साकेत कुमार सहाय

सोशल मीडिया के इस युग में रोज नए आयाम रचे जा रहे हैं। इंटरनेट की व्यापक पहुंच के साथ इसके इस्तेमाल का दायरा प्रतिदिन बढ़ता जा रहा है। भारत में इंटरनेट प्रयोक्ताओं की संख्या आज करोड़ों में है। सोशल नेटवर्किंग साइट फेसबुक का इस्तेमाल करने वालों की तादाद करीब पंद्रह करोड़ है। ट्विटर इस्तेमाल करने वालों की संख्या भी लाखों में हैं। हैदराबाद की 57 फीसद, दिल्ली-एनसीआर की 93 फीसद तथा 17.8 फीसद बिहार की आबादी फेसबुक पर मौजूद है। समय के साथ सोशल मीडिया की यह दुनिया ‘नेटवर्किंग’ फ्रेंडशिप ऐंड इंटरटेनमेंट के जुमलों से कहीं आगे निकल कर सामाजिक सरोकारों से भी जुड़ने लगी है। सोशल मीडिया पर लगातार चलाए जा रहे कई अभियान तथा इन अभियानों से जुड़ते लोग इसके उदाहरण हैं।

सोशल मीडिया के के जरिए लाखों लोग आपस में इस कदर जुड़े हुए हैं कि इस पर संदेश प्रसारित होने में मात्र कुछ सेकेंड लगते हैं, यही इस माध्यम की ताकत है। इसकी बदौलत दुनिया भर में कई आंदोलन परवान चढ़े, जिन्हें तकनीकी शब्दावली में ‘ग्राउंड्स वैल’ कहा गया। आज भारतीय डाक और रेल मंत्रालय द्वारा ट्विटर के जरिए लोगों को सूचनाएं देने और उनकी समस्याओं के निराकरण का प्रयास किया जा रहा है। ऐसे अभियान सोशल मीडिया के महत्त्वपूर्ण पक्ष हैं, पर सोशल मीडिया के प्रयोग से संबंधित नकारात्मक पक्ष ज्यादा चर्चित हो जाते हैं। इसमें फेक न्यूज चिंता का विषय है। बावजूद इसके यह सत्य है कि इस माध्यम के बढ़ते चलन ने हम सब के जीवन में कई सकारात्मक-नकारात्मक बदलाव लाए हैं।

बढ़ता चलन और दुरुपयोग
वर्ष 1969 में अमेरिकी रक्षा विभाग और स्टैनफोर्ड अनुसंधान संस्थान ने मिल कर कंप्यूटरों के नेटवर्किंग द्वारा इंटरनेट की संरचना की थी। 1989 में टिम बर्नर ली ने इंटरनेट पर संचार को सरल बनाने के लिए ब्राउजरों, पन्नों और लिंक का उपयोग करके वर्ल्ड वाइड वेब बनाया। भारत में इंटरनेट अस्सी के दशक में आया। इसे सरकार, इलेक्ट्रॉनिक्स विभाग और संयुक्त राष्ट्र विकास कार्यक्रम (यूएनडीपी) की ओर से प्रोत्साहन मिला। भारत में सामान्य उपयोग के लिए यह 15 अगस्त, 1995 से उपलब्ध हुआ, जब विदेश संचार निगम लिमिटेड ने गेट-वे सर्विस की शुरुआत की। समय के साथ इस माध्यम ने पूरी दुनिया को एक छोटे-से माउस के क्लिक में लाकर रख दिया।

हालांकि इंटरनेट की असली ताकत का पता लोगों को सोशल मीडिया से हुआ। इंटरनेट के माध्यम से हम सभी के समक्ष उपस्थित इस माध्यम ने अपनी नेटवर्किंग ताकत के बल पर कई तानाशाहों को जड़ से उखाड़ फेंका। स्मार्ट फोन ने इसे बल प्रदान किया। भारत में 2012 में कुल सोशल नेटवर्क प्रयोक्ताओं की संख्या 87.5 मिलियन थी, जो महज एक साल में बढ़ कर 127.5 मिलियन हो गई, जबकि वर्ष 2014 में यह आंकड़ा 168 मिलियन से भी ज्यादा था।

नए दौर में लोगों को आपस में जुड़ने, नए रिश्ते बनाने, जोड़ने, बातचीत और गपशप करने, नए अभियान चलाने के लिए सोशल मीडिया एक बेहतर माध्यम है। इसका यह रूप समाजशास्त्रियों को समाज के बारे में अपनी समझ विकसित करने और बदलते समाज को समझने के लिए एक नया आधार भी प्रदान करता है। इसका महत्त्व इसलिए भी ज्यादा बढ़ जाता है कि बड़ी संख्या में युवा वर्ग ने इसे अपनाया है। इसका दूसरा पक्ष यह है कि इसका अनियंत्रित प्रयोग समाज से एक बड़ी आबादी को दूर कर रहा है। समाजशास्त्रियों के अनुसार, सामाजिकता बढ़ने के साथ ही हम उन बहुत सारी बुराइयों से दूरी बनाने की ओर बढ़ते हैं, जो अकेलेपन से पैदा होती हैं। पर सोशल मीडिया के मामले में यह ऊपरी पक्ष है, आंतरिक पक्ष इससे कोसों दूर है। क्योंकि सोशल मीडिया का अनियंत्रित प्रयोग समाज के मूल आधार को कमजोर कर रहा है।

सामाजिक पक्ष
सोशल मीडिया ने वास्तविक समाज के बीच से विचार, नवाचार, कल्पना तथा सृजनात्मकता को लगभग गायब-सा कर दिया है या कह सकते हैं कि अब इन्हें चुनौती मिल रही है। क्योंकि इस माध्यम ने तर्क करने की प्रवृत्ति की जगह अनुकरण करने की प्रवृत्ति को बढ़ावा दिया है। साथ ही इस माध्यम ने अपने तरीके से पारिवारिक संस्कारों को कमजोर किया है। प्राथमिक समाजीकरण, जो पहले परिवार का दायित्व था, उसे अब डिजिटल मीडिया के माध्यम से किया जाने लगा है। यही कारण है कि सोशल मीडिया द्वारा उत्पन्न विचारों को हम बिना किसी संदेह के विश्वसनीय और प्रामाणिक मानने लगे हैं। शादी-ब्याह के रिश्ते, जमीन-जायदाद, रोजी-रोजगार सब कुछ सोशल मीडिया द्वारा संचालित किया जाने लगा है।

सोशल मीडिया ने आज की पीढ़ी को संकुचित कर दिया है। नील पोस्टमैन के मुताबिक ‘आज की पीढ़ी विचारहीन विचारों से भरी नकलची पीढ़ी है, उसके पास केवल फंडे हैं, जुमले हैं, विचारधारात्मक चिंतन नहीं है, यानी उसमें चिंतनशील भाषा का अभाव है। ऐसे में ज्ञानात्मक समाज का निर्माण कोरी कल्पना साबित होगी।’ इस ज्ञानात्मक समाज के निर्माण में कील ठोंकने का कार्य चाहे-अनचाहे सोशल मीडिया कर रहा है। क्योंकि इससे जुड़ी एक बड़ी पीढ़ी को इसका सकारात्मक प्रयोग पता ही नहीं है और न ही वह करना चाहती है।

इस तकनीक ने हमें ‘भीड़ में अकेला’ कर दिया है। भले डिजिटल सोसायटी पर आपके लाखों फालोअर्स, फ्रेंडस, शेयर, लाइक्स हों, पर वास्तविक जीवन में एक भी न हों या बहुत कम हों। तो क्या इसे सामाजिक अलगाव का चरम स्तर न माना जाए। यह माध्यम बच्चों को भी ‘सीमित व्यक्तित्व’ बनाने में सहयोग कर रहा है, जिससे सामाजिक संबंधों में व्यक्तिवादिता उभर रही है। अमेरिका की प्रतिष्ठित संस्था सेंटर फॉर डिजीज कंट्रोल के आंकड़े बताते हैं कि वहां किशोरों में खुदकुशी की प्रवृत्ति बढ़ रही है।

अक्सर कहा जाता है कि ‘समाज’ सामाजिक संबंधों से निर्मित होता है। पर, सूचना क्रांति के बाद से ‘सामाजिक नेटवर्क’ अब डिजिटल नेटवर्क’ में परिवर्तित हो चला है। सामाजिक विभाजन का स्थान ‘डिजिटल विभाजन’ ने ले लिया है, परिणामत: वास्तविक विश्व ‘डिजिटल विश्व’ के रूप में परिवर्तित हो रहा है, जहां सब कुछ आभासी या काल्पनिक है। जो यथार्थ से परे, अति-यथार्थ की अभिव्यक्ति करता नजर आता है। सोशल मीडिया पर ही किसी ने शेयर किया था- ‘जिंदगी फेसबुक की तरह है, लोग आपकी परेशानियों को पढ़ेंगे, उन्हें लाइक करेंगे, शेयर करेंगे, उन पर कमेंट करेंगे और निकल लेंगे। पर कोई भी आपकी समस्या का हल नहीं बताएगा क्योंकि सब अपनी परेशानियों को अपडेट करने में लगे हैं।’ यानी सोशल मीडिया मंचों पर सामाजिक संबंधों में संवादहीनता की स्थिति निर्मित हो रही है।

आज का युवा वर्चुअल (आभासी) विश्व के माध्यम से अपने ऐसे सपनों को पूरा करना चाहता है, जिन्हें शायद वास्तविक जीवन में वह कभी पूरी नहीं कर सकता। सोशल मीडिया के इस युग में व्यक्तित्व की पहचान ‘आॅफलाइन’ और ‘आॅनलाइन’ से होती है। ऐसे में प्रश्न उठता है कि हम तकनीक को नियंत्रित कर रहे हैं या तकनीक हमें नियंत्रित कर रही है? हम सभी सोचते हैं कि डिजिटल क्रांति ने ऐसे सूचना समाज को विकसित किया है, जहां सूचना का भंडार है, पर वर्तमान में डिजिटल होती जा रही पीढ़ी ‘डिजिटल डिवाइस’ के माध्यम से लाइक, शेयर, स्टेटस अपडेट, पिक्चर अपलोड करके वर्चुअल समाज में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने के प्रति ज्यादा चिंतित है। जबकि मूल समाज के संबंधों के प्रति उसमें अपेक्षा का भाव है।

सभ्यता विकास क्रम के आरंभिक चरण में अंधविश्वास का दौर था, जिसमें तर्कहीनता और अनुकरण करने की प्रवृत्ति थी। फिर वैज्ञानिक चरण आया, जिसमें बुद्धिवाद, वैज्ञानिक दृष्टिकोण, विश्लेषण और तर्क का रुझान प्रबल हुआ। पर सोशल मीडिया हमें फिर अनुकरण और तर्कहीनता की ओर धकेल रहा है। विडंबना यह है कि यह तकनीक-जनित तर्कहीनता है। मसलन, डिजिटल डिवाइस पर धार्मिक वीडियो और संदेश आना। सेल्फी लेने और उसे तुरंत सोशल मीडिया पर अपलोड करने की आदत ने अनेक दुर्घटनाओं को न्योता दिया है।

सृजनात्मकता
सोशल मीडिया का स्वरूप लोकतांत्रिक है, जिसे युवाओं ने बेहतर तरीके से समझा है। इससे प्रिंट मीडिया और इलेक्ट्रॉनिक मीडिया के एकाधिकार को चुनौती मिली है। इस माध्यम से रचनात्मकता की नई विधाएं जन्म ले रही हैं। इतनी आसानी से अपनी बात रखने की जगह फेसबुक ने ही दी है। पर सोशल मीडिया पर जिस तरह की भाषा इस्तेमाल हो रही है, उसे देख कर यह जरूर लगता है कि इसके प्रयोगकर्ताओं ने भाषा के पारंपरिक स्वरूप के स्थान पर एक नया शार्ट रूप निर्मित किया है। आज संसार की लगभग हर भाषा पर सोशल मीडिया के प्रभाव को महसूस किया जा रहा है, उसे समझने की कोशिश हो रही है और विमर्श हो रहा है। इस नए माध्यम ने हर नए माध्यम की तरह हर भाषा के प्रयोग के तौर-तरीकों, शब्दकोश, शैली, शुद्धता, व्याकरण और वाक्य रचना को प्रभावित किया है। यह असर लिखित ही नहीं, बोलने वाली भाषा पर भी दिख रहा है। सोशल मीडिया ने सार्वजनिक अभिव्यक्ति और एक बड़े समुदाय तक निडर और बिना रोक-टोक और नियंत्रण के अपनी बात, अपनी सोच और अनुभव पहुंचाना संभव बना कर करोड़ों लोगों को एक नई ताकत, छोटी-बड़ी बहसों में भागीदारी का नया स्वाद और हिम्मत दी है। इस नई ताकत ने सरकारों को ज्यादा पारदर्शी, संवादमुखी और जवाबदेह बनाया है, जनता के मन और नब्ज को जानने का नया माध्यम दिया है।

व्यवस्था में पहुंच
सोशल मीडिया के बढ़ते असर का ही नतीजा है कि चुनाव-दर-चुनाव राजनीतिक दल फेसबुक-ट्विटर जैसे मंचों का ज्यादा इस्तेमाल कर रहे हैं। युवाओं में सोशल मीडिया के ज्यादा प्रभाव को देखते हुए राजनीतिक दल भी युवाओं पर ज्यादा फोकस कर रहे हैं। एक अध्ययन के मुताबिक, फेसबुक पहली बार वोट करने वालों पर सबसे ज्यादा असर डालता है। इस आम चुनाव में चौदह करोड़ युवा ऐसे होंगे, जो पहली बार मताधिकार का इस्तेमाल करेंगे और इनमें से साढ़े सात करोड़ के फेसबुक अकाउंट पहले से ही हैं। भारत में फेसबुक पर 18-65 आयु वर्ग के सताईस करोड़ उपभोक्ता हैं, जो मतदाताओं की कुल आबादी का छत्तीस फीसद है। साथ ही तिरसठ प्रतिशत भारतीय उपभोक्ता तीस साल से कम उम्र के हैं। १

चिंता और नसीहत
वि शेषज्ञों का सुझाव है कि सोशल मीडिया का इस्तेमाल करते समय तीन बातों का ध्यान रखना चाहिए। पहला, किसी भी खबर को वाट्सएप या अन्य मंचों पर शेयर करने से पहले उसके स्रोत की पड़ताल जरूर कीजिए। दूसरा, किसी भी समाचार, इतिहास से जुड़ी सामग्री और गंभीर मसले से संबंधित सूचना को आगे बढ़ाते समय उसके स्रोत पर एक नजर डालिए। तीसरा, कोशिश कीजिए कि किसी मुद्दे पर हर तरह के विचारों को जानने-समझने का मौका मिले। इसे अपनी सोशल मीडिया की सक्रियता का एक नियम बना लीजिए। प्राथमिकता तय कीजिए, विचारों में तटस्थता बरतें।

हम सोशल मीडिया और पुराने दौर की सामाजिकता में फर्क देख-समझ सकते हैं। पुरानी सामाजिकता जहां हमें एक छोटे दायरे के रिश्तों में बांधती थी। इसकी सीमाएं थीं, पर इस सीमा के बीच जाने-पहचाने, परखे हुए लोग थे, जो हमें तमाम परेशानियों के साथ ही कई तरह की भावनात्मक सुरक्षा भी देते थे। पर सोशल मीडिया पर आप भारी संख्या में अनजाने चेहरों से जुड़ते हैं, जिनमें असली-नकली, दोनों ही तरह के होते हैं। इससे परिचय का आसमान तो बड़ा होता है, लेकिन खींचतान, ट्रोलिंग और दादागिरी या धकियाए जाने जैसी हरकतों का शिकार होते हैं। बड़े तो ऐसे मौकों पर चुप हो जाते हैं या जवाबी हमला भी बोल देते हैं, लेकिन बच्चों के मन पर इसका बुरा और काफी बड़ा असर होता है।

सोशल मीडिया के नियमन की मांग नई नहीं है। जब-जब इसका दुरुपयोग हुआ है, यह मांग उठी है। वाट्स-ऐप और फेसबुक द्वारा फेक न्यूज को लेकर हाल में दिए जा रहे विज्ञापन इसी सतर्कता का हिस्सा है। साइबर विशेषज्ञ भी आगाह करते रहे हैं कि अपनी पोस्ट या अकाउंट पर आप जो कुछ शेयर करते हैं, उसके लिए आप ही जिम्मेवार है। इस मसले को पूरे विचारशील समाज की चिंता के तौर पर भी देखा जाना चाहिए। पर यह भी सत्य है कि सोशल मीडिया पर वैचारिक खुलेपन के नाम पर छाई अराजकता को नियंत्रित करने की जरूरत से शायद ही किसी को इनकार हो।

निजता का हनन
हम खुद थोड़ी-सी लाइक्स, थोड़ी-सी प्रसिद्धि के लिए फेसबुक पर कई सारी व्यर्थ चीजों को अपलोड करते रहते हैं तथा बाद में जब ये कंपनियां इन आंकड़ों का इस्तेमाल करती हैं तो इसे निजता का हनन कहा जाता है। जबकि फेसबुक का यही कारोबार है। फेसबुक बाजार में अपना कोई उत्पाद नहीं बेचता, उसके पास कमाई का एकमात्र साधन है- उसके प्रयोक्ताओं से जुड़ी जानकारियां, जिसे बाजार की भाषा में डाटा और संगठनों की नजर में निजता कहते हैं। सामान्य शब्दों में कह सकते है फेसबुक, गूगल जैसी कंपनियां बाजार में कोई सामान नहीं बेचतीं, बल्कि वे विज्ञापनदाताओं के बाजार में आपको बेचती हैं। किसी भी सामान का उत्पादन किए बगैर गूगल दुनिया की सबसे ज्यादा कमाई वाली कंपनी बन चुकी है।

आज हम सभी गूगल/ फेसबुक/ इंस्टाग्राम की सेवाओं के आदी हो चुके हैं। इसके लिए हम किसी तरह का उन्हें भुगतान भी नहीं करते हैं। जबकि इनकी टीम के साथ तमाम बड़े इंजीनियर, वैज्ञानिक, आंकड़ाशास्त्री और बाजार प्रबंधकों की लंबी-चौड़ी टीमें हैं। साथ ही बाजार में तीव्र स्पर्द्धा होने के कारण इन टीमों को हरदम सतर्क रहना पड़ता है। इस पर भारी-भरकम खर्च होता है और यह सब हमारी-आपकी जानकारियों और उतार-चढ़ाव से ही वसूला जाता है। वहां कमाई का सबसे बड़ा जरिया आपका-हमारा डाटा है। गूगल को केवल डाटा के बल पर दुनिया की ताकतवर कंपनियों में गिना जाता है।

इस बीच खबर आई कि एक कंपनी ने एक साल तक स्मार्ट फोन से दूर रहने वाले व्यक्ति को भारी-भरकम पुरस्कार देने का निर्णय किया है। डाटा के इस खुले खेल की वजह से ही कई नामी-गिरामी हस्तियों ने फेसबुक से किनारा भी करना शुरू कर दिया है। पर यह आज के दौर में उतना आसान नहीं। बाजार की दिलचस्पी भी हम सब की निजता की व्यापारिक संभावनाओं में है। हाल में सरकार ने किसी भी कंप्यूटर प्रणाली को इंटरसेप्ट करने, उनकी निगरानी और कूट भाषा का विश्लेषण करने के लिए केंद्रीय एजेंसियों को अधिकृत करने संबंधी अधिसूचना जारी की, जिसका राजनीतिक विश्लेषण अलग विषय हो सकता है, पर इतना कहा जा सकता है कि हम बेवजह अपना डाटा या अपनी निजता खुद दूसरों को सौंपने पर राजी हो जाते हैं। फेसबुक जैसे मंच इसके उदाहरण है।