शहरों में अनधिकृत कॉलोनियां एक बड़ी समस्या बन चुकी हैं। इसकी अनेक वजहें हैं। सबसे बड़ी समस्या है, गांवों में रोजगार के अवसर न होना और वहां से बड़ी संख्या मे पलायन। फिर महानगरों में स्थानीय निकायों और राजनीतिक दलों के सियासी स्वार्थों के चलते अनधिकृत कॉलोनियों, व्यावसायिक इमारतों का बनना नहीं रुक पाता। इनके निवासियों को किस तरह बुनियादी सुविधाओं से महरूम रहना पड़ता है और वे कैसे दमघोंटू दायरे में रहते हैं, वह किसी से छिपा नहीं है। अनधिकृत कॉलोनियों, कच्ची और झुग्गी बस्तियों के विस्तार और उनमें तथा उनसे पैदा समस्याओं का जायजा ले रहे हैं पंकज चतुर्वेदी।
हाल ही में दिल्ली की करीब अठारह सौ अनधिकृत कॉलोनियां वैध घोषित कर दी गईं। साफ हवा-पानी को तरसती दिल्ली की ये कॉलोनियां असल में सरकारी जमीन या खेत आदि पर कभी झुग्गी-झोपड़ी के रूप में बसनी शुरू हुई होंगी और अब वहां पक्के मकान हैं। अभी तक वहां सड़क, पानी, बिजली जैसी मूलभूत सुविधाओं का अकाल था। उन पर किसी का मालिकाना हक नहीं था। सरकार की इस घोषणा से कोई चालीस लाख लोगों के घरौंदे अब कानूनी हो गए। अब वहां जन प्रतिनिधि अपनी विकास निधि का धन खर्च कर सकेंगे। हालांकि यह भी सच है कि इन कॉलोनियों का अनियोजित विकास ऐसा है कि वहां आधुनिक सीवर या अन्य सुविधाआें की व्यवस्था करना मुश्किल होगा। बिजली विभाग की मानें तो इन अनधिकृत कॉलोनियों में करीब तीस लाख मीटर लगाए गए हैं। इतनी बड़ी आबादी के चलते चुनावों में हर राजनीतिक दल इनके पीछे भागता है। अब इनकी राजनीतिक स्थिति भी मजबूत हुई है। यही वजह है कि दिल्ली के सभी राजनीतिक दलों में एक झुग्गी झोपड़ी प्रकोष्ठ भी बनाया गया है। यह अवैध कॉलोनी सजाने वालों को एक उम्म्ीद की किरण है, तो दिल्ली के बदतर हालात की ओर एक कदम भी।
भारत के 1947 में बंटवारे के बाद लोग यहां आते गए और घर बसाते चले गए। इसके बाद दूसरे प्रदेशों से लोग आए, तो जमीन कब्जे में लेकर घर बना कर रहने लगे। धीरे-धीरे यह संख्या बढ़ती गई। अधिकारियों का कहना है कि उसी हिसाब से कॉलोनियों को चिह्नित किया जाता रहा। 1993 में पहली बार सर्वे के बाद अनधिकृत कॉलोनियों को चिह्नित किया गया। लोगों को लाकर झुग्गी बसाना और उस जमीन पर कब्जा कर लेना, उसका मुआवजा या मालिकाना हक पाना, उस जमीन की खरीद-फरोख्त करने के दिल्ली में बाकायदा माफिया गिरोह हैं। न तो नेता और न ही आम लोग समझ रहे हैं कि अवैध कोलानियां असल में दिल्ली को ‘अरबन स्लम’ बना रही हैं और इसका खमियाजा यहीं कि बाशिंदों को भुगतना पड़ रहा है। एक बात और, इस बार सन 2015 तक के गैरकानूनी कब्जे को ही कानूनी बनाया गया है, यानी आगे भी वोट दोहन का यह खेल चलता रहेगा।
लगभग एक साल हो रहा है- दिल्ली से सटा गाजियाबाद देश के सबसे दूषित नगरों में अव्वल था। दिल्ली तो है ही जल-जमीन और वायु के दूषित होने का विश्वविख्यात शहर। जब दिल्ली में आबादी लबालब हो गई, तो महानगरीय विस्तार का पूरा दबाव गाजियाबाद पर पड़ा। गाजियाबाद भले दिल्ली से सटा हो, पर अपनी राजधानी से दूर है, सो यहां के दमघोंटू प्रदूषण की परवाह किसी को नहीं है। राज्य सरकार के लिए यह महज राजस्व कमाने का अड््डा है। अगर गंभीरता से आकलन करें तो स्पष्ट होता है कि जिन शहरों में रोजगार के लिए पलायन कर आने वालों की संख्या बढ़ी और उसका अनियोजित विकास हुआ, वहां के हवा-पानी में ज्यादा जहर पाया जाता है। असल में शहरीकरण के कारण पर्यावरण को हो रहे नुकसान का मूल कारण अनियोजित शहरीकरण है। बीते दो दशकों के दौरान यह प्रवृत्ति पूरे देश में बढ़ी।
