बलराम

कमला ने सत्य प्रकाश पर अचूक तीर चलाया था और उसका वार खाली नहीं गया। तीर सही निशाने पर बैठ कर सत्य प्रकाश के जीवन-जगत को तहस-नहस कर गया। एक ही तीर से कमला ने कई शिकार कर उसे चारों खाने चित्त कर दिया। सब लोग जानते हैं कि उसका क्लासमेट रघुनंदन अब डॉक्टर है। कमला के इस आरोप को बड़े भैया अजय प्रकाश ने ही नहीं, सबने सही मान लिया है कि सत्य प्रकाश के कहने पर डॉक्टर रघुनंदन ने जहर का इंजेक्शन देकर बड़की को मार दिया, वरना ऐसे कैसे पल में प्रलय हो जाती। कहां तो दोपहर की ट्रेन से बड़े भैया अपनी पत्नी को लेकर गांव लौटने वाले थे और कहां उनकी मिट्टी को फूंक-ताप कर खाली हाथ लौटे। यह अनहोनी पलक झपकते इस तरह कैसे हो गई, घर-परिवार और गांव-जवार के सब लोग अवाक् थे, हतप्रभ।

मन में चाहे जिसने जो भी सोचा, पर सत्यप्रकाश पर ऐसा संदेह किसी ने भी नहीं किया था, लेकिन अब तो अपनों और गैरों, सबके मन में संदेह का कीड़ा कुलबुलाने लगा होगा कि हो, न हो, बड़की अपनी मौत न मरीं, उनकी हत्या करवा दी गई और यह कुकर्म सत्य प्रकाश ने करवा दिया, क्योंकि बचपन में बड़की उसे अपने घर रखने के लिए एकदम तैयार न थीं। सत्य प्रकाश और बड़की के बीच नफरत की खाई कभी पाटी न जा सकी और मौका मिलते ही सत्ती ने उसे अपने रास्ते से हटा दिया।

गांव-घर के लोग अच्छी तरह समझते हैं कि पति की मजबूरी समझ कर बड़की उसे अपने घर में रखने के लिए मान तो गई थीं, लेकिन उन्होंने सत्य प्रकाश को सहज रूप से कभी स्वीकार नहीं किया, लेकिन दादी के चलते उनके जीते-जी उस घर में उसकी जड़ें जम गर्इं और वह उसे ही अपना घर समझने लगा। पांच बरस उस गांव-घर में रहते हुए वहां का आसमान उसे अपना लगने लगा था, लेकिन भाभी का वैर भाव नहीं गया, तो फिर नहीं ही गया। घर के बेगानेपन को उसने बाहर मिलते रहे अपनेपन से किसी हद तक भले दूर कर लिया था, लेकिन जैसे ही मौका मिला, वह वहां से भाग निकला और अम्मा-बप्पा के पास पहुंच गया और फिर तभी लौटा, जब बड़की भाभी ने खुद कहा, ‘लौट भी आओ यार, अबकी बार मेरे कहने पर आओ, हमें तुम्हारी जरूरत है।’ सुन कर हुलसता हुआ लौट आया था वह भाई-भाभी के पास, लेकिन कमला की चिट्ठी के इस पांसे का कोई जवाब नहीं है उसके पास। कमला की चिट्ठी से बही हवा जनमत को अब एकमत कर देगी कि अपनी भाभी का हत्यारा है सत्य प्रकाश और मंजरी से प्रेम के चलते अपनी पत्नी को भी राह के कांटे की तरह हटा देने वाला था। बड़ी चालाकी से कमला ने ऐसा अंधड़ उठा दिया, जिसमें फंस कर सत्य प्रकाश का जीवन-जगत तहस-नहस हो गया। कमला के माता-पिता ने तो बड़ी आसानी से सब कुछ सच मान लिया होगा। तभी तो उन्होंने उनका तलाक करवा देने का निर्णय ले लिया है।

कमला को यह सब इतनी आसानी से कर और करवा लेने की राह पर बढ़ा दिया था चंदू के हंसी-मजाक ने। उसके मजाक ने देखो तो कैसे तिल का ताड़ और कण का पहाड़ खड़ा कर दिया। मंजरी और उसके बीच आपसी समझदारी विकसित जरूर हो गई थी, मगर उसे प्यार नहीं कह सकते। प्यार तो वह किसी और से करती थी और शादी भी उसी से करना चाहती थी, पर चाचा का इरादा उसकी शादी किसी और से कर देने का था। जात-पांत का लफड़ा भी तो है। इसके अलावा कमला का पति है वह। मंजरी से शादी करने की बात तो सपने में भी नहीं सोच सकता। हालांकि पहली रात ही कमला से उसका संबंध बिगड़ गया था, मगर कमला को प्यार वह अब भी उतना ही करता है, क्योंकि कमला उसकी कामना है, कमला उसकी भावना है, कमला उसकी पत्नी है और है उसकी नई जिंदगी का आधार। मंच से उसके हटते ही उसकी नई जिंदगी की नींव ही हिल जाएगी, आम हिंदुस्तानी की तरह सत्य प्रकाश ऐसा सोचता है। एक बार को विवाह हो जाने के बाद अब प्रेमिका है तो कमला, प्रियतमा है तो कमला, पत्नी है तो कमला, अर्द्धांगिनी है तो कमला। कमला है, सिर्फ और सिर्फ कमला है, क्योंकि शादी हो जाने के बाद अब कमला ही उसकी कविता है, कमला ही कहानी और कमला ही उसके कर्म-धर्म, सबकी धुरी है, कमला ही उसकी ये है, कमला ही उसकी वो है, मतलब ये कि जो कुछ है, सब कुछ कमला में ही निहित है। कमला है तो वह है, कमला नहीं तो वह भी नहीं। उसकी कमला उसी की बन कर रहे तो ही वह जीवित रहेगा, क्योंकि उसके बाद वह किसी और का नहीं हो सकता, न ही कोई और अब उसका हो सकता है।

मगर अपनी इन पवित्र भावनाओं को कमला के साथ एक पल भी कहां शेयर कर सका सत्य प्रकाश। कमला ने धीरे-धीरे सब कुछ मिटा दिया। एक-एक कर उसके सारे भ्रम उसने तोड़ दिए और अब बड़े भैया के नाम आई कमला की चिट्ठी का इस तरह जन-जन तक पहुंच जाना? उफ! सत्य प्रकाश ने दीर्घ श्वास छोड़ी और अतीत में खो गया। जामगांव से चंद्र प्रकाश आया था। कई दिन रुका और कमला से घुल-मिल गया। कमला उन दिनों श्यामगंज में ही थी। सत्य प्रकाश भी रोज कानपुर से गांव आ जाता। रविवार का दिन था और सब लोग आंगन में बैठे बोल बतिया रहे थे कि हर चौथे दिन कमला के मायके चले जाने का प्रसंग आ गया और प्रसंगवश चंद्र प्रकाश के मुंह से अनायास निकल गया, ‘कमला भाभी, ये रोज-रोज मायके भागोगी तो किसी दिन सत्ती भैया दिल्ली चले जाएंगे मंजरी के पास।’
‘मंजरी! कौन मंजरी?’ कमला के कान खड़े हो गए।
‘वही, जिसके साथ सत्ती भैया जामनगर आकर सोशल वर्क करते हैं।’
‘अच्छा…’ कमला ने आश्चर्य से कहा, मानो कोई बहुत बड़ा रहस्य उजागर हो गया। चंद्र प्रकाश ने आगे और भी जोड़ दिया, ‘उसने हाथ जोड़ते हुए सत्ती भैया से विनती की है कि गर्मियों की छुट्टियों में दिल्ली आओ और हमारे साथ सोशल वर्क करो। तुम्हारे दिल्ली आकर हमारे साथ रहने से मुझे बल मिलेगा। मंजरी की बात सत्ती भैया काट नहीं सके और फिर आप भी तो इनसे लड़-झगड़ कर मायके चली गई थीं उन दिनों। इसीलिए कहता हूं कि सत्ती भैया को बांध कर रखो, वरना फिर मत कहना कि चंदू लाला, सब कुछ जानते-बूझते तुमने हमें बताया-चेताया नहीं।’ चंद्र प्रकाश यह सब एक सांस में कह गया, मानो हमारे हित में उसने कोई बड़ा तीर मार दिया।

हंसी-मजाक में कही गई चंद्र प्रकाश की यह बात कमला ने सुनी थी, घर की बाकी औरतों ने भी। औरतों से होती हुई बात भाइयों तक पहुंची और आज जिस रूप में बड़े-बूढ़ों तक पहुंची है, सत्य प्रकाश के लिए अकल्पनीय है। कमला ने किस चतुराई से उस बात का इस्तेमाल अपने हक में कर लिया। उस मजाक का ऐसा दुरुपयोग हो सकता है, जानता होता तो भूल कर भी ऐसी बात न कहता चंद्र प्रकाश।
‘चंद्र प्रकाश! कौन चंद्र प्रकाश?’ चैपाल में उसका जिक्र आने पर सभापति काका ने पूछा था।

‘अरे वही, सिपाही नाना का पोता, जिसके साथ बचपन में सत्ती खेलते-कूदते रहे। बहन के लिए लड़का देखने आया था श्यामगंज।’ मंझले भैया ने सभापति काका को बताया, ‘सत्ती को सत्य प्रकाश और चंदू को चंद्र प्रकाश नाम सिपाही नाना ने ही तो दिया था।’
‘अच्छा-अच्छा, सत्ती के बचपन का यार है चंद्र प्रकाश।’ सभापति काका ने साश्चर्य कहा था और आज वही सभापति काका मंजरी प्रसंग को इस आरोप के साथ जान गए हैं। न जाने किस अर्थ में ले रहे होंगे। आधे-अधूरे प्रसंग से सभापति काका तो क्या, कोई भी कैसा भी अर्थ-अनर्थ निकाल सकता है। मंजरी प्रसंग को सही रूप में किसी को बताया-समझाया भी तो नहीं जा सकता। वह बेचारी तो भावना में बहती चली आई थी जामगांव, सोशल वर्क का अपना प्रोजेक्ट पूरा करने, लेकिन चाचा ने कहां कुछ करने दिया उसे। मंजरी की मोहक छवि और निर्मल मन को याद करते हुए सत्य प्रकाश विषाद के कुएं से बाहर निकल आया, जहां निस्पंद ढहा पड़ा था। उठा और रामलाल के बगीचे की ओर निकल गया।

बगीचे में पहुंच कर सत्य प्रकाश सहज हुआ, सहज से सहजतर होने में कुएं के आसपास खिले फूलों और उनकी मनभावन महक ने उसकी मदद की। कुएं की जगत के पास एक झिलंगी खाट थी, बिना बिछी, जिस पर लेटते ही ठंडी बयार के झोंके उसे चिर-परिचित सुकून दे गए, किशोरावस्था का जाना-पहचाना सुकून, जब वह रामलाल के साथ बैठ कर यहीं पढ़ा-लिखा करता था। अब तो खैर रामलाल एयरफोर्स में है और अर्से से उससे भेंट नहीं हो पाई, लेकिन वह उसका सबसे प्यारा दोस्त था, लंगोटिया यार। पांव पसार कर सत्य प्रकाश खाट पर लेटा तो मंजरी की यादों ने उसे फिर से गिरफ्त में ले लिया।

केओं… केओं… मोरों की पुकार ने सत्य प्रकाश का ध्यान भंग किया तो उसकी नजर सूरज पर पड़ी, जो अस्त होने जा रहे था और वह! वह सोच रहा था कि उसे भी तो डूबते हुए लोगों के वचन-कुवचन सुनने और सहने हैं। शहर जाकर अकेलेपन की आग में तपना है। आखिरी बार गोपालपुर जाकर वहां भी सब कुछ देखना-सुनना है और फिर तय करना है कि इस महाभारत का विजेता बने या रण छोड़ कर भाग जाए। सोचते हुए सत्य प्रकाश को लगा कि सभापति काका ने शायद ठीक ही कहा है, ‘इस समय खुद को बेगुनाह साबित करने के चक्कर में मत पड़ो, मेरी बात मानो, घर आओ, कुछ पैसे लो और यहां से भाग कर जीवन का नया घरौंदा खींचो। जैसे आज तुम्हें नहीं बचा सका, कल भी नहीं बचा सकूंगा। इसीलिए कह रहा हूं कि इस समय तो तुम दिल्ली ही चले जाओ।’
दिल्ली की बात सोचते ही उसके भीतर मंजरी एक नए रूप में घर करने लगी। धीरे-धीरे, बहुत धीरे!