डित मदन मोहन मालवीय महान स्वतंत्रता सेनानी और युग प्रवर्तक थे। वे एक सफल अधिवक्ता, कुशल राजनीतिज्ञ, निष्पक्ष पत्रकार, निर्भीक जनप्रतिनिधि, दूरदर्शी शिक्षाविद, समाज सुधारक और असाधारण देशभक्त थे। उनका जन्म इलाहाबाद में हुआ था। उनके पिता संस्कृत भाषा के प्रकांड विद्वान थे और श्रीमद्भागवत की कथा सुना कर आजीविका चलाते थे। पांच साल की उम्र से ही मदन मोहन मालवीय ने संस्कृत की पढ़ाई शुरू कर दी थी। धर्म ज्ञानोपदेश पाठशाला से उन्होंने अपनी प्राथमिक शिक्षा पूरी की। फिर उन्होंने इलाहाबाद जिला स्कूल में दाखिला लिया। 1879 में उन्होंने दसवीं की परीक्षा पास की। फिर कोलकाता यूनिवर्सिटी से बीए किया। बीए पास करने के बाद वे शिक्षक बन गए। बाद में उन्होंने एलएलबी किया और इलाहाबाद हाई कोर्ट में अधिवक्ता बने। वे उच्च कोटि के वकील हुए। चौरा चोरी कांड में जब एक सौ सत्तर भारतीयों को फांसी की सजा सुनाई गई, तो मालवीय जी ने वह मुकदमा अपने हाथों में लिया और एक सौ इक्यावन क्रांतिकारियों को फांसी से छुड़ाया।
‘भारत निर्माता’ और ‘महामना’ की संज्ञा
वे अस्पृश्यता के घोर विरोधी थे और देश को जातिगत बेड़ियों से मुक्त कराना चाहते थे। उनके बारे में महात्मा गांधी ने कहा था, जब मैं मालवीय जी से मिला, तो वे मुझे गंगा की धारा की तरह निर्मल और पवित्र लगे। गांधी ने उन्हें अपना बड़ा भाई कहा और ‘भारत निर्माता’ की संज्ञा दी। उदार ह्रदय वाले मदन मोहन मालवीय को गुरुदेव रवींद्रनाथ टैगोर ने ‘महामना’ की उपाधि दी थी। उन्होंने ‘सत्यमेव जयते’ के नारे को जन-जन में लोकप्रिय बनाया।
काशी हिंदू विश्वविद्यालय की नींव
मदन मोहन मालवीय ने चार फरवरी 1916 को काशी हिंदू विश्वविद्यालय की नींव रखी। उन्होंने इसकी स्थापना के लिए देश भर से धन जुटाया था। उनके प्रयासों के फलस्वरूप इस विश्वविद्यालय को दुनिया के सर्वाधिक प्रतिष्ठित विश्वविद्यालयों में माना गया। हिंदी भाषा को प्रतिष्ठित करने में भी उनकी बड़ी भूमिका रही। देश में पहली बार हिंदी भाषा को एक विषय के रूप में इसी विश्वविद्यालय में पढ़ाना शुरू किया गया। वे 1919-1938 तक बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति रहे।
हिंदी पत्रकारिता
मदन मोहन मालवीय ने 1887 में हिंदी दैनिक ‘हिंदोस्थान’ के संपादक के रूप में पत्रकारिता की शुरुआत की। 1909 में इलाहाबाद से प्रकाशित अंग्रेजी समाचार पत्र ‘द लीडर’ की स्थापना की, जहां वे 1909-1911 तक संपादक थे। इसके अलावा उन्होंने ‘अभ्युदय’ और ‘मर्यादा’ पत्रिका का भी संपादन-प्रकाशन किया। 1924 से 1946 तक ‘हिंदुस्तान टाइम्स’ के संचालन का पदभार भी ग्रहण किया। उनके प्रयासों के फलस्वरूप 1936 में हिंदुस्तान दैनिक का प्रकाशन शुरू हुआ।
राजनेता और समाज सुधारक
पचास साल की उम्र में वकालत छोड़ कर उन्होंने देश सेवा का संकल्प लिया। इलाहाबाद में कांग्रेस अधिवेशन से उन्हें राष्ट्रीय पहचान मिली। वे 1909 में लाहौर, 1918 और 1930 में दिल्ली तथा 1932 में कोलकाता में कांग्रेस अधिवेशन के अध्यक्ष रहे। महामना स्वतंत्रता आंदोलनों के दौरान उदारवादियों और राष्ट्रवादियों के बीच सेतु माने जाते थे। उन्होंने 1920 में महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन में भूमिका निभाई। लाला लाजपत राय के साथ साइमन कमीशन का विरोध किया और 1930 में नमक सत्याग्रह और सविनय अवज्ञा आंदोलन में हिस्सा लिया और जेल भी गए। 1931 में गोलमेज सम्मेलन में देश का प्रतिनिधित्व किया। फिर 1937 में राजनीति से संन्यास लेकर समाजसेवा से जुड़ गए। समाज सुधारक के रूप में उन्होंने महिलाओं की शिक्षा, विधवा विवाह का समर्थन और बाल विवाह का घोर विरोध किया।
2014 में मदन मोहन मालवीय को मरणोपरांत देश के सर्वोच्च नागरिक सम्मान भारत रत्न से विभूषित किया गया था।
निधन : पचासी वर्ष की उम्र में महामना का निधन हो गया।
