अल्पना मिश्र

हिंदी में इन दिनों खूब और हर विधा में लिखा जा रहा है। खासकर युवा लेखकों की सक्रियता काफी बढ़ी है। सोशल मीडिया ने उन्हें पंख दिए हैं। पहले जो पत्र-पत्रिकाओं में संपादकीय हस्तक्षेप की वजह से रचनाएं छपवाने में परेशानी आती थी, अब सोशल मीडिया ने उससे भी मुक्ति दे दी है। मगर इस आजादी के बीच जो युवा रचनाएं सामने आ रही हैं, चाहे वह गंभीर साहित्य के रूप में हों या फिर तात्कालिक टीप के रूप में, उनमें अनुभव और समझ के कच्चेपन का आरोप अक्सर लगता है। इसकी क्या वजह है, इस बार की चर्चा इसी पर। – संपादक

तकनीक के युग में हमारा प्रवेश तेज गति के साथ बहुत सारी उलझनों, मुश्किलों, खतरों और गिरावटों को लिए-दिए हुआ है। सूचनाओं से जीवन पटा हुआ दिखता है, पर तमाम सही सूचनाओं तक न पंहुच बन पाती है, न उनके सही होने, न होने का भरोसा। आभासी सच ने असली सच को कुछ इस तरह ढंक लिया है कि ‘कंक्रीट रियलिटी’ तक पहुंचना, उसकी शिनाख्त करना आसान नहीं रह गया। तकनीक के इस व्यापक कब्जे का सबसे ज्यादा शिकार युवा पीढ़ी हुई है। वह इसमें फंस कर लाभान्वित होने के बजाय अधिकांशत: दो तरफ गई है- उत्सव और उन्माद। उत्सव हर तरफ है, हर चीज में है, इस उत्सव ने विचार और सरोकार की जगह घेर ली है- विशुद्ध मनोरंजन बाजार की तर्ज पर फैलता हुआ सारे तर्कों, विडंबनाओं, तकलीफों और अंधेरों को ढंकने का भ्रम फैलाता जा रहा है। यह उत्सवधर्मिता भारतीय किसानी जीवन की उत्सवधर्मिता नहीं है, न आम जन जीवन से इसका कोई वास्ता है। यह आभासी है, इसकी कोई ठोस जमीन नहीं है। और उन्माद, जो विवेक से, विजडम से दूर करता है। प्राय: यह विवेकहीनता भीड़ की हिंसा में बदल जाने का खतरा बनती है। ऐसी हिंसा के विकराल दानव का भारतीय संस्कृति के औदात्य से कोई परिचय नहीं।

तकनीक ने तेज गति को जन्म दिया है। यह रफ्तार विकास के लिए चाहे जैसी हो, रचनात्मकता के लिए, कला के लिए ठीक नहीं है। अगर आप तेज दौड़ते हुए आंखों के कैमरे से जीवन की फोटो भी लेना चाहते हैं, तो यह सही और स्पष्ट तस्वीर आपको नहीं देगा। तेज गति से दौड़ने वाली रेलगाड़ियों से बाहर का दृश्य धुंधला नजर आता है। बुलेट ट्रेन से तो यह बिल्कुल संभव नहीं है कि आप पेड़, पल्लव की पहचान करते चलें। ऐसी तेज गति में जीवन की विविध छवियों को कैद कर पाना संभव नहीं रह जाता। जो हाथ आता है, प्राय: वह ऊपरी, सतही यथार्थ होता है। इसकी जटिल और बहुस्तरीय बुनावट को जानने-समझने के लिए ठहरना होगा। साहित्य ठहर कर जीवन को समझने की चीज है। ऐसा नहीं कि जीवनानुभवों की जगह सिर्फ सूचनाएं दिखाई दें और इसे ही कविता, कहानी मान लेने की हड़बड़ी हो। आज का युवा सूचनाओं के ढेर पर खड़ा है, पर जीवन के अनुभवों का अभाव उसे साहित्य के नाभिक सत्य ‘मर्म’ तक पंहुचने नहीं देता। तकनीक ने सूचनाओं से जीवनानुभवों का स्थानापन्न किया है। सूचना की भरमार जानकारी के लिहाज से ठीक लग सकती है, पर अनुभवों का मुकाबला नहीं कर सकती। ऐसा ग्लोबल लेखन किस काम का, जो मर्म को भेद न सके, विचार को झकझोर न सके, भीतर तक उतर न सके। जो ‘कमोडिटी’ के सच की तरह इस्तेमाल पर टिका हो और नई व्यवस्था में ‘यूज एंड थ्रो’ कहलाता हो, वह बहुत बिकाऊ हो सकता है, टिकाऊ नहीं।

सोशल मीडिया ने युवा पीढ़ी को वह जगह दे दी है, जहां वह बिना किसी रोक-टोक के अपनी बात कह सकता है- यह स्पेस तब तक अच्छा है, जब तक विवेक आपके साथ है, अन्यथा यह अराजक और निरंकुश है। अराजकता का यह जाल इस तरह फैल गया है कि ‘आप ही गोया मुसाफिर आप ही मंजिल हंू मैं’ की तर्ज पर युवा जो कुछ भी वहां लिख रहा है, कोई अच्छी पंक्ति, कोई कविता, जो अभी बनने की प्रक्रिया में है या गद्य का कोई बनता हुआ टुकड़ा। तुरंता न्याय की तरह तुरंत चार लोग ताली बजाने आ जाते हैं, लाइक और कमेंट्स में सारा मूल्यांकन सिमट जाता है। न किसी तरह के मूल्यांकन की जरूरत है, न पुनर्विचार की। यह संतोष स्वयंभू लेखक बन जाने के अहंकार की तरफ ले जाता है। ऐसा लेखक, जो अपने पूर्वज लेखकों, अपनी परंपराओं, इतिहास बोध और यहां तक कि आधुनिकता बोध से भी प्राय: अपरिचित रह जाता है। तब कई बार ऐसी स्थिति भी आती है कि वह अपने वरिष्ठों या समकालीनों से असहमति की भाषा समझ नहीं पाता और ‘ट्रोलिंग’ की भाषा अपना लेता है।

पहले जहां सोशल मीडिया पर कुछ सैद्धांतिक या वैचारिक बातें कभी-कभी दिख जाया करती थीं, अब वे पूरी तरह खत्म हुई हैं। उसकी जगह एक-दूसरे की तारीफ, ट्रोलिंग, तरह-तरह की लोकलुभावन ‘स्व’ की तस्वीरों, सेल्फियों ने ले ली है- यह प्रवृत्ति स्त्रियों और पुरुषों दोनों में समान रूप से दिख रही है। कई बार यह मनोरोग की हद तक जाती दिखती है। कई बार तो बड़े-बड़े लेखकों पर उनकी अपढ़ टिप्पणियां हैरान करने वाली होती हैं। वे नहीं जानते कि प्रेमचंद ने क्या लिखा है? जैनेंद्र कौन थे? कृष्णा सोबती क्या विचार रखती थीं? पढ़ना, सुनना, गुनना और रचना, तीनों में बड़ा फांक पैदा हुआ है।

तकनीक ने छापने की सुविधा इतनी बढ़ा दी है और बाजार तमाम तरह की बिकाऊ चीजों को बढ़ावा देता है, तो साहित्य के नाम पर ऐसी सतही चीजें भी छप जा रही हैं, जिनके छपने के बारे में पहले सोचना कठिन था। कुछ तो बकायदा फेसबुक रचनाओं के प्रकाशक हो गए हैं। इन्होंने भी युवा को अपनी रचना पर मेहनत करने, उन्हें मांजने और विचारशील बनने का रास्ता कमजोर किया है। पहले जहां पत्र-पत्रिकाओं में संपादक रचनाएं लौटा दिया करते थे, संपादक की दृष्टि से गुजरी रचनाएं लेखक को सिखा भी जाती थीं और कई बार संपादक को चमत्कृत भी। लेखक को उस पर पुनर्विचार करने का समय मिलता था, कभी वह सुझाव मानता था, कभी नहीं। कई बार वरिष्ठ लेखक कुछ सुझाव दिया करते थे, कुछ किताबें पढ़ने की सलाह देते थे, कविताओं तक के कितने डाफ्ट बनाए जाते थे- जब तक संतोषजनक रचना न तैयार हो जाए, तब तक जूझना होता था। शमशेर बहादुर सिंह, मुक्तिबोध, अज्ञेय आदि अपनी कविताओं में शब्द चयन को लेकर कितने सतर्क हुआ करते थे। अब ‘इंस्टेंट’ यानी तुरंता चीजों की तरह इंस्टेंट रचना के जमाने में इतना धैर्य कहां? कहानियां तीन दिन और कई बार तीन घंटे में लिखी जा रही हैं और लेखक गर्व से इसे बताता फिरता है। इतनी हड़बड़ी है और लाभ-लोभ के इतने गणित हैं कि इसके साथ अध्ययन, चिंतन, मनन और लेखन का सामंजस्य मुश्किल हुआ है। प्रतिभाशाली युवा भी अक्सर सोशल मीडिया के इस चक्रव्यूह का शिकार होकर अपनी प्रतिभा को व्यर्थ बिखरा देता है।

यहीं पर यह नहीं भूला जा सकता कि आंधी तेज आने पर भी बहुत से वृक्ष अपनी जड़ें नहीं छोड़ते हैं। आज के इस तकनीकी दौर में भी अनेक ऐसे युवा हैं, जिन्होंने विचार और संवेदना का दामन नहीं छोड़ा है। वे सुचिंतित हैं और सुपठित भी। वे जेनुइन तरीके से अपना काम कर रहे हैं। वे या तो इस शोर से बाहर हैं या बाहर ढकेले जाने से अपने को बचा ले जाने के संघर्ष में। न तो उन्हें देने के लिए साहित्य के पास ढंग के मंच हैं, न अधिक पत्रिकाएं। कहने को पत्र-पत्रिकाओं का ढेर है, पर गुणवत्ता के लिहाज से प्रतिभासंपन्न के लिए सटीक मंच नहीं। कुछ अच्छी साहित्यिक पत्रिकाएं भी पिछले वर्षों में या तो बंद हुई हैं या अपनी गुणवत्ता खो बैठी हैं। तब भी ऐसे युवा रचनाकार साहित्य के भविष्य का भरोसा पैदा कर रहे हैं।

दूसरी तरफ वरिष्ठ साहित्यकार भी अपनी जिम्मेदारी से पल्ला नहीं झाड़ सकते। युवा प्रतिभाओं को सामने लाने, प्रोत्साहित करने का उनका जो दायित्व है, वह भी कमोवेश नहीं दिखता। कई बार ऐसी दुर्भाग्यपूर्ण स्थिति भी दिखती है, जब कुछ वरिष्ठ लेखक किसी प्रतिभाशाली युवा को अपना प्रतिस्पर्धी मानने लगते हैं और उसे मुख्यधारा से अलग-थलग करने, मनोबल तोड़ने के सारे प्रयास में जुट जाते हैं या नए लेखन को खारिज करने लगते हैं। कई बार कुछ वरिष्ठ युवाओं का हौसला बढ़ाने की, अपना ज्ञान उन्हें देने की सदीक्षा से भी भरे होते हैं, पर युवा उनकी पकड़ में नहीं आता। इस तरह पीढ़ियों के टकराव की जगह साथ चलने का जो संतुलन बनना चाहिए, वह लगभग नहीं बन रहा।