सुरेश पंत
अपने देश की व्युत्पादक लोक-बुद्धि का कमाल है कि जब भी चुनाव आते हैं, तो शब्द भंडार में कुछ नए शब्द और पदबंध जुड़ जाते हैं। चाहें तो इसे लोकतंत्र या अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का आनुषंगिक लाभ भी कह सकते हैं यह बात और है कि अभी तीन अभिव्यक्तियों पर ध्यान जा रहा है।
सूपड़ा साफ होना
कोश के अनुसार सूप शब्द संस्कृत के शूर्प का तद्भव है। शूर्पनखा (सूप जैसे नखों वाली) या शूर्पकर्ण (सूप जैसे कान वाला) जैसे पौराणिक नामों में यही शूर्प है, जो प्राय: अन्न को पछारने, उसमें से कंकड़-पत्थर या भूसी जैसी गंदगी अलग करने वाला एक उपकरण है। इसे छाज भी कहा जाता है। यह सूप हिंदी में ही नहीं, उसके परिवार की अन्य भाषाओं-बोलियों के अतिरिक्त मराठी, गुजराती में भी इसी अर्थ में है।
कबीर ने तो साधु स्वभाव की तुलना ही सूप से कर डाली :
साधू ऐसा चाहिए, जैसा सूप सुभाय,
सार-सार को गहि रहै, थोथा देइ उड़ाय॥
इसी सूप से जुड़ा है हीनार्थक प्रत्यय ‘ड़ा’, जो मूल अर्थ में कुछ नकारात्मकता या हीनता भर देता है। तो शब्द बन गया ‘सूपड़ा’। हीनार्थक हो या उन्नतार्थक, सूपड़ा भी सूप की भांति साफ करने का काम ही करता है।
अब प्रश्न यह कि जो स्वयं साफ-सफाई के लिए प्रयुक्त होता हो, उसी की सफाई से क्या आशय! यहीं हमारे लोकमन की कल्पनाशक्ति की प्रशंसा करने का मन करता है। साफ करना का एक मुहावरेदार प्रयोग भी है, जिसका आशय है- समाप्त कर देना, मिटा देना, अस्तित्व ही न रहने देना। सूपड़ा ही नहीं रहा, तो फिर बचा क्या। न रहे बांस तो न बजे बांसुरी!
यहां अर्थ की एक और दिशा सूझती है। सूप कंकड़-पत्थर, गंदगी को अलग करता है और अन्न या जो कुछ भी पछोरा जा रहा हो, वह सूप में बचा रहता है। अब सूपड़ा पूरा ही साफ हो गया, तो न सार बचा, न थोथा।
सूपड़ा साफ हो गया, यही तो होता है।
रायता फैलाना
यह मुहावरा पिछले कुछ वर्षों से ही चलन में आया है। दिल्ली में एक राजनीतिक दल पर व्यंग्य करते हुए इसका प्रयोग दिखाई पड़ा था और फिर क्षेत्र विस्तार होता गया। कुछ लोगों का कहना है कि लोक में तो यह पहले से था, किंतु प्रचलन में अधिक नहीं था। शायद इसीलिए कोशों में कहीं दिखाई नहीं दिया।
रायता भारतीय भोज्य पदार्थों में बहुत लोकप्रिय है, देशभर में ही नहीं, विदेश में भी। यह बूंदी, फल, उबले आलू, सब्जियां आदि अनेक पदार्थों में से किसी को भी दही में सान कर बन सकता है। मुख्य घटक हैं दही और राई। दही में फल आदि मिला देने भर से रायता नहीं बन जाता। रायते के नाम में जो ‘राई’ शब्द है, यही अच्छे रायते की कुंजी है। रायते में राई का तड़का या कहीं-कहीं पिसी हुई राई मिला दी जाती है, जिससे स्वाद न भूलने वाला हो जाता है। कहावत ही है कि राई नहीं तो रायता कैसा! आप लाख कोशिश कीजिए बिना राई के रायता बन नहीं सकता। आप राई का पहाड़ बना सकते हैं, राई रत्ती का हिसाब ले सकते हैं, किंतु राई के बिना रायते का स्वाद नहीं ले सकते। अब प्रश्न यह है कि रायता फैलाना मुहावरा बना कैसे?
दरअसल, यदि रायता फैल जाए तो अनेक प्रकार से स्थिति असुविधाजनक हो जाती है। एक तो खाने के लिए बना महत्त्वपूर्ण व्यंजन नष्ट हो गया, दूसरे रायता फैलने से जो गंदगी प्रत्यक्ष दिखेगी, वह भोजन के समय जुगुप्सा पैदा कर सकती है। रायता फैलने-बिखर जाने से उसके घटक- सब्जियां, बूंदी या जो भी हो, उसके टुकड़े अस्त-व्यस्त बिखरे दिखाई देंगे, जो भोजन के लिए बैठे लोगों के मन में अरुचि उत्पन्न करेंगे।
और तीसरा सबसे महत्त्वपूर्ण है, जिसे तुलसी के शब्दों में कह सकते हैं : ‘एहि बिधि दीप को बार बहोरी!’
इस प्रकार नए सिरे से रायता कौन बनाए, कैसे बनाए! दही को मथना, छानना, उसमें मिलाने की सामग्री जुटाना, मसाले मिला कर राई का तड़का देना और ये सब भोजन कर रहे लोगों के सामने तुरत-फुरत करना एकदम असंभव।
तो रायता फैल जाना माने सारी व्यवस्था का अस्त-व्यस्त हो जाना, गुड़ गोबर हो जाना।
फेकू / फेंकू
यह अकेला विशेषण बड़े व्यापक अर्थ के साथ खूब चर्चा में रहता है। इधर मन में छिपा हुआ भाषा-कीट शंका करता है कि यह शब्द कहां से आया और इतना अर्थ विस्तार कैसे पा गया। इसकी उत्पत्ति की दो संभावनाएं लगती हैं। अंग्रेजी के फेक (नकली, जाली, बनावटी) विशेषण के साथ उजाडू, डुबाऊ, उबाऊ जैसे शब्दों का ‘ऊ’ प्रत्यय जोड़ कर हिंग्लिश में विशेषण बना लिया गया। गोरों की भाषा के स्पर्श को पवित्र मानने वाले लोग इस दृष्टिकोण को विशेष महत्त्व देते हैं, तो हिंदी की ही क्रिया फेंकना से मानते हैं। दरअसल, हिंदी का फेंक शब्द संस्कृत की क्षिप् धातु से निष्पन्न हुआ है, जिसका अर्थ दोनों भाषाओं में फेंकना, दूर करना ही है। हिंदी में तीर फेंकना, पासा फेंकना, जाल फेंकना आदि में यह विशेष मुहावरेदार अर्थ भी देता है, जो जालसाजी, षड्यंत्र जैसी अर्थ छवियों की ओर ले जाता है। ‘ऊ’ प्रत्यय हिंदी की क्रियाओं से जुड़ कर विशेषण बनाने का काम भी करता है। उजाड़ना से उजाड़ू, खाना से खद््दू, लादना से लद््दू आदि में यही ‘ऊ’ है। तो सहज ही फेंकना से फेंकू बन जाएगा। लोक में फेंकना का प्रयोग मुहावरे रूप में बहुत मिलता है, जैसे कोई अतिशयोक्ति की भी अति कर दे तो कहा जाता है : इतना मत फेंक…! या परले सिरे के गप्पी को कहा जाता है : फेंकता बहुत है। और जो फेंकता बहुत है वही फेंकू।
किंतु सवाल फिर यही कि इस फेंकू/ फेकू का मूल अपनी धरती मानें या आंग्ल धरती? अंग्रेजी शब्दकोशों में फेक के लिए अर्थ समझाते हुए यह भी कहा गया है, ‘जो सच न हो, पर सच ही बताया जाए’, वर्तमान संदर्भों में फेकू इस अंग्रेजी अर्थ के बहुत निकट बैठता है।
एक अन्य तर्क इसके रूप-स्वरूप अर्थात वर्ण वर्तनी का भी है। फेंकना से ‘फेंकू’ बनेगा, जबकि ‘फेकू’ में अनुनासिकता नहीं है।
कुल मिलाकर देखें तो फेकू के अर्थ संसार में हिंदी और अंग्रेजी दोनों का समावेश मिलता है। इसलिए मन करता है इसे सच्चे अर्थों में संकर मान लिया जाए, क्योंकि इसे खोना कोई नहीं चाहेगा। अंतिम निर्णय प्रयोक्ता का। ०

