सत्यदेव त्रिपाठी
नाटक और सिनेमा जैसी प्रदर्शनकारी कलाओं के साथ प्रेमचंद का रिश्ता उनके जीते-जी ‘रसाई और खिंचाई’ वाला रहा। उन्होंने नाटक लिखे, जो चलते नहीं; लेकिन बड़े कथाकार के नाते इज्जत से याद किए जाते हैं। फिर कथालेखन के अपने उत्कर्ष-काल में जब बोलती फिल्में आई ही आई थीं, ‘अजंता सिने स्टोन कंपनी’ के बुलावे पर फिल्म लेखन के लिए आठ हजार रुपए मासिक वेतन पर 1932 में मुंबई गए। जाना मंजूर तो किया अपनी पत्रिकाओं (हंस और जागरण) के चलते भारी कर्ज की भरपाई के लिए, लेकिन इस नई और सशक्त विधा में अपने को व्यक्त करने का जज्बा भी कम न था।
पर ‘सिर मुंड़ाते ही ओले पडे’। फिल्म के लिए लिखी पहली ही कहानी ‘मिल मजदूर’ (जो कहानी संग्रहों में शामिल नहीं है) में निहित सामाजिक सरोकारों से फिल्मी व्यावसायिकता की पटी नहीं। लिहाजा संपादन के नाम पर कटनी-छंटनी हुई। प्रदर्शन को लेकर बवाल उठे, फिल्म बंद हो गई। इससे आहत होकर उन्होंने फिल्म ‘मिल मजदूर’ को ‘प्रेमचंद की हत्या’ कहा और सृजन और दुनियादारी के सारे मंसूबे छोड़-छाड़ कर बनारस लौट आए।
यानी नाटक और फिल्म में प्रेमचंद की रुचि इतनी गहरी तो थी ही या ये विधाएं उनके लिए इतनी चुनौतीपूर्ण थीं कि वे सक्रिय हुए बिना न रह सके। लेकिन इस सारी कवायद का मर्म यह कि इन विधाओं की फितरत के साथ प्रेमचंद का रिश्ता इतना जेहनी था कि वे खुद जो न कर सके, उनके कथाकर ने सहज ही कर दिया। इसके प्रमाण हैं साहित्य पर आधारित सिनेमा में प्रेमचंद की कहानियों-उपन्यासों पर सर्वाधिक काम होना और इन्हीं की कथाओं के सर्वाधिक नाट्य-रूपांतरण भी, जो सबके सब खासे लोकप्रिय भी हैं। पचासों कहानियों पर नाटक और फिल्में बनी हैं, तो ‘सेवासदन’, ‘गबन’, ‘निर्मला’, ‘कर्मभूमि पर्दे पर उतरे हैं। ‘गोदान’ कई भाषाओं में मंच पर, तो दो बार पर्दे पर आ चुका है। यानी नाटकों-फिल्मों की दुनिया को ऐसी चुनौती देते हैं कथाकार प्रेमचंद कि बच नहीं पाते लोग। तभी तो सिनेमा के दिग्गज सत्यजित राय जैसे अहिंदी भाषी भी उनकी दो कहानियों पर फिल्में बनाने से खुद को रोक न सके। सिने-संसार में प्रेमचंद पर हुए सारे कामों में राय की दोनों फिल्में अब तक मील का पत्थर साबित हुई हैं।
सत्यजित राय की ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में किसानी संस्कृति थी ही नहीं, लखनवी संस्कृति और माहौल था। मगर ‘सद्गति’ में घास काटने, लकड़ी चीरने आदि के दृश्यों में पूर्वांचल सटीक उतरा है। मगर यहां भी पंजाबी के ही ओम पुरी और मराठी की स्मिता पाटील भोजपुरी में रच-बस न सके, पर उन पात्रों की छाप छोड़ सके। तैयारी दिखती है। ओमपुरी ने दुखिया को ऐसा साधा कि सच के दुखिया पानी भरें। मोहन अगाशे (पंडित) और स्मिता (झुरिया) भी बिल्कुल जंचे। यह टीम तब (1981) काफी नई थी, जिसे गजब का ढाल दिया सत्यजित राय ने।
मगर गुलजार ने राय साहब के दोनों कामों को नहीं छुआ। डर दुहराने का न था, रचनात्मक चुनौती से बचने-भागने का था। उन्हें होमवर्क नहीं करना था। सरकारी धन उगाह लेना भर था। ‘पूस की रात’ में थे रघुवीर यादव, तो उनकी गायकी को भुनाने लगे। उनके खिलंदडेपन से बहलाने लगे। फलत: कहानी का बड़ा वजनदार हल्कू सचमुच बहुत हल्का हो गया। ‘कफन’ में पंकज कपूर (घीसू) और किशोर कदम (माधव) ठीक लग भी रहे थे, जा भी रहे थे, पर उसमें तो दृश्यों और संवादों के नियोजन ही इतने बेतुके हैं कि प्रेमचंद की सबसे तेज और क्रांतिकारी कहानी के सारे तार तथा तानें टूट जाती हैं, व्यंग्य और आहें हताहत हो जाती हैं। ‘ठाकुर का कुआं’ तो बड़ी देर तक वह कहानी लगती ही नहीं।
त्रिलोक जेटली ने लगभग सबसे पहले प्रेमचंद को उठाया। 1963 में फिल्म ‘गोदान’ बनाई। गुलजार से अच्छे वे इस मायने में रहे कि उन्हें न प्रेमचंद को तारने की तमन्ना थी, न सिनेमा में कोई इतिहास रचने का मुगालता- एक दबी-छिपी लालसा भले रही हो कि साहित्य की अमर कृति से फिल्म सफल हो जाएगी। वरना तो साफ-साफ व्यावसायिक था उनका इरादा। इसी के चलते उन्होंने पूरा सिलिया-मातादीन वाला प्रसंग छोड़ दिया, क्योंकि ब्राह्मण के मुंह में चमारों से हड््डी डलवा कर और सिलिया को धनिया से गांव में बसा कर सेंसर बोर्ड का कोपभाजन बनने तथा पास हो भी जाने पर दर्शकों के जरिए उन्मादियों से रार मोल लेकर कमाई में बट्टा लगाने में उन्हें कोई रुचि न थी।
उधर जेटली ने राजकुमार को हीरो के रूप में ले लिया होरी के लिए। उन्होंने होरी बनाना न चाहा और राजकुमार तो सितारा से अभिनेता भी न बन सके, होरी क्या बनते! शशिकला को बनाया धनिया। उन्होंने कोशिश की, पर अपनी छवि को तोड़ न पार्इं। दोनों अपनी-अपनी छवियों बनाम होरी-धनिया के बीच फंस कर रह गए। आम जनता ने होरी जैसे विवश-दबे राजकुमार को खारिज कर दिया और कला-साहित्य वालों ने राजकुमार के रूप में होरी को। मगर जेटली के महमूद बन सके सही गोबर- गुलजार के गुजराती मूल और नई पीढ़ी के अभिनेता बीरजी से तो बहुत-बहुत अच्छे।
मगर त्रिलोकजी की इस फितरत से एक (आ)लोक मिलता है कि साहित्य-आधारित फिल्मों में हीरोपंथी नहीं चलेगी। शायद इस तथ्य को गुलजार ने समझा था या बजट की सीमा रही हो, पर उन्होंने सितारा (स्टार) लिया ही नहीं। सो, उनके सामने समस्या आई ही नहीं। पर सितारों को लेने वालों को उनका सितारापन छुड़ा कर अभिनेता बनाना पड़ेगा। इसकी बड़ी पक्की समझ सत्यजित राय को थी। ‘शोले’ के बाद अमजद खान सितारे हो गए थे, लेकिन ‘शतरंज के खिलाड़ी’ में उनसे राय साहब ने ऐसा वाजिद अली शाह बनवा लिया कि हमें स्टार गब्बर की याद तक न आई। उनकी दृष्टि ने अमजद में वाजिद को देखा होगा और अमिताभ में मिर्जा-मीर छिपे न मिले होंगे। तभी तो अमितजी के आग्रहों के बावजूद सिर्फ शुरुआती आवाज ही लेकर छोड़ दिया। मगर यह कम कलाकार-चेतना नहीं है कि उस अच्छी कला का हिस्सा बनने के लिए उन्होंने अपनी आवाज भर देने में कोई गुरेज नहीं किया।
जेटली ने राजकुमार में होरी को देखना चाहा ही नहीं और गुलजार ने पंकज कपूर-सुरेखा सीकरी से कराने पर ध्यान दिया ही नहीं। अमजद से गिरीश कर्नाड ने ‘उत्सव’ में भी ऐसे ही करा लिया। यहां तक कि राजकपूर जैसा शोमैन भी ‘तीसरी कसम’ में बिल्कुल हीरामन बन सका। बासु भट्टाचार्य को भले खयाल न आया हो, पर राज साहब को हीरामन की भूमिका में जाने की अपनी नमनीयता का पता था- ‘जागते रहो’ के अनुभव से। प्रेमचंद के ‘गबन’ पर हृषिकेश मुखर्जी ने सुनील दत्त जैसे बड़े स्टार को लिया, पर वे भी रामनाथ में संतरित हो गए। उनके अंदर उभयमुखी क्षमता थी, जिसे ‘सुजाता’ आदि में पहले भी देखा जा सका था और उन्हें अपनी ऐसी फितरत और अनुभव का पता भी था। ‘गबन’ की जालपा में साधना भी सध गर्इं- हालांकि ऐसे अनुभव न थे उनके पास, पर शायद मंशा सच्ची थी, इरादे नेक थे और साथ सुनील दत्त का था, लेकिन सारे मंत्र तो दिए होंगे ऋषि दा ने ही। कन्नड में ‘कफन’ पर बनी फिल्म देखी तो, समझ न पाया। अत: उसे बाद कर दिया जाए, तो मेरे लेखे प्रेमचंद के साहित्य पर बनी अब तक की सबसे अच्छी फिल्म ‘गबन’ ही है। हां, सबसे असरदार अवश्य है राय साहब की घंटे भर की फिल्म ‘सद्गति’।
पाठ को चित्रात्मकता में लाने की असली विधि ही सिनेमा है। ‘शतरंज के खिलाड़ी’ इसका सर्वोत्तम उदाहरण है कि शुरुआत के एक अनुच्छेद में नवाबों की लखनवी नफासत का जो वर्णन है, उसी को मुख्य माध्यम बना कर पूरी फिल्म में पिरो दिया गया है। इसी पर खड़ा है फिल्म का पूरा महल और खिली है मिर्जा-मीर की घरफूंक विलासिता। कहानी के एक वाक्य में मीर की बेगम चाहती हैं कि मीर साहब ज्यादा से ज्यादा घर से बाहर रहा करें। इसे लेकर राय साहेब ने पूरा एक दृश्य सिरजा, जिसमें बेगम का प्रेमी (फारुख शेख) मिलने आता है। यह सब सिने-विधा की ‘हरि अनंत, हरि कथा अनंता’ वाली कुदरत है।
इसी तरह मूल में बदलाव भी अपने आप हो जाता है- लेखन-प्रदर्शन की कलाओं की अपनी-अपनी फितरतों के तहत। गुलजार में कोई प्रमुख बदलाव नहीं हुआ है- चाहे प्रेमचंद के सोचों (कनविक्शंस) के प्रति उनकी वफादारी हो या सचेतन बरती गई लापरवाही- यानी ध्यान देते, तब न परिवर्तन की दरकार महसूस होती। प्रमुख परिवर्तनों की बावत दूरदर्शन के लिए बनी सारी शृंखलाओं (सीरियल्स) और टेलीफिल्मों के हाल प्राय: यही हैं। जेटली के प्रमुख बदलाव-त्याग की बातें हुर्इं, प्रमुख बदलाव की बानगी के लिए पुन: ‘शतरंज के खिलाड़ी’ के पास ही चलें… प्रेमचंदजी ने मिर्जा-मीर को रियासत और देश के लुट जाने की परवाह न करके अपने शतरंज के मोहरों के लिए एक-दूसरे की जान लेते-देते दिखा कर मरणांतक व्यंग्य किया है। मगर सत्यजित राय ने इसी को व्यक्त करते हुए बात बदल दी- दोनों को जिंदा रखा और यह दिखाया कि सब खत्म हो जाए, पर वे दोनों जिएंगे- सिर्फ अपने मोहरों के लिए। यही है असली कला-चेतना कि यहां एकदम विरोधी ढंग से भी वही बात उतने ही जोरदार ढंग से कही जा सकती है और हम लाजवाब हो जाते हैं। आज सिने-क्षेत्र में आई नई पीढ़ी बेहद उर्वर है। उसके पास पैने औजार भी हैं, तेज और सार्थक विचार भी हैं और सशक्त सिने-भाषा भी। हमें पूरा यकीन है कि प्रेमचंद का साहित्य उन्हें भी उकसाएगा, लुभाएगा, चुनौती देगा।

