आनंद कुमार सिंह

कोई भी रचनाकार अपने समय में घट रही घटनाओं और व्यवस्थागत स्थितियों-परिस्थितियों से प्रभावित हुए बिना नहीं रह सकता। बहुत सारे लोग इससे इतने उद्वेलित हो उठते हैं कि तुरंत उस पर कोई रचना कर देते हैं। यह स्थिति साहित्य और अन्य सभी कलाओं में देखी जाती है। सोशल मीडिया के प्रसार ने तात्कालिकता से उत्पन्न रचनाओं को परोसने का एक बड़ा मैदान दे दिया है। मगर तात्कालिक दबाव से उत्पन्न रचना कितना टिकाऊ हो पाती है और रचना के लिए तात्कालिकता कितनी जरूरी चीज है, इसे लेकर सवाल उठते रहते हैं। खासकर सोशल मीडिया के इस जमाने में ये सवाल कुछ अधिक गाढ़े हुए हैं। इस बार की चर्चा इसी पर।

तत्कालिकता और रचनात्मकता का क्या रिश्ता है? रचनात्मक लेखकों के लिए यानी साहित्यकारों के लिए तात्कालिकता का क्या महत्त्व है? कई बार कहा जाता है कि तात्कालिक बातों के दबाव से ही रचना जन्म लेती है। पर हम सभी जानते हैं कि ऐसा है नहीं। रचनात्मक दबाव समसामयिक या दैनंदिन घटनाओं का मिलाजुला असर पैदा करता है यहां तक तो ठीक ही है, लेकिन हमेशा यह सच नहीं है। देखा जा रहा है कि तात्कालिक घटनाओं पर संवेदनात्मक बहावों का प्रचलन हालिया घटनाओं के लिहाज से सोशल मीडिया पर बहुत तेजी से फैलने लगा है। सोशल मीडिया की त्वरा का दबाव इतना बढ़ गया है कि एक घटना, जो राजनीतिक या सामाजिक क्षेत्र की होती है उस पर फौरी तौर पर कविता या लघुकथा पलक झपकते ही तैयार हो जाती है।

आजकल की पत्र-पत्रिकाओं में छपने वाली कविताओं को देख कर लगता है जैसे इन लेखकों को उत्प्रेरक खुराक मिल गई हो। ऐसा लगता है कि इस बेवजह भागमभाग में बाजार या सड़क पर घटने वाली घटना का कोई भी चिथड़ा रचनाकारों के हाथ में आ जाए और तत्काल एक कविता रची जाए। दरअसल, मानवीय संवेदना का वह सोता ही सूख गया लगता है, जिससे रचनात्मक अंशों का आनंद लेने की नजर से साहित्य की महत्ता बनती है।

आजकल सूचना के विस्फोट से सभी बातें आम बातें हो गई हैं। इससे हुआ यह है कि लगभग हर सही या गलत घटना पर सतही रचनात्मक टिप्पणी को कविता बनाते चलने की आदत नए कवियों में बेतहाशा बढ़ी है। स्थिति तो यहां तक गंभीर हो गई है कि अगर आपने फेसबुक पर दर्ज तात्कालिक घटनाओं पर कोई टिप्पणी नहीं की या कोई कविता नहीं लिखी तो आपकी ‘पॉलिटिक्स’ शंकास्पद हो उठती है।

तात्कालिक घटनाओं के दबाव से जहां उथली रचनात्मकता में ज्वार आ जाता है, वहीं जहीन ‘क्रिएटिविटी’ पर बहुत असर नहीं होता। सुशांत मनोदशा में उनके संवेग आकार ग्रहण करते रहते हैं। मगर उथली रचनात्मकता का हश्र भयानक रूप से पतनशील हो जाता है। यह एक ऐसा व्यूह बन जाता है, जिसमें आप अपने वास्तविक व्यक्तित्व से घटाए जाकर सतह पर उतराने लगते हैं और जैसे फौरन आपकी जवाबदेही सुनिश्चित होने लगती है। इस तरह यह एक बेहद खतरनाक मामला बन गया है।

रामधारी सिंह दिनकर ने ‘रश्मिलोक’ की भूमिका में लिखा है कि साहित्य में ऐसा नहीं होता कि सड़क पर कोई थप्पड़ खाए और घर आकर कविता लिख दे। किसी भी भाव को पकने में और पूरी तरह पच जाने में समय लगता है। जब कोई भाव पक कर रचनाकार के व्यक्तित्व का हिस्सा बन जाता है, तभी वह रस की सृष्टि भी कर पाता है। अज्ञेय की एक कविता है- ‘सर्जना के क्षण’, जिसमें उन्होंने कहा है कि सर्जना के क्षण तो लंबे नहीं होते हैं, लेकिन एक भाव को मोती बनने में बरस पर बरस बीत जाते हैं। इसलिए स्वाति की बूंद की तरह किसी गहरे भाव का रचनात्मकता की सीपी में बंद हो जाना अधिक महत्त्वपूर्ण है। तात्कालिक दबाव अगर सर्जक के मन में उसके संवेदनात्मक खुलेपन के कारण प्रविष्ट हो जाते हैं, तो यह अधिक काम्य स्थिति है। वे भाव कवि के अंतर्मन में पकते रहेंगे, लेकिन उनके पूरी तरह पचने में कितना समय लगेगा, यह कहा नहीं जा सकता।

साहित्य के शास्त्र में रचनात्मक दबावों का उल्लेख नहीं है। अलबत्ता वडर््सवर्थ जैसे कवि ने कविता की परिभाषा में यह कहा था कि रचने के लिए शांत मनोदशा जरूरी है। वे इसे बहुत महत्त्वपूर्ण मानते हैं, क्योंकि जीवन के गहरे अनुभव सुस्थिर मनोदशा में ही अचेतन तलों से बाहर आते हैं। एक प्रकार से देखें तो मन की अंदरूनी तहों में दरअसल वे सोए हुए आवेग ही हैं। एक कविता में वडर््सवर्थ ने ही कहा था कि जब जब मैं इंद्रधनुष देखता हूं, मुझे रोमांच हो आता है। यानी तात्कालिक अनुभवों की उत्कट सघनता कवि को किसी गहरे अनुभव की प्रतीति अवश्य कराती है।

प्राय: यह देखा गया है कि अलग-अलग रचनाकारों को लिखने के लिए अलग-अलग प्रेरणाओं की जरूरत होती है। कुछ प्रेरणाएं तो विचित्र हैं, जैसे डीएच लारेंस को सेब की गंध से प्रेरणा मिलती थी और अज्ञेय को संतरे की गंध से। संभवत: रचनाकारों के लिए इससे मन की सतहों के भीतर पैठना आसान हो जाता होगा। लेकिन शांत मनोदशा में ही संवेग जन्म लेते हैं यह आवश्यक नहीं है। जॉर्ज गुरजिएफ जैसा बड़ा रहस्यदर्शी कॉफी हाउस में घंटों बैठ कर ‘बीलजबब की कहानियां’ लिख सकता था। बल्कि कॉफी हाउस के कोलाहल में ही उसे चित्त की वह सुशांत मनोदशा मिलती थी, जिससे बिल्कुल निस्संग होकर वह गहरे से गहरे अनुभवों को उकेर देता था। उसके लिए तात्कालिक घटनाएं महत्त्वपूर्ण नहीं थीं, लेकिन उसमें सर्जना का आवेश ही इतना बढ़ा हुआ था कि आसपास फैले हुए सारे कोलाहल और उसके दबावों को परे ठेल कर अपने भीतर धंस सकता था। रचना में तात्कालिक घटनाओं के दबाव से नहीं, बल्कि रचनात्मकता के तात्कालिक दबाव से उसका लेखन चलता था।

असल में गहरे और टिकाऊ लेखन के लिए तात्कालिक घटनाएं उतनी बड़ी प्रेरणा नहीं बनतीं, जितनी कि वे घटनाएं एक मानसिक दबाव पैदा कर देती हैं, जिनसे लेखकों के मन में छाई हुई धुंध हट जाती है और वे लिखने के लिए विवश हो जाते हैं। यह लिखना एक प्रकार का विरेचन है, जो संस्कार रूप में मन के भीतर जमा होते गए छोटे-बड़े आघातों और संवेगों का कुल जमा निचोड़ होता है। अब इसे जागृत करने में तात्कालिक घटनाओं की भूमिका कितनी है यह उस लेखक के विवेक और उसकी प्रेरणात्मक मनोभूमि की सक्रियता पर ही अधिक निर्भर करता है।

इसके साथ ही हमें स्मरण रखना होगा कि तात्कालिक घटनाएं अपने समाज को अचेतन रूप से प्रभावित करती चलती हैं। साहित्य के दृष्टिकोण से ये तब अधिक असर डालने लगती हैं जब वे समाज की चित्तवृत्तियों को प्रभावित करने लगती हैं। रामचंद्र शुक्ल ने हिंदी साहित्य के इतिहास की शुरुआत में ही कहा कि ‘प्रत्येक देश का साहित्य वहां की जनता की चित्तवृत्ति का संचित प्रतिबिंब होता है’। इसलिए ‘जनता की चित्त वृत्ति’ या ‘सामाजिक स्मृति’ के निर्माण और संरक्षण में उस प्रत्येक घटना की भूमिका अनिवार्य तौर पर होती है, जो समाज या देश की संस्कृति से जुड़ी होती है। कोई भी घटना जो संस्कृति की सतह पर आकार लेती है, धीरे-धीरे वह सामाजिक बनावट की जड़ों को प्रभावित करती है। रचनाकार का सांस्कृतिक जुड़ाव इन जड़ों या परंपराओं से रहता ही है। कविता में इन परंपराओं की अभिव्यक्ति होती चलती है। हिंदी साहित्य में ही देखा जाए तो जातीय स्मृतियों से विच्छिन्न रचनाकार सामाजिक मनोविज्ञान में अधिक गहरे नहीं जा सके। इसके बरक्स जो परंपरा को ठीक से समझते रहे उनका संप्रेषण अधिक ताकतवर रहा। बड़े रचनाकारों को समझने की यह एक कुंजी भी है।

भारत जैसे पारंपरिक देश में कविता का महत्त्व इसीलिए सबसे अधिक रहा और कवियों की स्थिति भी तत्त्वज्ञानियों और राजपुरुषों के समकक्ष ही आंकी गई। भक्तिकाल के कवियों की रचनात्मकता का सारा रहस्य उस तात्कालिक उथल-पुथल में दिखाई देता है, जो उस काल की सामाजिक स्मृति को या जनता की चित्तवृत्ति को प्रभावित कर रहा था। लेकिन यह कहने का यह भी मतलब नहीं है कि सल्तनत काल में हो रहे अत्याचारों को देख कर कविगण कविता करने बैठ जाते थे। भूषण जैसे रीतिकालीन कवियों ने तात्कालिक दबावों में आकर रचनाएं की हैं, लेकिन उन रचनाओं के भीतर का मनोविज्ञान इस देश में पिछले चार-पांच सौ वर्षों से चुपचाप बनता चल रहा था। इसलिए तात्कालिक घटनाएं उन अनुषंगों और प्रभावों को पैदा करने में सहायक बन जाती हैं, जिनसे सांस्कृतिक संघर्षों का अंत:सलिल बहाव एकत्र होकर आगे आ जाता है।

दुनिया भर में विश्वयुद्ध को लेकर साहित्यिक रचनाएं हुई हैं, जिनसे कथा और कविता के नए मानक भी बने हैं, लेकिन हमें यह भी याद रखना चाहिए कि ऐसी समस्त रचनाओं की शक्ति का रहस्य तात्कालिक घटनाओं में न होकर उन उद्वेलनों में ही रहा है, जो जातीय संघर्षों के जरिए सामाजिक स्मृति का हिस्सा बनते गए हैं। अंतत: यही कहना सही लगता है कि तात्कालिकता साहित्य में ‘कंटेंट’ की तरह उपलब्ध होकर सतही साहित्य को प्रकट करती आई है, जबकि वह उन्मेष की तरह कारक बन कर बड़े विचारों को जन्म देती रही है। यही कारण है कि विश्वयुद्धों के बाद जो अस्तित्ववादी कथानकों की बाढ़-सी आई उनमें तात्कालिक रचनाएं तो रिपोर्ताज में बदल गर्इं, लेकिन कालजयी रचनाएं सार्त्र और कामू के साहित्य के जरिए सामने आर्इं।

हमारे देश में भी विभाजन जैसी भयानक समस्या को लेकर अनेक कहानियां और उपन्यास लिखे गए। सांप्रदायिकता, आतंक, युद्ध और सामाजिक उन्माद तथा प्रकृतिक विभीषिकाओं को केंद्र बना कर उच्चतर साहित्य की सृष्टि की गई। छायावाद की शिखर काव्य रचना ‘कामायनी’ हो या प्रेमचंद का क्लासिक उपन्यास ‘गोदान’- इनमें भी तात्कालिकता की उत्प्रेरणाएं और सामाजिक स्मृतियों के दबाव मौजूद हैं। द्वितीय विश्वयुद्ध में भारत की सैनिक सहभागिता के कारण दिनकर ने ‘कुरुक्षेत्र’ में और भारती ने ‘अंधायुग’ में युद्ध और शांति के प्रश्नों पर चिंतन किया। मुक्तिबोध और अज्ञेय की कविताओं में जमाने भर की हलचलें प्रतिध्वनि होती दिखती हैं। लेकिन ये सभी प्रभाव केवल रचनात्मक उन्मेष के हिस्से बन कर आए हैं, सूचनाओं की अंतहीन धमक उनमें नहीं है। दरअसल, कृती साहित्य रचा ही तभी जाता है जब तात्कालिक दबाव बढ़ते जाते हैं और सृजनात्मक अंतश्चेतनाएं बाहर आने को कुलबुलाने लगती हैं। बड़े और परिवर्तनकारी साहित्य का जन्म भी तभी होता है।