ओम निश्चल
शताब्दियां आती और जाती रहती हैं, वे कवियों, लेखकों, कलाकारों के अवदानों की याद दिलाती हैं। पर कोई कवि, लेखक, कलाकार शताब्दियों की चौहद्दी में कैद नहीं होता। वह शाश्वत और सनातन होता है। समयातीत होता है। गिरिजाकुमार माथुर ऐसे ही सनातन के भावबोध के कवि हैं, जिन्होंने कविताओं में अपनी शैली, अपनी पहचान, अपनी अलग शख्सियत निर्मित की। उन्हें देख कर जैसे उनके रोबीलेपन को पहचाना जा सकता था, उसी तरह उनकी कविता भी कवियों के बीच अलग अनूठी और अलबेली कविता रही है। उनके लिए कविता निज से सामाजिक तक की अनुभवबहुल यात्रा रही है।
कहते हैं मालवा के आदमी का अपना ठाठ होता है। उसका सौंदर्यबोध, उसकी वैचारिकी, उसका रहन-सहन और उसकी वाचिक अदायगी सब पर मालवी छवि का असर होता है। गिरिजाकुमार माथुर 22 अगस्त, 1919 को अशोक नगर, मध्यप्रदेश में जन्मे तथा स्थानीय शिक्षा के बाद ग्वालियर से ग्रेजुएट और लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेजी से एमए किया। पिछड़ा इलाका होने के बावजूद वहां के पठारी परिवेश, काली मिट्टी वाले खेतों, इमली, सेमल, नीम, पलाश, खिरनी, जामुन, आम, महुवे, चिरौंजी और ताड़ के पेड़ों वाले कुदरत के खजाने से संपन्न इस इलाके ने किशोर गिरिजा कुमार को पर्यावरण और पारिस्थितिकी के सौंदर्यबोध से काफी मालामाल किया। यहीं के एक ताल ढाकोनी और दियाधरी गांव पर आधारित दो बेहतरीन कविताएं ‘ढाकबनी’ और ‘दियाधरी’ उन्होंने लिखी हैं।
सुरुचिसंपन्नता जैसे उन्हें बचपन से ही मिली। उनकी कविताओं, गीतों का सुगठित प्रारूप यह बताता है कि शब्दों में जो नादबोध और ध्वनि विन्यास है वह कुछ तो बचपन के इन्हीं देखे कुदरत की सोहबत का परिणाम है और कुछ आकाशवाणी में रहते हुए शब्दों की वाचिक अदायगी के गुणसूत्रों की परख के कारण। बचपन में रेल के पहियों की आवाज, औरतों के चक्की पीसते हुए गाने की धुनों, गोधूलि में लौटते वक्त गायों के गले में बजती घंटियों और मंदिर से आती झांझ-मजीरे के संगीत ने उन्हें इतना अनुभवसंपन्न बनाया कि उनके गीतों में ऐसी बिंब-बहुलता है कि उन्हें सुन कर ही यह समझ में आ जाता है कि इस कवि का लोक और ‘लोकेल’ से क्या रिश्ता रहा है। हमारी ऋतुचर्या की सारी ऋतुएं यों तो अपनी-अपनी तरह से महत्त्वपूर्ण हैं, पर आषाढ़, बसंत, शरद, ग्रीष्म, तिथि-त्योहार सबके रंग माथुर की कविताओं में मिल कर जैसे एक उत्सवता का सृजन करते हैं।
उनकी कविताएं एक तरह की भारतीय सांस्कृतिक बोध की कविताएं लगती हैं। वे कहते भी हैं कि ‘मेरे आरंभिक संस्कारों में गांव, खेत-खलिहान, किसान और काश्तकारी की पूरी पीठिका थी। इतिहास और लोकगाथाओं की समृद्ध स्मृतियां थीं। गांव और जनपद के तमाम शब्द, बिंब, त्योहारों के रंगमय चित्र, लोक-अभिप्रायों ने मन पर पूरी छाप छोड़ी थी।’
उनके कवि का निर्माण ऐसे साहित्य संपन्न परिवार में हुआ कि गिरिजा कुमार ने बारह वर्ष तक की उम्र तक ही अनेक कवियों को पढ़ डाला था। पंत, निराला, प्रसाद, महादेवी और माखनलाल चतुर्वेदी की कविताओं ने चुपके-चुपके उन्हें गढ़ा। यह उनका सौभाग्य ही कहा जाएगा कि सन छत्तीस में उनकी पहली ही कविता माखनलाल चतुर्वेदी संपादित ‘कर्मवीर’ में प्रकाशित हुई और निराला ने उनके पहले संग्रह मंजीर (1941) की भूमिका लिखी। प्रारंभ की उनकी कविताओं में भले ही कुछ अवसाद का रंग प्रभावी रहा हो, पर बाद में ओज और माधुर्य गुणों ने कविताओं को मांजा और उनमें निखार पैदा किया। निराला ने लिखा कि ‘काव्य के आकाश में उनका बड़ा ही मधुर और रंगीन प्रकाश हिंदी के धरातल पर उतरा है।’
आजीविका के लिए संघर्ष तो उन्होंने बहुत किए, पर आखिरकार आकाशवाणी से जुड़ना उनके कवि के विकास के लिए बहुत ही उत्प्रेरक और सहायक सिद्ध हुआ। उन्होंने दो विश्वयुद्ध देखे। अंग्रेजी शासन का दमन देखा। अन्यायी व्यवस्था की संवेदनशून्यता देखी, जिसकी छाया 1939 से 45 के बीच लिखी ‘नाश और निर्माण’ की कविताओं में है। 1943 उनके कवि-जीवन का उत्कर्ष काल कहा जा सकता है जब अज्ञेय ने ‘तारसप्तक’ के एक कवि के रूप में उनका चयन किया। एक कवि के रूप में उनके पास मार्क्सवाद की वैचारिकी थी, जिससे गुजरते हुए उन्होंने पाया कि राजनीति की समझ के बिना यथार्थ की पहचान नहीं हो सकती। उनके प्रारंभिक संग्रहों ‘मंजीर’, ‘धूप के धान’, ‘शिलापंख चमकीले’ आदि में ऐंद्रीयता और मांसलता के बिंब प्रभावी रहे, तो बाद के संग्रहों ‘साक्षी रहे वर्तमान’, ‘भीतरी नदी की यात्रा’, ‘जो बंध नहीं सका’, ‘कल्पांतर’, ‘पृथ्वीकल्प’(काव्य नाटक) और ‘मैं वक्त के हूं सामने’ में परिवर्तनशील समय की अंतर्ध्वनियां सामने आती हैं। ‘छाया मत छूना मन’, ‘मेरे युवा आम में नया बौर आया है’ जैसे सुकोमल गीतों के कवि माथुर ने आगे चल कर एशिया का जागरण, पंद्रह अगस्त, आग और फूल, ढाकबनी, दियाधरी, धूप का ऊन, बीसवां अंधकार, शब्द जो रोशनी है, महावृक्ष की पुकार, किसी भी बच्चे के लिए और खोए वर्तमान की तलाश जैसी यथार्थवादी कविताएं लिख कर कविता को नई सरणि पर अग्रसर किया।
वे कविता के आलोचक चिंतक भी रहे हैं। ‘नई कविता, सीमाएं और संभावनाएं’ शीर्षक पुस्तक उनके काव्य-चिंतन का प्रमाण है। उनकी कविता में वाचिक सामर्थ्य है। उनके द्वारा किया गया एक अंग्रेजी कविता का काव्यानुवाद ‘हम होंगे कामयाब’ आज एक सर्वस्वीकृत गान बन चुका है। उन्होंने रूमानी मिजाज की कविताएं लिखीं, तो ‘कल्पांतर’ जैसे संग्रह से विज्ञान काव्य की नींव भी पुख्ता की। उनकी कविताओं में केवल वाच्यार्थ नहीं, नाद, गंध, स्पर्श, गति आदि का समावेशन है। उनके काव्य में बोलचाल का लहजा है। वे केवल ऐंद्रीय संवेगों के कवि नहीं, वह तो उनकी काव्यभाषा का एक अपरिहार्य अंग है ही, विश्वयुद्धों से गुजरे समय के विराट द्रष्टा भी हैं।
उत्तर जीवन के उनके काव्य में अपने समय की संजीदा छवियां मिलती हैं। जहां ऐंद्रियता का बोलबाला है वहां भी उनके ही शब्दों में ‘पारिवारिक प्रेम, प्रणय, ममता और स्वस्थ ऊष्मा की अभिव्यक्त हुई है जो मनुष्य को शक्ति और सामथर््य देती है।’ उनकी कविताएं संवेदनासिद्ध हैं, तो ज्ञान-विज्ञान, इतिहास दर्शन और वैज्ञानिक चेतना से अनुप्राणित भी हैं।
वे समारोहों में अपनी मौजूदगी से जान डाल देते थे। कविता पाठ का उनका ढंग निराला था। गीत के उनके बोल अनूठे थे, तो लंबी कविताओं में उनकी चिंता का पाट चौड़ा था। वे संकीर्णताओं के बंदी और निज की अभिव्यक्ति में उमड़-घुमड़ कर रह जाने वाले कवि न थे, बल्कि समय को अपने शब्दों की कसौटियों में बांधने वाले कवि थे।
‘भीतरी नदी की यात्रा’ के बाद उनके दो महत्त्वपूर्ण संग्रह आए- ‘साक्षी रहे वर्तमान’ और ‘मैं वक्त के हूं सामने’। यह वह समय था, जब वे यथार्थ से आंखें मिला कर लिख रहे थे। दोनों संग्रहों में उनके सामाजिक सरोकार प्रबल होकर उभरते हैं। हालांकि इन संग्रहों से पहले कल्पांतर में ही वे अपने वक्त की त्रासदी को देख चुके थे। यह काव्य महाशक्तियों के वर्चस्व और सैन्य शक्तियों के प्रदर्शन के फलस्वरूप सामूहिक विनाश की ओर बढ़ती मनुष्यता के प्रति कवि की प्रार्थना है। हम पीछे रूस-चेकोस्लोवाकिया, अमेरिका-विएतनाम, जर्मनी नाजी हिंसा, अमेरिका के वर्ल्ड ट्रेड सेंटर का ध्वंस, भारत -पाक की हर वक्त की तनातनी, अमेरिका-अफगानिस्तान और अमेरिका इराक संघर्ष का हश्र देख चुके हैं।
जाहिर है, वैभव, विलास, पतनोन्मुख सभ्यता, युद्ध, अशांति, फासीवादी शक्तियों और अस्त्रों की होड़ का वातावरण है। कल्पांतर इन्हीं व्याधियों के प्रति कवि-चिंता का काव्य है। लगभग इसी भावभूमि पर उनका काव्यनाटक ‘पृथ्वीकल्प’ 1994 में आया। यह पृथ्वी के कल्प-कल्पांतरों की उद्भवगाथा है। इस काव्य से गिरिजाकुमार माथुर की बहुज्ञता का आभास होता है। इसकी अंतर्वस्तु में वैज्ञानिक दार्शनिक शब्दालियों के लिए अनेक नए शब्द उन्होंने दिए हैं, जो कि कोशकारों के लिए भी शायद नूतन पारिभाषिकी हो। यह मनुष्य के सृजन की गाथा तो है ही, फंतासी और रूपकों से निर्मित एक ऐसी दुनिया है, जो तमाम प्रश्नों के हल के लिए प्रतीक्षित है।
‘मैं वक्त के हूं सामने’ जब आया तो वे उस युगीन मोड़ पर थे, जब भूमंडलीकरण की आहट आने लगी थी। उदारतावाद और विश्वबाजारवाद का दौर शुरू ही होने वाला था। भारत में आर्थिक सुधारों का माहौल बन ही रहा था। ऐसे समय वे कह रहे थे, ‘मेरे पास सिर्फ शब्द हैं जो समय के अस्त्र हैं।’ जनवरी 1994 में अपने निधन के पूर्व वे शब्दों के दर्पण में अपने वक्त का चेहरा पढ़ रहे थे। हिंदी कविता में जब-जब मनुष्य के राग, उसके सौंदर्य, दुनियावी यथार्थ और युद्धों की आशंकाओं से जूझती हुई पृथ्वी की बात होगी, माथुर का काव्य एक दर्पण की तरह हमारे सम्मुख होगा।

