तजेंद्र लूथरा

लट्टू

मुझे घुमाया नहीं किसी ने
मन घूमा
घूमी आत्मा
और जोर-जोर घूमा मैं
घूमी सारी दुनिया
घूमा सारा ब्रह्मांड।
फिर धीरे-धीरे
मैं डोलता-संभलता
चलता धीरे-धीरे
मैं गिरा धीरे-धीरे
अब कोई नहीं उठाएगा मुझे
फिर कोई नहीं चलाएगा मुझे।
मैं फिर उठूंगा- फिर घूमूंगा
सिर चढ़ कर
घुमाऊंगा सारी दुनिया
सारा ब्रह्मांड
मेरे आगे पीछे
और फिर कभी नहीं गिरूंगा मैं।

एक बूंद

बिखर जाए सारा अमृत
अब नहीं कोई भटकन
खो जाए सारा आकाश
अब नहीं उधेड़बुन
तुम्हें मुबारक चार जीवन
आधे अधूरे अनिश्चित
मेरे लिए काफी है
एक कतरा संचित
एक बूंद निश्चित।

मृगतृष्णा

क्या है जो बार-बार
ललचाता है
फिर छुप-छुपा जाता है
कभी आके गले लगाता है
पर अक्सर अंगूठा दिखा जाता है।

लुहार का डर

इस तलवार में
न तेज धार है न चमक
लोथड़ा-सा ही है लोहे का
मैंने कभी बनाई ही नहीं थी तलवार
मेरी तो सारी उम्र बीत गई
हल और कुदाल बनाने में।
तलवारें अब तक
सोने की ही बनती रहीं
और उन्हें बनाने की इजाजत भी
केवल स्वर्णकारों को ही थी
तेज चमके तेज चले
गरीब का गला भी काटे
और सबूत भी न छोड़े।
हां तलवारें देखी तो मैंने बहुत थीं
पर मुझे मालूम न था
कि मेरी भट्ठी का कोयला भी
अवैध ही सही
लेकिन कुंती-पुत्र बन सकता है।
लोहे के इस लोथड़े में
खुद ही
एकलव्य जैसी तड़प थी
और मुझे
द्रोणाचार्य बनना मंजूर न था।
बड़ी मेहनत से बनाई
एक काली, बेशक्ल और कुंद चीज
जिसे मैंने एक म्यान में डाल दिया
और बड़े-बड़े योद्धाओं के
कमरबंद ढीले हो गए।
मैं निकला हूं इससे
पराजय का गला काटने
पर डरता हूं
कहीं यह भी
गरीब का ही गला न काटे
और सबूत भी न छोड़े।

धीरे-धीरे

शब्द पकड़ा
अर्थ बीत गया
अर्थ जागा तो
शिल्प रीत गया
शिल्प समझा
तो बिंब सूना
बिंब उतरा
तो रस छूटा
रस आने लगा
तो जीवन बीत गया।