हरीश कुमार ‘अमित’

इतवार का दिन था। बच्चों के स्कूल की छुट्टी थी। सुबह का नाश्ता खत्म हुआ ही था कि दादाजी ने घर के सब बच्चों- चिंटू, मिक्की, गुड्डी और पिंकी को अपने कमरे में बुलाया। चारों जा पहुंचे। सभी बच्चे हैरान थे कि दादाजी ने आज उन्हें सुबह के समय अपने पास क्यों बुलाया है। आमतौर पर वे बच्चों को शाम के समय बुलाया करते थे, ताकि उन्हें सैर के लिए पार्क में ले जाया जाए। जैसे ही बच्चे दादाजी के कमरे में पहुंचे, उन्होंने कहा, ‘बच्चो, आज मैं तुम सबको कुछ देना चाहता हूं।’
‘क्या दादाजी?’ पिंकी ने पूछा।
‘बताता हूं, बताता हूं।’ दादाजी मुस्कुराए।
‘जल्दी बताइए न दादाजी।’ मिक्की से रहा नहीं गया।
दादाजी फिर मुस्कुराए और कहा, ‘ऐसा है बच्चो कि मेरे दोस्त शामलाल की टॉफियां बनाने की फैक्ट्री है। उसने अपनी उम्र के पचहत्तर साल पूरे होने की खुशी में अपने सब दोस्तों को बढ़िया टॉफियों का एक-एक डिब्बा दिया है। मुझे भी मिला है एक डिब्बा।’
सुन कर सभी बच्चों के मुंह में पानी भर आया था।
तभी चिंटू ने पूछा, ‘दादाजी, आपको जो डिब्बा मिला है, वह है कहां?’
दादाजी हल्के-से हंसे और कहा, ‘अरे, जरा सब्र तो करो। डिब्बा मेरी अलमारी में बंद है।’
‘तो निकालिए न डिब्बा अलमारी से और हमें टॉफियां दीजिए दादाजी।’ पिंकी ने मचलते हुए कहा।
‘हां-हां, अभी निकालता हूं डिब्बा। मगर तुम बच्चों को टॉफियां मैं नहीं दूंगा।’
‘तो क्या टॉफियां हमें नहीं मिलेंगी?’ चिंटू ने पूछा।
‘घबराओ नहीं बेटा, टॉफियां तुम लोगों को ही मिलेंगी, लेकिन टॉफियां तुम लोग अपने आप लोगे उस डिब्बे से।’ दादाजी ने समझाते हुए कहा।
दादाजी ने अलमारी खोली और टॉफियों का डिब्बा निकाल कर मेज पर रख दिया। सब बच्चे उस रंगबिरंगे डिब्बे को ललचाई नजरों से देख रहे थे।
तभी दादाजी ने कहा, ‘मुझे मालूम नहीं कि इस डिब्बे में कितनी टॉफियां हैं, लेकिन तुममें से हर बच्चे को डिब्बे से चार-चार टॉफियां लेनी हैं। बाकी टॉफियां बाद में मिलेंगी।’

‘ठीक है, दादाजी।’ पिंकी डिब्बे की ओर बढ़ते हुए बोली।
‘एक मिनट रुको। कमरे में सिर्फ एक बच्चा आएगा। वह अपने हिस्से की चार टॉफियां डिब्बे से निकाल कर बाहर आ जाएगा। फिर दूसरा बच्चा कमरे में जाएगा और अपने हिस्से की चार टॉफियां लेकर बाहर आ जाएगा। इस तरह तुम चारों बच्चे अपने-अपने हिस्से की टॉफियां ले लोगे।’ कहते हुए दादाजी थोड़ी देर के लिए रुके और फिर कहा, ‘सबसे पहली बारी पिंकी की होगी, क्योंकि वह उम्र में सबसे छोटी है। उसके बाद उससे बड़ी गुड्डी की बारी…।’
जब चारों बच्चे कमरे से बाहर निकल गए, तो दादाजी ने कमरे का दरवाजा अंदर से बंद कर लिया।
कुछ देर बाद दरवाजा खुला और दादाजी कमरे से बाहर आ गए। बाहर आते ही उन्होंने पिंकी से कहा, ‘पिंकी, अब अंदर जाओ और चार टॉफियां ले लो।’ पिंकी कमरे के अंदर गई और कुछ देर बाद टॉफियां लेकर बाहर आ गई। उसके बाद गुड्डी, मिक्की और चिंटू भी बारी-बारी से कमरे में गए और टॉफियां लेकर आ गए।

तभी पिंकी बोल उठी, ‘अब बाकी की टॉफियां भी ऐसे ही चार-चार करके मिलेंगी, दादाजी?’
पिंकी की बात सुन कर दादाजी ने कहा, ‘बाकी टॉफियां कैसे मिलेंगी और किसको मिलेंगी, इसका फैसला पांच मिनट बाद होगा। मैं अभी आता हूं।’
यह कह कर दादाजी कमरे के अंदर गए और फिर उन्होंने दरवाजा अंदर से बंद कर लिया। चारों बच्चे उत्सुकता से दादाजी के कमरे से बाहर आने का इंतजार करने लगे।
लगभग पांच मिनट बाद दादाजी ने कमरे का दरवाजा खोला और चारों बच्चों को अंदर आने को कहा।
बच्चों ने देखा कि मेज पर टॉफियों के तीन पैकेट पड़े थे।
तभी दादाजी कहने लगे, ‘डिब्बे में बाकी बची टॉफियां तीन बच्चों को ही मिलनी चाहिए।’
‘तीन को ही क्यों, दादाजी? चारों बच्चों को क्यों नहीं?’ गुड्डी ने पूछा।
‘इसलिए कि तुममें से सिर्फ तीन बच्चों ने ईमानदारी से चार-चार टॉफियां ली हैं। एक बच्चे ने चार के बदले छह टॉफियां ले ली हैं।’ दादाजी ने उत्तर दिया।
‘लेकिन दादाजी, आपको कैसे पता? आप तो कमरे से बाहर थे न?’ चिंटू ने पूछा।
दादाजी मुस्कुराए, ‘बेटा, मैं कमरे में नहीं था, पर मेरा मोबाइल फोन तो कमरे में ही था न! तुम लोगों के टॉफियां लेने के लिए आने से पहले जब मैंने कुछ देर के लिए दरवाजा बंद किया था, तो अपने मोबाइल को वीडियो बनाने के लिए सेट करके पलंग पर इस तरह रख दिया था कि टॉफियां लेते हुए बच्चे और डिब्बे की फोटो खिंचती रहे। अभी कुछ देर पहले मैंने जब दोबारा दरवाजा बंद किया, तो मैंने वह वीडियो देखा। देखा कि पिंकी, गुड्डी और चिंटू ने तो चार-चार टॉफियां लीं, मगर मिक्की ने पहले चार टॉफियां लीं और फिर इधर-उधर देखते हुए दो टॉफियां और उठा लीं यानी कि छह टॉफियां ले लीं।’

दादाजी की बात सुन कर पिंकी, गुड्डी और चिंटू मिक्की की ओर देखने लगे। मिक्की ने अपना सिर झुका लिया।
‘सॉरी, दादाजी। मेरे मन में टॉफियों का लालच आ गया था।’ सिर झुकाए-झुकाए मिक्की ने कहा।
‘दादाजी, अब मिक्की भइया को और टॉफियां नहीं मिलेंगी क्या?’ पिंकी पूछने लगी।
इससे पहले कि दादाजी कुछ कहते, मिक्की बोल उठा, ‘मुझे माफ कर दीजिए, दादाजी। मैं आगे से ऐसा नहीं करूंगा। प्रॉमिस, दादाजी।’
‘हां दादाजी, अगर मिक्की भइया को और टॉफियां नहीं मिलीं, तो हमें अच्छा नहीं लगेगा।’ गुड्डी बोली।
‘हां दादाजी। हमसे तो खाई ही नहीं जाएंगी टॉफियां।’ चिंटू बोला।
यह सब सुन कर दादाजी ने कुछ देर सोचा और फिर बोले, ‘ठीक है, अगर मिक्की अपने किए पर शर्मिंदा है तो फिर उसे सजा नहीं मिलेगी। उसे भी टॉफियां मिलेंगी, पर…।’ कहते-कहते दादाजी रूक गए।
‘पर क्या, दादाजी?’ गुड्डी ने पूछा।
‘पर मिक्की को दो टॉफियां कम मिलेंगी। उसने दो टॉफियां पहले ही ज्यादा ले ली हैं न!’ दादाजी ने मेज की ओर इशारा करते हुए आगे कहा, ‘टॉफियों के ये तीन ढेर पिंकी, गुड्डी और चिंटू के लिए हैं और मिक्की के लिए जो टॉफियां हैं, वे डिब्बे में हैं। मिक्की की टॉफियां बाकी बच्चों की टॉफियों से दो कम हैं। चलो, ले लो अपनी-अपनी टॉफियां।’
जब बच्चों ने टॉफियां ले लीं, तो दादाजी ने टॉफियों का वह खाली डिब्बा अपने दोस्त शामलाल की निशानी के रूप में अपने पास रख लिया।