सीमा श्रोत्रिय

एक बार कालू बंदर और हरिया हाथी में बहुत झगड़ा हो गया। दोनों एक-दूसरे के साथ मरने-मारने को तैयार हो गए। बीच-बचाव करने वाले जानवरों ने उस समय तो उनको लड़ने से रोक दिया। कुछ देर बाद वे अपने-अपने घर के लिए रवाना भी हो गए। पर दोनों के मन में उपजा हुआ रोष तो कोई बाहर नहीं निकाल सका। इसका नतीजा यह हुआ कि कालू बंदर और हरिया हाथी दोनों एक-दूसरे के जानी दुश्मन बन गए। समय बीतता गया। दोनों इस मौके की तलाश में लगे रहते कि कैसे एक-दूसरे को नीचा दिखाया जाए।

कालू बंदर ने गुंडों को अपने पास बुलाया और बहुत सारे रुपए देकर हाथी को मारने के लिए सुपारी दे दी। इधर हाथी ने भी गुंडों को बुला कर बंदर को मारने के लिए पैसे दे दिए। उनकी घिनौनी साजिश का पता लगा तो बात जंगल में आग की तरह फैल गई थी। सारे जानवर आपस में खुसर-पुसर करने लगे। बात फैलते-फैलते जंगल के राजा शेर के पास पहुंच गई। राजा बहुत न्यायप्रिय था। राजा को किसी की लड़ाई अच्छी नहींं लगती थी। वह बहुत शांत स्वभाव का राजा था। उसकी इसी आदत के कारण सारी जनता महाराज को पसंद करती थी। महाराज खुद भी अमन पसंद थे और दूसरों को भी आपसे में लड़ने नहीं देते थे। जब उन्हें पता चला कि हाथी और बंदर में इतना बड़ा झगड़ा हो गया है तो उन्हें बहुत बुरा लगा। उन्होंने अपने मंत्री भालू को बुलाया और कहा, ‘कैसे भी करो, पर इन दोनों का आपसी झगड़ा खत्म करो।’

भालू मंत्री बहुत समझदार था। उसे एक उपाय सूझा। उसने सोचा, सभी जानवरों की एक सभा बुलाई जाए। उन्हें कुछ ऐसी नैतिक बातें और नसीहतें समझाई जाएं, जिनसे उनके अंदर रमा हुआ रोष खत्म हो सके। इस तरह के विचार को अमल में लाने ने लिए जल्दी ही भालू मंत्री ने जंगल में सभा करने का एलान करवा दिया। अगले दिन सभा में लगभग सभी जानवर एकत्र हो गए। हरिया हाथी और कालू बंदर भी उपस्थित हुए।
सभा का शुभारंभ हुआ। भालू मंत्री ने मंच का संचालन किया और शेर को अध्यक्षता करने के लिए मंच पर आमंत्रित किया।

महाराज ने सभी जानवरों को संबोधित करते हुए कहा, ‘मेरे प्यारे प्रजाजन, अगर हम सभी अमन, प्यार, सद्भावना, धीरज और शांति को अपने जीवन में धारण कर लें तो हम सब के लिए बहुत सुख की बात होगी। हम सभी क्यों ऐसी छोटी-छोटी बातों में इतने उलझ जाते हैं कि अपने जीवन की शांति को अशांति में खुद बदल डालते हैं? क्या हम आपस में भाईचारे की भावना के साथ जिंदगी नहीं जी सकते? हम अगर थोड़ी-सी सहनशीलता अपना लें तो आपसी मनमुटाव को बड़ी आसानी से मिटा सकते हैं। लड़ कर एक-दूसरे को पीड़ा देकर आखिर हम क्या हासिल करना चाहते हैं? क्या किसी के प्राण लेकर हम अपने को विजयी कहलाना ज्यादा पसंद करते हैं? क्या ऐसा करके हम महान बन सकते हैं?’

महाराज की बातें सुन कर सबको संतोष हुआ। महाराज के बाद अब मंत्री भालू ने कहा, ‘हम सब एक मालिक के बंदे हैं और अगर हम नेकी के रास्ते पर चलेंगे तो हम हंसते-हंसते इस दुनिया से जाएंगे तो भगवान भी हमारे जीवन से खुश होंगे। हमें एक-दूसरे के साथ मिल कर रहना चाहिए और अगर कहीं नाराजगी भी है, तो उसका समाधान करना चाहिए न कि एक-दूसरे के प्रति दुश्मनी पालनी चाहिए।’

महाराज और मंत्री के ऐसे दिल छूने वाले प्रवचनों से सभी जानवर बड़े खुश थे। भालू मंत्री ने बातों ही बातों में हरिया हाथी और कालू बंदर को मंच पर बुलाया और उनके बीच संबंधों के बारे में असलियत सबको बताई। दोनों अपनी पोल खुलने पर लज्जित होकर पछता रहे थे कि कहां वे जानी दुश्मन बन बैठे थे, पर महाराज ने उनको अपने मतभेद भुला कर सुख-चैन से जंगल में जीने के लिए प्रेरित किया। उन्होंने महाराज और सभी जानवरों से अपने गलत आचरण के लिए माफी मांगी और कहा कि आप सबने हमारी समस्या को अपनी समस्या मान कर हमारी आंखें खोल दी। हम वाकई बहुत गलत थे। हम वादा करते हैं कि अब हम भविष्य में कभी किसी से नहीं लड़ेंगे और अमन-चैन के साथ जीवन जीएंगे। महाराज के कहने पर दोनों ने अपने मतभेद भुला कर एक-दूसरे को गले लगा लिया। सभी जानवरों ने महाराज का जय-जयकार किया और अपने-अपने घरों की तरफ चल दिए। सच ही कहा गया है कि हमें अपने मतभेद भुला कर सही जीवन जीना चाहिए।