रोचिका शर्मा
परीक्षा समाप्त हुई और आसपास के सभी बच्चे अपने ननिहाल और ददिहाल जाने की तैयारियों में लग गए। लेकिन चीनू क्या करे, उसकी दादी तो उसके साथ ही रहती हैं और नानी भी उसी शहर में रहती हैं। वह तो अक्सर छुट्टी के दिन नानी के घर ही जाता है, सो अब वहां भी उसके लिए कुछ नयापन नहीं है। वह रोज सुबह देर से उठता। दिन भर टीवी देखता और बाकी समय अपनी मां और पिताजी के मोबाइल में गेम खेलने की जिद करता।
जब-तब उसे मां से डांट ही पड़ती रहती। पिताजी भी जब दफ्तर से आते तो वे उसे बार-बार टोकते, ‘चीनू हर वक्त मोबाइल फोन लेने की यह जिद ठीक नहीं, तुम्हारी आंखें खराब हो जाएंगी।’
यह सब टोका-टाकी और डांट सुनना उसे अच्छा नहीं लगता। सो, वह मुंह बना कर बैठ जाता।
एक दिन उसकी मां उसे जबर्दस्ती सुबह जल्दी जगा कर पास के पार्क में ले गई। वहां बहुत से बच्चे खेल रहे थे। जब वह उनके साथ खेलने लगा, तो दो-तीन दिन में सभी उसके दोस्त बन गए। उनमें से एक लड़की नीना अपने ननिहाल में आई हुई थी और सभी की नई मित्र थी।
जब सब खेलते और बातें करते तो वह बात ही बात में सबको खूब हंसाती, हंस-हंस कर सब लोट-पोट हो जाते।
चीनू उसके मजाकिया स्वभाव से बहुत प्रभावित हुआ।
आज जब सब पार्क में खेलने आए तो सबने गौर किया कि गोपी की पैंट कुछ छोटी है। दरअसल, गोपी की लंबाई बढ़ गई थी।
नीना से रहा नहीं गया। वह बोली, ‘आया ताड़ का झाड़… थोड़े दिन में लेगा लगता अपनी पैंट ये फाड़।’
सभी ठहाका लगा कर हंस पड़े। तब गोपी ने उसका जवाब देते हुए कहा, ‘आई कहां से नीना… गर्मी भी ये संग ले आई… सबको आए पसीना।’
चीनू ने भी रेलमपेल में एक डिब्बा और जोड़ दिया, ‘जबसे आई पार्क में ये है, लगते खूब ठहाके… लोट-पोट हो दर्द पेट में, आती है क्या खा के?’
फिर सभी जोर से हंस पड़े।
अब यह रोज का सिलसिला बन पड़ा था। जब सब पार्क में जाते, एक-दूसरे पर तंज कसते और पैरोडी बना कर एक धुन में गाते।
लेकिन इसमें अच्छी बात यह थी कि कोई किसी का दिल नहीं दुखाता और न ही एक-दूसरे की बात का बुरा मानता।
घर आकर चीनू पूरे दिन हंसता-मुस्कुराता रहता और पार्क में हुए पैरोडी भी गुनगुनाता।
उसकी मां ने जब उसके मुंह से यह पैरोडी सुनी तो खूब हंसी। अब चीनू रोज अपनी मां को पार्क में हुई पैरोडी सुनाता।
मां भी घर में उसके साथ पैरोडी बनाने लगी।
जैसे ही खाना तैयार हुआ मां ने पुकारा, ‘चीनू जल्दी आ जा, मेरे हाथों पका हुआ है खाना ताजा-ताजा… जो भी खाए चट कर जाए पुदीने की चटनी, सब्जी भी है नई नवेली, मशरूम बनाया बटनी।’
चीनू मां की पैरोडी सुन दौड़ा-दौड़ा आया और बोला, ‘गर्मी के दिन बड़े ही लंबे, फिर भी बहुत मजा है… पुदीने की चटनी के संग मशरूम भी खूब सजा है… ठंडक देता पुदीना, मशरूम है फुल प्रोटीन… मैंगो शेक बना लो झट से, बढ़ता हीमोग्लोबिन।’
मां समझ गई थी कि उसके बेटे में भी तुकबंदी का गुण है। सो, उसने झट से बाजार से कुछ पत्रिकाएं लाकर चीनू को दीं। उनमें से एक में ‘हंसगुल्ले’ शीर्षक से एक कॉलम देखा।
बस फिर क्या था, चीनू ने अपने सभी मित्रों को पत्रिका दिखाई। सबने मिलजुल कर पत्रिका पढ़ी और फिर एक चुटीली सी पैरोडी बनाई।
मां ने उस पैरोडी में थोड़ा सुधार कर दिया और चुपचाप पत्रिका में छपने के लिए भेज दी।
अगले ही माह नए अंक में सभी बच्चों द्वारा बनाई गई पैरोडी प्रकाशित हो गई थी और कुछ रुपये मानदेय स्वरूप चीनू के घर मनी-आर्डर से आ गए। सभी बच्चों ने उन रुपयों से पत्रिका की सदस्यता ले ली। फिर क्या था, पत्रिका एक दिन एक के पास और अगले दिन दूसरे के पास। सभी मिलजुल कर पत्रिका पढ़ते और खूब आनंद लेते। अब चीनू मोबाइल और टीवी से ज्यादा गर्मी के हंसगुल्ले पसंद करने लगा था।

