परीक्षा के दिन हैं। बच्चों, खासकर पहली बार बोर्ड परीक्षा में बैठने जा रहे बच्चों के लिए ये ज्यादा तनाव के दिन हैं। कई बच्चे अधिक नंबर लाने की चिंता में देखे जाते हैं, तो कुछ ऐसे भी होते हैं, जो इस भय से परेशान रहते हैं कि कहीं वे फेल न हो जाएं। कई ऐसे भी बच्चे होते हैं, जो साल भर लापरवाही से पढ़ाई करते आए होते हैं, उन्हें लगता है कि परीक्षा के दिनों में पढ़ कर वे पास हो जाएंगे। मगर जैसे-जैसे परीक्षा नजदीक आती जाती है, उन पर पाठ्यक्रम पूरा न हो पाने का दबाव और तनाव बढ़ता जाता है। जैसे-जैसे पाठ्यक्रम पूरा नहीं हो पाता, वे अपने आप को इस बात के लिए तैयार करने लगते हैं कि नंबर कम भी आएंगे, तो कोई बात नहीं, फिर वे अपने को यहां तक तैयार कर लेते हैं कि फेल भी हो गए, तो कोई बात नहीं। इसके लिए वे तरह-तरह के तर्क जुटाते रहते हैं।
बच्चों की ऐसी हरकतों से माता-पिता का तनाव बढ़ता जाता है। वे बच्चों पर लगातार दबाव बनाए रहते हैं। वे बार-बार दोहराते और भय दिलाते रहते हैं कि अगर अच्छे नंबर नहीं आए, तो लटक जाओगे, अगली कक्षा में अच्छे विषय नहीं मिलेंगे। वे उन्हें खेल-कूद, टीवी वगैरह से मन हटा कर सिर्फ पढ़ने पर ध्यान केंद्रित करने पर जोर देते रहते हैं। जो कुछ संपन्न हैं, वे ट्यूटर लगा देते हैं। फिर ट्यूटर भी बच्चे को लगातार यह अहसास दिलाता रहता है कि वह बहुत कमजोर है और अगर मेहनत नहीं करेगा, तो उसका बेड़ा पार नहीं लगेगा। इस तरह बच्चे पर अनेक प्रकार से दबाव बनते जाते हैं। पहले तो स्कूल में उसके अध्यापक उसे कोंचते हैं, फिर वह अपने दोस्तों के बीच कमजोर साबित होता है, उसके बाद माता-पिता उसे उसकी कमजोरी का अहसास दिलाते रहते हैं और फिर ट्यूटर से भी वही बातें उसे सुनने को मिलती हैं। इस तरह बच्चा जिद्दी हो जाता है। वह ढीठ हो जाता है और किताबों की तरफ उसका मन बिल्कुल नहीं लगता।
लक्षण
परीक्षा के भय की वजह से बच्चों में एक प्रकार का मनोविकार पैदा हो जाता है, जिसे एग्जाम फीवर या एग्जाम फोबिया भी कहते हैं। ऐसे बच्चों के मन से परीक्षा का भय समाप्त करने के लिए माता-पिता को सख्ती के बजाय संयम से काम लेना चाहिए और बच्चे की गतिविधियों पर नजर रखना चाहिए। परीक्षा के आतंक से भयभीत बच्चों में कुछ लक्षण स्पष्ट देखे जाते हैं। उनमें से कुछ लक्षण हैं- लगातार सिर दर्द की शिकायत, बदन दर्द की शिकायत, भूख न लगना, बार-बार वॉशरूम भागना यानी पाचन शक्ति कमजोर होना, सांस लेने में तकलीफ होना। जिन बच्चों को अस्थमा की शिकायत है, उन्हें बार-बार अस्थमा के अटैक पड़ना, तनाव में बेचैन रहना, ठीक से लिख न पाना, लिखावट खराब होना, कुछ भी याद न रख पाना।
ऐसे बच्चे पढ़ाई-लिखाई से भागते हैं और अपना मन दूसरी चीजों में लगाने का प्रयास करते हैं। जिन बच्चों को पढ़ाई-लिखाई से अरुचि हो गई हो, वे सुबह देर तक सोते हैं। इन दिनों सर्दी का मौसम है, सो वे ढंड का बहाना बना कर रजाई में देर तक दुबके रहते हैं। वे किताबों के बजाय टीवी कार्यक्रमों में रुचि अधिक लेने लगते हैं। अगर उन्हें टीवी या मोबाइल फोन पर कार्यक्रम देखने, गेम वगैरह खेलने सो बरजें, तो वे चिड़चिड़ा होकर जवाब देते हैं। आक्रोश से भरे रहते हैं, मामूली बातों पर भी झगड़ने को तैयार हो जाते हैं या फिर हताश होकर रोने लगेंगे। ऐसे बच्चों को या तो बहुत भूख लगती है या बिल्कुल नहीं लगती। इस तरह उनके खाने-पीने का चक्र गड़बड़ हो जाता है। वे अकेले रहना पसंद करते हैं। माता-पिता से बातें नहीं करते, कमरा बंद करके पड़े रहते हैं या पढ़ने का दिखावा करते हैं।
माता-पिता की जिम्मेदारी
अगर आपके बच्चे में ये सब लक्षण नजर आ रहे हैं, तो सावधान हो जाएं। अभी परीक्षा शुरू होने में थोड़ा वक्त है और अभी से सावधानी बरतेंगे, तो बच्चे के मन से परीक्षा का भय समाप्त हो सकता है। वह साहस के साथ परीक्षा में बैठेगा।
प्यार से बातें करें
अगर बच्चे में परीक्षा के भय के लक्षण दिखाई दे रहे हों, वह निराश लग रहा हो, उसका आत्मविश्वास डोल गया हो, तो उसे बार-बार पढ़ने के लिए डांटें-फटकारें नहीं। प्यार से बातें करें। पढ़ाई की बातें करने के बजाय प्रेरक प्रसंग सुनाएं और उसे लगातार प्रेरित करते रहें। उसे समझाएं कि अगर अंक कम भी आ जाएं, तो कोई बात नहीं, अगली कक्षा में मेहनत करके अच्छे अंक लाए जा सकते हैं। इस बात का ध्यान रखें कि अगर बच्चा किसी बात पर झुंझलाता है, गुस्सा करता है, किसी बात से नाराज होकर कमरा बंद करके बैठ जाता है, तो उस पर गुस्सा न करें, डांटें-डपटें नहीं। संयम रखते हुए उससे बातें करें, गले लगा कर उसे मनाएं।
गतिविधियों में शामिल करें
अगर बच्चा अधिक टीवी देखने या मोबाइल फोन पर गेम खेलने में समय बिताता है, तो इसके लिए उसे झिड़कें नहीं, बल्कि उसका ध्यान दूसरी गतिविधियों में लगाने का प्रयास करें। जैसे जब भी आप कहीं बाहर जाते हों, तो बच्चे को भी साथ ले जाएं। घरेलू जिम्मेदारियां सौंपें, जैसे, सब्जी लाना, दूध लाना वगैरह। अगर घर में पौधे हैं, तो उनमें पानी देने की जिम्मेदारी उसे सौंप सकते हैं। इसी तरह अगर कुत्ता, बिल्ली आदि पाल रखा है, तो उन्हें घुमाने का समय तय कर दें। इस तरह उसका ध्यान किताबों से हट कर कुछ रचनात्मक कामों में लगेगा।
योगाभ्यास कराएं
रोज सुबह जल्दी उठने की आदत डालें। रात को दस बजे तक बच्चे को सुला दें। आजकल बच्चे पढ़ाई या फिर टीवी देखने, गेम खेलने में देर तक समय जाया करते हैं और देर रात तक जगते रहते हैं। इस आदत को छुड़ाएं। सुबह जल्दी जाग कर नहा-धोकर उन्हें नाश्ता करा दें। अगर स्कूल नहीं जाना है, तो उसे कुछ देर हल्का-फुल्का योगासन करने को कहें। फिर पढ़ने का समय तय कर दें। पढ़ने के लिए टाइम टेबल कुछ इस तरह तैयार करें कि उसमें उसके बाहर जाकर खेलने का भी समय तय हो।
पढ़ें-पढ़ाएं
परीक्षा के दिनों में अक्सर माता-पिता बच्चे के पीछे डंडा लेकर पड़ जाते हैं और उन्हें खुद पढ़ाने लगते हैं। पढ़ाना अच्छी बात है, पर इन दिनों कड़ाई से कराई जाने वाली पढ़ाई बच्चे के मन पर प्रतिकूल असर डालती है। इस समय अच्छा यह होता है कि आप बच्चे को खुद पढ़ने को कहें और फिर उसने जो पढ़ा है, उसे उसको समझाने को कहें। उसके सामने आप विद्यार्थी की तरह बैठ जाएं और उससे समझें कि जो पाठ उसने पढ़ा है, वह क्या है। आप उससे जिज्ञासा करें, सवाल नहीं। इस तरह कतई न पूछें, जैसे आप उसकी परीक्षा ले रहे हों। उससे समझने का प्रयास करें। वह आपको समझाएगा, तो उसे ऐसा सुख मिलेगा कि जैसे वह अध्यापक की जगह है और आपसे अधिक उस विषय में जानता है। इस तरह उसका आत्मविश्वास भी बढ़ेगा और अगर कहीं वह खुद को कमजोर महसूस करेगा, तो खुद को दुरुस्त भी करेगा।
