दुनिया के खूबसूरत शहरों में शुमार है पेरिस। वह भी आज कृषि के नए प्रयोग के लिए अग्रसर है। पेरिस के दक्षिण-पश्चिम हिस्से में चौदह हजार वर्ग मीटर में फैली छह मंजिली इमारत की ऊपरी छत (रूफ टॉप) पर अर्बन फार्मिंग का निर्माण किया गया है। कहा जाता है कि यह अर्बन फार्मिंग दुनिया में अपनी तरह के सबसे बड़े फार्म पर होगी। इसकी देख-रेख तीस प्रशिक्षित माली करते हैं और यहां तीस तरह के पौधे लगाए जाएंगे तथा एक हजार किलो फल और सब्जियां मिलेंगी। इसके संस्थापक पास्कल हार्डी का कहना है, ‘हमारा विजन एक ऐसे शहर का है, जहां हर खाली छत और खाली जगह पर फार्मिंग हो, और हर शहरवासी शहर को खिलाने में योगदान देगा, जबकि आज शहरी लोग सिर्फ खाने वालों का समूह हैं।’ क्यूबा की राजधानी हवाना 1990 से अर्बन फार्मिंग की तरफ अग्रसर है और आज वह अर्बन फार्मिंग में अग्रणी शहर है। एक वक्त विकसित देशों ने अपने शहरों से कृषि और पशुपालन को अलविदा कहा था, आज उन्हीं शहरों में खेती धीरे-धीरे पैर पसारते हुए आंदोलन का रूप लेती जा रही है।
एक जमाने में अमेरिका का डेटोरेट शहर ऑटोमोबाइल इंडस्ट्री का हब माना जाता था। यह 2012 में दिवालिया हो गया। शहर का कारोबार ठप हो गया। धीरे-धीरे शहर फिर से पुनर्निर्माण की ओर अग्रसर हुआ, पहले से बदले हुए स्वरूप में। शहर के नए मास्टर प्लान में शहरी कृषि और पशुपालन को समाहित किया गया और उसके अनुकूल ढांचागत सुविधा भी। न्यूयार्क शहर में सात सौ किस्म के कृषि-उत्पादन हो रहे हैं। यह खेती शहर में खाली पड़ी जमीनों, कंपनियों के खाली मैदानों, रेलवे लाइन के किनारे की भूमि और सड़क के दोनों किनारों की खाली जमीनों पर की जा रही है। लंदन में तेरह हजार पांच सौ छियासठ हेक्टेयर में खेती हो रही है। इसमें पंद्रह प्रतिशत जमीन शहर के अंदर है और बाकी अर्ध-शहरी इलाकों में है। रूस के पीटर्सबर्ग में शहरी खेती से बीस लाख लोगों की पारिवारिक आमदनी में मदद मिलती है। इसके अलावा नीदरलैंड, फिनलैंड, स्पेन आदि देशों में शहरी खेती और उससे जुड़ी गतिविधियों को प्रोत्साहन देने के लिए विशेष ध्यान दिया जा रहा है। लैटिन अमेरिका, आॅस्ट्रेलिया के साथ-साथ दक्षिण एशिया में शहरी कृषि के अलग-अलग स्वरूप तेजी से फैल रहे हैं।
भारतीय शहर भी इससे अछूते नहीं हैं। सरकार द्वारा शहरी खेती पर तमाम कानूनी बंदिशों के बाद भी हमारे शहरों में खेती जारी है। हम लोग दिल्ली में कृषि और उससे जुड़ी हुई गतिविधियों को जानने-समझने की कोशिश कर रहे हैं। इसी अभियान के दौरान इस साल अगस्त में यमुना नदी के किनारे घूम रहे थे। यमुना पर बना वजीराबाद बैराज यमुना को दो हिस्सों में बांटता है। जब हम वजीराबाद बैराज के पास यमुना के पूर्वी किनारे पर घूम रहे थे, तो देखा कि एक विदेशी मूल का नागरिक उमस-भरी दोपहर की धूप में घास पर बैठ कर यमुना में बंसी से मछली पकड़ने में मशगूल है। हमने उससे जानने की कोशिश की कि वह यहां इतनी कड़कड़ाती धूप और उमस में क्यों बैठा है और वह यहां तक कैसे आया? उसने बताया, ‘मैं कोरिया का रहने वाला हूं और दिल्ली में कोरियन दूतावास में पदाधिकारी हूं। मैं मछली पकड़ने का बहुत शौकीन हूं। जब मेरा पदस्थापन दिल्ली दूतावास में हुआ, तब मैं ऐसे स्थान की तलाश करने लगा, जहां मैं अपने मछली पकड़ने के शौक को पूरा कर सकूं। मैंने नेट के सहारे यमुना नदी के इस स्थान की तलाश की और पिछले दो वर्षों से हर रविवार को यहां आकर मछली पकड़ने में समय बिताता हूं।’
उस दिन हम लोगों ने देखा कि वजीराबाद बैराज के ऊपर यमुना के पूर्वी और पश्चिमी दोनों किनारों पर बहुत बड़ी संख्या में लोग अकेले या समूह में मछली पकड़ने के लिए आए हुए हैं। बात करने पर उन्होंने बताया कि हम रोजगार तो कोई और करते हैं, लेकिन जब भी अवकाश मिलता है, यहां आ जाते हैं और भाग-दौड़ की जिंदगी से कुछ देर के लिए अलग हो जाते हैं। यहां मछुआरों के भी कई समूह हैं, जो विगत चार दशक से यमुना में मछली पकड़ते हैं। यह उनका व्यवसाय भी है, इसके लिए दिल्ली सरकार अलग लाइसेंस देती है। इन मछुआरा समाज के लोगों ने यमुना के बगल में एक कॉलोनी भी बसाई है, जिसे बंगाली कॉलोनी के नाम से जाना जाता है। ये लोग मूल रूप से पश्चिम बंगाल के रहने वाले हैं। इनका कहना है कि मछली के उत्पादन और इससे जुड़ा हुआ काम ‘जल कृषि’ की श्रेणी में है, जो कृषि का ही हिस्सा है।
जब हम नदी के पश्चिमी किनारे पर उत्तर की ओर बढ़े, तो खेतों में लहलाती धान की फसल का एक समतल मैदान दिखा और ऐसा लगा कि यह दिल्ली नहीं है। जबकि यह इलाका दिल्ली का ही है। पल्ला, हिरनकी, बुराड़ी, मुखमेलपुर, बख्तावरपुर, तिग्गी आदि दिल्ली में ऐसे सैकड़ों गांव हैं, जहां बदलते मौसम और बदलती मिट्टी के अनुसार फसलें भी बदल जाती हैं। हमारी मुलाकात पल्ला गांव में एक नौजवान से हुई। वह चौबीस-पच्चीस वर्ष का है, हर तरह से आधुनिक। विगत दो सालों से वह कॉरपोरेट की अपनी नौकरी छोड़ कर खेतों की मिट्टी से खेल रहा है। उसके घर के सब लोग नाराज हैं। उसने बताया कि उसकी मां कहती है, ‘हमने तुम्हें इसलिए पढ़ाया था कि तुम वापस खेती करो!’ उसने बताया कि वह एक कंपनी में इंजिनियर था, सुबह से आधी रात तक फोन सुनने और उस पर अमल करने में जिंदगी निकल रही थी। वहां सुख-सुविधा के सभी सामान थे, नहीं था तो अवकाश और सुकून। अब जब मैं खेत पर आता हूं तो यहां से जाने का दिल नहीं करता। उसने बताया कि दिल्ली विकास प्राधिकरण ने दिल्ली मास्टर प्लान के तहत सभी गांवों की खेती की जमीनों को अलग-अलग योजनाओं में डाल कर गांवों को शहरी श्रेणी में कर दिया है, जिसके तहत दिल्ली में कृषि गतिविधि गैर-कानूनी है। इस वजह से दिल्ली के किसान कृषि से जुड़ी सरकारी सुविधाओं से वंचित हैं। इस इलाके के किसान धान और गेहूं की पराली को संजो कर रखते हैं और उसका इस्तेमाल मशरूम की खेती करने में करते हैं।
ऐसा नहीं है कि दिल्ली में सिर्फ भू-स्वामी किसान ही खेती करते हैं। बदलते समय में खेती करने के तरीके और समूहों में भी परिवर्तन हो रहे हैं। दिल्ली का बहुत बड़ा भू-भाग, खेती की जमीन किसानों से अधिगृहीत करके, साधन-संपन्न वर्ग को फार्म हाउस बनाने के लिए दिया गया है। उन जमीनों का वे बहुआयामी उपयोग कर रहे हैं, जिसमें खेती भी एक है। लेकिन वह खेती आम तरह की नहीं है, वह खास है और खास वर्ग के लिए है। फार्म हाउस के धंधे में बड़े नौकरशाहों, व्यवसाइयों, राजनेताओं के साथ-साथ बड़े-बड़े धार्मिक मठ भी शामिल हैं। किसानों की कृषि को गैर-कानूनी घोषित करके उस जमीन को फार्म हाउस में बदला गया है।
इसके अलावा अब फल, सब्जियां, सलाद की पत्तियां लगाने और उगाने की तरफ ललक और रुचि बढ़ रही है। दिल्ली की अलग-अलग आबादी में लोग अपने घर के आगे-पीछे की खाली जमीनों, बालकनी, छतों, जहां पर भी संभव है, वहां पौधे लगा रहे हैं। यह तो कृषि का एक रूप है। भैंस, बकरी, भेड़, सुअर, मुर्गी, बतख पालने का काम शहर के अलग-अलग इलाकों में हो रहा है। इसे पशुपालन की श्रेणी में रखा जाता है तथा इसका सीधा रिश्ता कृषि से है। दिल्ली के विभिन्न समूह अलग-अलग गतिविधियों में सक्रिय हैं और इसका सीधा रिश्ता उनके परिवार के जीविकोपार्जन से है। मगर किसी समूह द्वारा की जा रही गतिविधियां अवैध हैं और किसी की वैध; किसी की गतिविधि आधुनिकता और अमीरी का प्रतीक, तो किसी की गतिविधि पिछड़ा और गरीबी का प्रतीक।
दिल्ली में कानूनी रूप से कृषि नहीं हो सकती और न ही होती है; फिर भी शहर का बड़ा भू-भाग और लाखों-लाख लोग इस अभिक्रम में लगे हुए हैं। यह परिदृश्य सिर्फ दिल्ली का नहीं है, बंगलुरु और हैदराबाद अर्बन फार्मिंग का हब बनते जा रहे हैं। इसमें वे लोग भी आ रहे हैं, जो अपना हाथ आधुनिक माने जाने वाले क्षेत्रों में आजमा चुके हैं। उसमें वे सफल भी रहे हैं, लेकिन सफलता के साथ सुकून की तलाश उन्हें इस ओर खीच रही है। यह भी नहीं है कि यह हालत सिर्फ हमारे शहरों की है और हम आधुनिकाचार में पिछड़ते हुए इसे अपना रहे हैं, बल्कि यह बयार उन मुल्कों में भी बह रही है, जिन्होंने आधुनिकता की वे सीढ़ियां पा ली हैं, जिन्हें पाने के लिए हम व्याकुल हैं और जिसकी चाह में हमने अपना तानाबाना तोड़ा है, उसे वे अपना रहे हैं।
