गोविंद भारद्वाज
दौलतराम अपने गांव का सबसे धनी आदमी था। वह जितना धनवान था उतना ही कंजूस भी। वह अपनी कमाई का एक- एक रुपया संभालकर रखता था। उसे किसी भी प्रकार की खुशी का समाचार मिलता तो वह लोगों को मिठाई की जगह गुड़- चने खिलाता। इसलिए तो उसकी कंजूसी के चर्चे सारे नगर में थे। उसके लिए सब ‘कंजूस मक्खी चूस’ वाली कहावत कहते थे।
एक बार वह व्यापार के काम से दूसरे शहर गया हुआ था। गांव के कुछ लोगों ने फागुन की मस्ती में, उसकी कंजूसी का मजाक बनाने की योजना बनाई। उन्होंने सोचा उसका कुछ रुपया खर्च करवाया जाए। गांव का एक समझदार युवक अपने साथियो के साथ सेठ जी की हवेली पहुंच गया। सेठानी अच्छा व्यवहार एवं थोड़ा बहुत खर्च करने वाली महिला थी। उन्हें देखते ही सेठानी ने सबकी अच्छी आवभगत करने के साथ जलपान की बढ़िया व्यवस्था भी की। बातचीत का सिलसिला चला तो सेठानी ने पूछा,‘आज आप सब इस गरीब की हवेली में कैसे पधारे?’ ‘गरीब की हवेली …सेठानी जी ये बात कुछ हजम नहीं हुई। गरीब की तो झोंपड़ी होती है। आप तो हवेली वाले हैं। हवेली वाले तो अमीर होते हैं अमीर।’ उस युवक ने सेठानी को चने के झाड़ पर चढ़ाते हुए कहा। हवेली की तारीफ करने वाली बात पर सेठानी बहुत खुश हुई। वह बोली,‘बताओ तो सही कैसे आना हुआ?’ युवक बोला, ‘मैं अभी-अभी शहर से आया हूं।
वहां सेठ जी एक बड़ी सी कार में बैठे हुए थे। उन्होंने कहा कि इस बार उनको व्यापार में दोगुना लाभ हुआ है। इस लाभ के पीछे गांव वालों की दुआएं एवं सेठानी की किस्मत है। इसलिए सेठानी जी को घुमाने के लिए ये लाखों की कार भी खरीदी है।’ ‘क्या सच में ऐसा ही कहा क्या उन्होंने ने। यहां तो मुझे रात-दिन कोसते रहते हैं।’ सेठानी ने हंसते हुए कहा। फिर उस युवक ने कहा, ‘सेठानी जी उन्होंने आपको एक संदेश भी भिजवाया है।’ ‘कैसा संदेश भैया जी?’ सेठानी ने पूछा। ‘यही कि सारे गांव में मिठाई बटवा देना और गरीबों के लिए दान-पुण्य भी कर देना।’ युवक ने कहा। सेठानी को ये सुनकर बड़ा आश्चर्य हुआ। वह मन ही मन बड़बड़ाई,’इतना बड़ा कंजूस आदमी जो ‘चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए’ सोच रखता हो, वह सेठ भला उदार कैसे हो गया। चलो अच्छा हुआ अपनी आदत बदल ली।’ सेठानी ने कहा, ‘मैं अकेली इतना बड़ा काम कैसे कर सकती हूं।’ ‘आप चिंता न करें हम सब मिलकर संभाल लेगें। आप तो बस अपनी तरफ से हां कर दीजिए।’
एक अन्य युवक ने कहा। सेठानी जी ने तुरंत अपनी स्वीकृति दे दी। सेठानी ने अपने मुनीम को बुलवाया कर रुपयों की व्यवस्था करवा दी। फिर सेठानी ने गांव भर में युवकों की मदद से मिठाई बांटने का काम शुरू कर दिया। इतना ही नहीं सेठानी ने गरीबों को अनाज और कपड़े भी बांटे। सारे गांव में सेठ की काफी तारीफ हो रही थी और सब आश्चर्य भी कर रहे थे। जो सुनता उसे एक पल के लिए उस कंजूस सेठ पर यकीन भी नहीं हो रहा था।
पूरा दिन सेठानी दान-पुण्य में लगी रही। उसी समय सेठ दौलतराम जी आ गए। उनके आते ही लोगों ने सेठ जी की शान में जय-जयकार के नारे लगाने शुरू कर दिए। सेठ दौलतराम को बड़ा अचम्भा हुआ। उसकी हवेली के सामने बहुत भीड़ जमा थी। उसको जय-जयकार का कारण समझ नहीं आ रहा था। लेकिन वह मन ही मन समझ गया था कि हो न हो दाल में कुछ काला जरूर है। सेठ तुरंत सेठानी को हवेली में ले गया और पूछा, ‘ये क्या नाटक चल रहा है?’ ‘नाटक…आप इसे नाटक कह रहे हैं। आपने ही तो ये सब करने का संदेश भिजवाया था।’
सेठानी ने जवाब दिया। संदेश ‘कैसा संदेश ..मैंने किसी को कोई संदेश नहीं भेजा।’ सेठ ने झल्लाते हुए कहा। सेठानी ने बताया, ‘गांव के कुछ लोग आए थे उन्होंने बताया कि आपको व्यापार में दोगुना लाभ हुआ है और मेरे लिए आपने कार भी खरीदी है। इसलिए सारे गांव के गरीबों को दान-पुण्य करना है। बाकि लोगों को मिठाई भी देनी है। बस मैं तो आपके आदेश का पालन कर रही थी।’ उसकी बातें सुन कंजूस सेठ का सिर चकराने लगा। वह अपने आपको संभालते हुए बोला,‘पागल औरत… गांव के युवकों ने हमको मूर्ख बनाया है। आज एक अप्रैल है।’ ‘एक अप्रैल …मैं कुछ समझी नहीं।’ सेठानी ने पूछा। ‘हां..हां आज एक अप्रैल है जिसे मूर्ख दिवस या अप्रैल फूल भी कहते है।’ सेठ दौलतराम ने माथा पकड़ते हुए कहा। गांव के युवको की मंडली हवेली के बाहर खड़ी हंस
रही थी।

