लाल चमचमाती उस कार के पास खड़ा उसे छूकर देख रहा था। अम्मी कित्ती चमकती है न?
हां, तुम यहीं बैठो न उठ क्यों गए?
जब नसीबा यह कह रही थी तब शैफू कार के अंदर शीशे से झाक कर देख रहा था। पिछली सीट पर बच्चों के दो काले चश्मे रखे थे। ड्राइवर की सीट के आगे लगे ग्लास पर एक बंदर वाला खिलौना झूल रहा था। उसे देख कर शैफू मुस्कुराने लगा।
अरे यहां बैठो न? वहां क्या कर रहे हो? नसीबा ने बरामदे को झाड़ते हुए फिर टोका।
अम्मी हमें चश्मा नहीं चाहिए।
नसीबा को कुछ समझ में नहीं आया, लेकिन वह कुछ बोली नहीं, बस झाड़ती रही।
और वह बंदर भी नहीं चाइए। शैफू अपनी जगह आकर बैठ गया। नसीबा ने सुन कर भी अनसुना कर दिया। वह झाड़ती रही।
घर लौटते वक्त शैफू खामोश था। नसीबा ने तंबाकू की नई पुड़िया खरीदकर मुंह में डाल ली थी। दोनों अपने-अपने में खोए वापस घर लौट रहे थे। आते बक्त एक चूड़ियों से भरा ठेला दिखा, तो नसीबा रुक गई।
कित्ते की दर्जन दी? उसने ठेले वाले से पूछा।
पचास की दर्जन हैं, तुम्हें चालीस की लगा दूंगा।
नहीं भैया, नहीं चाहिए।
अरे ले जाओ तोहार है।
नहीं भाईजान बस ऐसे ही पूछ रहे थे।
जब मरद ही छोड़ कर चला गया तो चूड़ियां किस काम की? वह सोचती जा रही थी।
शाम गहरा गई थी। मुहल्ले में रोज से कुछ ज्यादा चहल-पहल थी। नसीबा को न जाने क्या सूझा, उसने शैफू से कहा, ‘तुम घर में रहना, मैं अभी आई।’
जब वह वापस लौटी तो उसके हाथ में छोटी-छोटी आठ-दस पतंगें थीं।
अरे अम्मी यह कहां से?
नसीबा बस हंस कर रह गई। उसने नहीं बताया कि सड़क और छोटे पेड़ों पर कट कर आई पतंगों को वह इकट्ठा करके लाई है और कल छुट्टी है, तो वह इन्हें सड़क किनारे बेचेगी।
दूसरे दिन ‘उत्तरायण’ का त्योहार था। सुबह शैफू से मुहल्ले में खेलने को कह कर वह चली गई।
शाम को नसीबा मांडवी बाजार से लाल बड़ी पतंग दोनों हाथों से सिर के ऊपर उठाए बेहद खुश घर की और चली आ रही थी। पीछे-पीछे शैफू एकटक उस पतंग को देखता खुशी से बहराया भागा-सा चल रहा था। आसमान के तमाम तारे जैसे उसकी आंखों में भर गए थे और अम्मी ने उसके ख्वाबों के आसमान को जैसे सिर पर उठा रखा था।

