महात्मा गांधी केवल स्वतंत्रता संग्राम के अगुआ नेता नहीं, बल्कि सभ्यता-संस्कृति, साहित्य, कलाओं के मर्मज्ञ समीक्षक भी थे। दरअसल, उनका राजनीतिक आंदोलन अपनी सभ्यता और संस्कृति को बचाने के लिए अधिक था। यही वजह है कि राजनीतिक चिंतन के अलावा वे साहित्य और कलाओं के बारे में भी गहन चिंतन-मनन किया करते थे। गांधी के इस पक्ष पर कम ही बातचीत होती है। साहित्य और कला संबंधी चिंतन में गांधी किस तरह प्रासंगिक हैं, बता रहे हैं श्रीभगवान सिंह।
उन्नीसवीं सदी की विश्व राजनीति में कार्ल मार्क्स द्वारा प्रतिपादित वर्ग-संघर्ष की सैद्धांतिकी सामने आई, तो बीसवीं सदी में महात्मा गांधी द्वारा ‘सत्याग्रह’ की सैद्धांतिकी प्रतिपादित होकर प्रकट हुई। मार्क्स ने मानव-इतिहास (विशेषकर यूरोपीय संदर्भ में) के साथ-साथ परंपरा, कला, साहित्य, संस्कृति आदि को इसी ‘वर्ग-संघर्ष’ के परिप्रेक्ष्य में विश्लेशित किया, तो गांधी ने यह काम ‘सत्याग्रह’ यानी सत्य, अहिंसा के परिप्रेक्ष्य में किया। दुर्भाग्य यह रहा कि कला-साहित्य के संबंध में मार्क्स के यत्र-तत्र बिखरे विचारों को लेकर जहां मार्क्सवादी बुद्धिजीवियों ने मार्क्सवादी साहित्यशस्त्र या सौंदर्यशास्त्र का स्वतंत्र, भव्य स्थापत्य खड़ा कर दिया, वहां गांधीवादी लेखक कला-साहित्य के संबंध में गांधी द्वारा यत्र-तत्र व्यक्त विचारों को लेकर कोई उल्लेखनीय कार्य सामने नहीं ला सके।
निबंधकार कुबेरनाथ राय ने अपनी पुस्तक ‘पत्र मणि पुतुल के नाम’ में लिखा है- ‘‘गांधी की राजनीति को समझने के लिए ध्यान देना होगा उसके केंद्रीय शब्द ‘अहिंसा’ पर उसी तरह उनकी ‘रस दृष्टि’ या ‘साहित्य-दृष्टि को समझने के लिए ध्यान देना होगा ‘सत्य’ पर। पूरा गांधीयान इस बात का समर्थक है कि साहित्यकार सत्य के प्रति ईमानदार रहे, सत्य के लिए ही एक सांस्कारिक मानसिक वातावरण तैयार करे, जिससे प्रथमत: मनुष्य को ‘अभय’ की उपलब्धि हो, द्वितीयत: मनुष्य में अंतर्निहित आत्मिक क्षमताओं का विकास हो।’’ मतलब साफ है कि ‘सत्याग्रह’ के अंतर्गत जो बल गांधी ने ‘सत्य’ पर दिया था, वही चीज वे साहित्य में भी देखने के अभिलाषी थे। इसके प्रमाणस्वरूप गांधी के कुछेक विचारों को देखना आवश्यक है।
किस प्रकार का साहित्य लिखा जाना चाहिए, इस संबंध में 2 अप्रैल, 1920 को गुजरात साहित्य परिषद अमदाबाद में गांधीजी द्वारा दिए गए भाषण के कुछेक अंशों को देखा जाना चाहिए। उन्होंने इस बात पर जोर दिया कि ‘गुजरात की निरीह जनता, माधुर्य से ओत-प्रोत जनता, जो अत्यधिक भोली है, उस जनता की उन्नति तभी हो सकेगी जब साहित्य-सेवक किसानों, मजदूरों तथा ऐसे ही अन्य लोगों के लिए काव्य-रचना करेंगे, उनके लिए लिखेंगे। मेरी हार्दिक कामना है कि हमारी जनता सत्य लिखने लगे, सत्य बोलने लगे और सत्य का आचरण करने लगे।’ इस संबंध में अक्तूबर, 1924 में दिल्ली में गांधीजी की त्रावणकोर के भाई रामचंद्रन के साथ कला को लेकर हुई बातचीत का अंश उल्लेखनीय है- ‘मैं सत्य में या सत्य के द्वारा सौंदर्य देखता हूं। मुझे तो सत्य की प्रतिबिंब वाली सभी वस्तुएं सुंदर लगती हैं- सच्चा चित्र, सच्चा काव्य और सच्चा गीत। आमतौर पर लोगों को सत्य में सौंदर्य नहीं दिखाई देता। उन्हें वह भयंकर लगता है। पामर लोग सत्य को भीषण देख कर भागते हैं, क्योंकि सत्य का सौंदर्य उन्हें सूझता ही नहीं। यह समझो कि मनुष्य सत्य में सौंदर्य देखने लगा, तो कला देखने लगा, कला-रसिक हुआ।’ (महादेव भाई देसाई की डायरी ‘गांधी जी के साथ पचीस वर्ष’, खंड चार)
ध्यातव्य है कि शुद्ध साहित्य के प्रेमी साहित्य को प्रचार का साधन बनाने के सख्त विरोधी रहे हैं, किंतु गांधीजी ‘जनता सत्य लिखने लगे, सत्य बोलने लगे और सत्य का आचरण करने लगे, जैसे कार्य में साहित्य की भूमिका मान्य करते हुए सत्य के प्रचारक रूप में उसकी गरिमा स्वीकार करते हैं। ऐसी ही बात उन्होंने 16 दिसंबर, 1933 को विजयवाड़ा में ‘हरिजन सेवकों’ की सभा में बोलते हुए कही- ‘काव्य और कला को सत्य के प्रचार का साधन होना चाहिए, उनका उपयोग कभी भी चापलूसी के लिए नहीं करना चाहिए, क्योंकि कविता के ऐसे प्रयोग से न केवल कला का ह्रास होगा, बल्कि सत्य का भी खंडन होगा।’
दरअसल, गांधी मानते थे कि साहित्य या कला में छिपाने लायक कोई चीज होनी ही नहीं चाहिए। 3 अगस्त, 1932 को प्रेमा बहन कंटक को लिखे पत्र में वे दो-टूक शब्दों में यह कहते हैं- ‘जिस चीज में छिपाने लायक कोई बात है, वह कला नहीं है।’ इन वक्तव्यों को ध्यान में रखें तो मानना पड़ेगा कि गांधी साहित्य या कला में पारदर्शिता के प्रबल आग्रही थे। जब साहित्य में सिर्फ सत्य ही सत्य होगा, तो स्वभावत: वह पारदर्शी होगा ही और वह ‘अभय’ प्रदान करने वाला होगा, क्योंकि बगैर भयमुक्त हुए सत्य का आचरण हो ही नहीं सकता। वस्तुत: गांधी ने साहित्य या कला को जिस नजरिए से देखा उस पर उनके सत्याग्रह वाले सिद्धांत की स्पष्ट छाप है। सत्याग्रह में गांधीजी विरोधी पक्ष से कोई बात छिपाते नहीं थे, न ही झूठा वादा करते थे। वे कब कानून की सविनय अवज्ञा करेंगे, कब अनशन करेंगे, कब कहां कूच करेंगे- यह सब वे विरोधी पक्ष को पहले से बता दिया करते थे- कुछ भी छिपा कर, गुप्त रख कर नहीं करते थे। इसी सोच के अनुरूप वे साहित्य या कला से भी कुछ भी गोपनीय न रखने, पारदर्शी होने की अपेक्षा करते हैं। ध्यातव्य है कि फ्रांसीसी साहित्यकार ज्यां पाल सार्त्र ने बाद में ऐसी ही पारदर्शिता को अपने एक महत्त्वपूर्ण साहित्य सिद्धांत के रूप में प्रतिपादित किया।
दूसरी उल्लेखनीय बात यह है कि ‘सत्य’ के साथ-साथ गांधीजी काव्य और कला का धर्म से भी घनिष्ठ संबंध मानते हैं। अक्तूबर 1931 में जब वे दूसरे गोलमेज सम्मेलन में भाग लेने लंदन गए हुए थे, तब वहां के ‘आइलैंड’ नामक पत्र के संपादक जोजे बार्ड के साथ हुई बातचीत में जो कहा वह गौरतलब है- ‘धर्म कला का सही और चिरस्थायी साथी है। धर्म लोगों को जिसकी शिक्षा देता है, कलाकार उसी को शिल्प के धरातल पर कला रूप में उनके निकट लाता है। ‘कला कला के लिए’ की बात से जो मेरे विचार में मानव-मन की एक शोचनीय भूल है, मुझे नफरत है। कला की धर्म से इस बात में गहरी समानता है कि उन दोनों में मूल अनुभूति का क्षेत्र मनुष्य का ईश्वर से संबंध होता है। भारतीय कला इस संबंध को प्रतीकों में व्यक्त करती है और साथ ही धार्मिक उपासना की क्रिया-विधि को भी व्यक्त करती है। अगर कोई कलाकार यह मानकर कि उसके इर्द-गिर्द जो लोग हैं, उनमें कोई धार्मिक भावना नहीं है, धर्म का मजाक उड़ाता है, तो वह अनिवार्य रूप से अपने पेशे को निरर्थक बनाता है। दूसरी ओर अगर वह महसूस करता है कि उसका एक ध्येय है, तो कवि या कलाकार को यह अधिकार है कि वह प्रचलित विश्वास या विश्वासहीनता का विरोध करे और उसके अपने अंतर्ज्ञान के वृहत्तर मूल्य के कारण वह कार्य न्यायोचित होगा। कला के बारे में कुछ जानने का मैं दावा नहीं करता, पर मेरा दृढ़ विश्वास है कि धर्म और कला दोनों को नैतिक और आध्यात्मिक के एक जैसे उद्देश्यों की पूर्ति करनी है।’
