जब रोटी का नाम लीजिए, तो एकाएक कई चीजें सामने आ जाती हैं। कवि धूमिल की कविता ‘रोटी और संसद’ पढ़ेंगे तो लगेगा कि यह एक सियासी मसला भी है और थोड़ा आगे बढ़ेंगे तो पाएंगे कि रोटियों का संसार इन सियासी मसलों से कितना अलग है। रोटी सियासत से ज्यादा भूख की रोटी है, जैसा सआदत हसन मंटो ने कहा है कि ‘भूखे पेट का मजहब रोटी है’। रोटी आज ‘सिर्फ दो वक्त की रोटी’ नहीं रही, बल्कि कहानी, कहावत, मजाक, फिल्म, रिश्ते और स्वाद का अनूठा उदाहरण बन चुकी है। इसलिए जब कोई कहता है कि जेल की रोटी खानी पड़ेगी, तो सूखी कड़ी रोटी की आकृति दिमाग में बन जाती है और जब कोई मिस्सी और खमीरी रोटी का जिक्र भर कर देता है तो उसे खाने के लिए मुंह में स्वाद का समुद्र हिलोरें मारने लगता है। राजनेता भी मौका मिलते ही न तो सियासत में तड़का लगा सकते हैं और न ही कोई और सियासी व्यंजन बना सकते हैं, वे सिर्फ और सिर्फ सियासी रोटी सेंक सकते हैं। आज रोटी सिर्फ भारत के लिए नहीं, बल्कि अन्य देशों के लिए भी शोध का विषय है। वहां रोटी भारत जैसी ही है, बस नाम अलग है। रोटी के इसी सफर पर एक नजर डाल रहे हैं गजेंद्र सिंह।

रोटी का इतिहास काफी उलझा हुआ है। ये साक्ष्य बड़ी मुश्किल से मिलते हैं कि पहली बार रोटी का इस्तेमाल कहां हुआ और यह पारंपरिक रूप से है किस देश की। लेकिन फिर भी कई लोग इसे मिस्र से आई मानते हैं, जहां खुदाई के दौरान इसके कुछ अवशेष मिले थे। यूरोप में भी रोटी का तीन हजार साल पुराना इतिहास है, हालांकि वहां रोटी के आकार और प्रकार के बारे में जानकारी कम है। भारत में भी आर्यों के समय में रोटी के बारे में पता नहीं चलता है। उस समय गेंहू का कोई अता-पता नहीं था। जौ से बने सत्तू के साक्ष्य मिलते हैं।

जानकर बताते हैं कि सबसे पुराने ग्रंथ ऋग्वेद में भी रोटी का वर्णन नहीं है। हालांकि सिंधु घाटी सभ्यता में रोटी की ओर हल्का इशारा किया गया है। हां, मुगलकाल के दौरान रोटियों का जिक्र मिलता है। 1556 में अकबर के समय इसकी काफी मांग दिखी। बताते हैं कि शाही दस्तरखान में रोटियों का जिक्र है। लखनऊ के इतिहासकार योगेश प्रवीन बताते हैं कि आइन-ए-अकबरी में अबुल फज्ल ने भी इसके बारे में लिखा है।

संसार के सबसे प्राचीन ग्रंथ ऋग्वेद में गेहंू का नाम नही है, पर जौ, सत्तू, चलनी, भाड़ और भड़भूंजे की चर्चा है। उस समय का मुख्य आहार चावल था। यज्ञ में भी चावल और जौ ही प्रशस्त माने गए हैं। भारत में घर-घर में रोटी बनाने की प्रथा बहुत दिनों से चली आ रही है। इसके अलावा एक प्रकार की रोटी बनती थी, जिसे ‘बाटी’ कहते थे। लोग मोटी-मोटी रोटियां बनाते थे जिन्हें ‘भौरी’ और ‘मुकनी’ कहते हैं। आज रोटी मध्य पूर्वी देश से लेकर मध्य एशिया, उत्तरी अफ्रीका और यूरोप में मूल भोजन में शामिल है। बस इसके नाम और स्वाद में आपको हल्का फर्क मिलेगा।