भगवान अटलानी
जब शरीर को कोई श्रम नहीं करना पड़ा, तो थकान क्यों महसूस हुई? अगर मन की थकान को शरीर की थकान का कारण माना जाए, तो महसूस होना चाहिए न, कि अमुक वारदात की वजह से संवेदनाएं झंकृत हो गर्इं और इसलिए पहले मन फिर शरीर पर असर हुआ। ऐसी कोई घटना नहीं होती, जो मन को क्लांत करे। कुछ दिन पहले सटे हुए मकान में एक आयोजन में जाने का प्रसंग बना। बेटे को नौकरी मिली थी, इस उपलक्ष्य में चुनिंदा लोगों को दोपहर भोज के लिए आमंत्रित किया गया था। कपड़े बदले और अपने घर से निकल कर पड़ोस के मकान में चले गए। कोई बोझ या तनाव नहीं। यातायात का दबाव नहीं। ट्रैफिक सिग्नलों का झंझट नहीं। प्रदूषण नहीं। गरमी का प्रकोप नहीं। मुश्किल से एक मिनट लगा होगा पहुंचने में।
कॉलोनी में से किसी को नहीं बुलाया गया था, इसलिए परिचित भी कोई नहीं था वहां। दस-बारह लोग कुर्सियों का झुरमुट बना कर बैठे गपशप कर रहे थे। पड़ोसी महाशय ने वहां ले जाकर बैठाया, औपचारिक रूप से परिचय कराया और अपने काम-धंधे से लग गए। कभी सेवानिवृत्ति के बाद किए जा रहे कार्यकलापों, कभी जमाने की तेजी से रफ्तार पकड़ती गति और कभी राजनीतिक परिदृश्य चर्चा का विषय बनता-बदलता रहा। मैं इनमें से प्रत्येक विषय पर विचार व्यक्त करने की स्थिति में था, मगर अपरिचितों के बीच होने के कारण मुझे बोलने की जरूरत महसूस नहीं हुई।
होंठों से मुस्कुराहट चिपकाए मैं आधा-पौन घंटा वहां बैठा। सबके साथ भोजन किया। दस-पंद्रह मिनट उसके बाद भी वहां रहा और फिर हम लोग लौट आए। घर पहुंचे तो लगा, बहुत थक गया हूं। क्या किया मेरे शरीर ने ऐसा कि थकान महसूस होने लगी? भोजन करने के लिए ग्रास उठाना, ग्रास को थाली से मुंह तक ले जाना, हाथ को वापस नीचे ले आना, मुंह में डाले गए ग्रास को चबाना, भोजन के बाद पानी पीना, उठ कर हाथ धोना, कुल्ले करना, जेब से रूमाल निकाल कर हाथ पोंछना, ये सब ऐसे काम थे क्या कि शरीर थक जाए? बोला नहीं था। बहस नहीं हुई थी किसी से। दिमाग पर कोई दबाव नहीं था। दूसरे लोगों की बातें, उनके तर्क-वितर्क सुन कर मन ही मन गलत-सही जरूर ठहरा रहा था बोलने वालों को। मगर एक बार भी पक्ष नहीं बना। जुबान खोलकर न किसी बात का समर्थन किया और न विरोध। होंठों की मुस्कराहट को आधार मानें तो मैं बातों का मजा ले रहा था। मन को अप्रिय लगे, ऐसा कुछ नहीं था वहां। भोजन ऐसा नहीं था कि जायका खराब कर दे। मान-सम्मान में कमी नहीं थी। मालूम नहीं कि पड़ोसी होने के नाते या निकटता के कारण, मगर पूरी कॉलोनी में से अकेले हमें आमंत्रित किया गया, अंदर ही अंदर गौरवानुभूति थी।
इन स्थितियों में न मन को थकना चाहिए, न तन को। फिर भी थकान महसूस हो रही है तो क्यों? क्या कारण हो सकता है इसके पीछे? उम्र का असर मानें तब भी प्रश्न अपनी जगह खड़ा है कि बिना शारीरिक या मानसिक श्रम किए थका-थका क्यों महसूस करता हूं? कुछ दिन पहले कर्मचारी संघ में साथ काम कर चुके और लगभग दस साल पहले सेवानिवृत्त हुए एक मित्र का दिल्ली से आना हुआ था। घर मिलने आए। मैं तपाक से गले मिला। गर्मजोशी से स्वागत किया। खुल कर बातें की। दो-तीन पुराने नेता साथ थे उनके। जाते-जाते एक ने कहा भी, ‘देखकर खुशी होती है कि सेवानिवृत्ति ने आपके ऊपर कोई विपरीत असर नहीं डाला है। आप उतने ही चुस्त-दुरुस्त हैं जितने पहले हुआ करते थे।’ मैं ठहाका लगा कर हंस दिया था।
लौटने के कोई एक घंटे बाद मित्र का फोन आया, ‘बाकी लोग साथ थे इसलिए उस समय पूछा नहीं। सब कुछ ठीक है न?’
‘ठीक तो है सब कुछ! आपको कुछ गलत लगा क्या?’
‘गलत तो नहीं, मगर कुछ ठीक भी नहीं लगा।’
‘कैसे? कैसे कहते हैं आप यह बात? मेरे व्यवहार में कोई बदलाव था?’
‘ऊपर से तो सब कुछ ठीक था। मगर लगातार महसूस हो रहा था कि तुम पहले वाले व्यक्ति नहीं हो।’
‘नहीं-नहीं। मैं वैसा ही हूं, जैसा पहले हुआ करता था। एक साथी ने आपके सामने यह बात कही भी थी।’
‘हां, कही थी। मगर तुम जितने भी बनो, सच्चाई मुझसे छिपा नहीं सकते।’
‘क्यों छिपाऊंगा सच्चाई आपसे, बताइए?’
‘दूसरे लोग साथ थे इसलिए हो सकता है, मन को खोलना ठीक न लगा हो तुम्हें!’
मैंने नकली ठहाका लगाया, ‘ऐसी कोई बात नहीं है। आप निश्चिंत रहिए।’
‘ठीक है, तुम कहते हो तो मान लेता हूं।’ उन्होंने ठहराव के साथ कहा।
किसी से क्या कहूं? किसी को क्या बताऊं? मुझमें परिवर्तन आया है। मेरी सामर्थ्य, काम करने की शक्ति, शरीर और मन की ताकत कम हुई है। अहसास के बावजूद न मुझे इसका कारण मालूम है और न मैं इसे स्वीकार करने की मन:स्थिति में हूं। बेफिक्री, चुस्ती, हाजिरजवाबी, चुनौती स्वीकार करने की प्रवृत्ति कुंद होने के संकेत गंभीरता से मानने को तैयार नहीं हूं। जो मुझे समझते हैं, स्वाभाविक है कि इस परिवर्तन को महसूस करेंगे। मित्र ने भी अगर पकड़ा और टोका तो आश्चर्यजनक नहीं मानना चाहिए। मित्र से कह दिया। अगर स्वयं से भी झूठ बोलूं, तो कौन रोक सकता है? गलत बयानी, पर्देदारी, लुकाछिपी और बच-बचाव करके मैं किसे धोखा दे रहा हूं? जो परिवर्तन महसूस होते हैं, उनके ऊपर काबिज होना संभव है क्या इस तरह?
पहले जितना प्रफुल्ल नहीं रहता हूं। कारण? शायद प्रफुल्लता का वातावरण नहीं है चारों ओर। एकरसता में दिन उगता है। एकरसता में डूब जाता है। किताबों, पत्र-पत्रिकाओं में जो सामग्री पढ़ता हूं, उसमें नयापन होता है। ऐसा बहुत कुछ पढ़ने को मिल जाता है, जो मेरी जानकारियों में इजाफा करता है। असहमति की स्थिति में सोच जिन बिंदुओं से साक्षात्कार कराता है, उससे मौलिकता का अहसास जागता है। ज्ञान में वृद्धि और चिंतन का विस्तार संयुक्त रूप से मुझे समृद्ध बनाते हैं।
किंतु पढ़ना, पढ़ना और सिर्फ पढ़ना, आखिर कब तक पढ़े कोई? कई बार पढने की इच्छा नहीं होती। किताबें, पठन सामग्री देख कर वितृष्णा-सी होने लगती है। उचाट मन से पढ़ा हुआ कुछ भी न आनंद देता है और न ठीक तरह से समझ में आता है। ऊब कर टीवी देखने लगता हूं या सीडी लगा कर देखने, सुनने लगता हूं। एकाध घंटे में मन उससे भी भर जाता है। समझ में नहीं आता, क्या करूं? कैसे समय व्यतीत करूं?
मनचाहा प्रफुल्लित करता है। अनचाहा कम या अधिक प्रताड़ित करता है। मन और शरीर की स्थिति में जो गिरावट महसूस होती है, उसकी जड़ में यह सिद्धांत तो नहीं है? जीवन भर जिन गतिविधियों में संलग्न रहा हूं, उनके कारण महत्त्व मिलता रहा है। महत्त्व का स्वाद मन में निरंतर बना रहा है। उस जायके के चलते वैशिष्ट्य बोध का एक घेरा नजर न आते हुए भी खुशबू की तरह अनुभव करता रहा हूं। यह अनुभूति इतनी ऊर्जा देती है शायद कि मन और बदन दोनों हवा की तरह संपूर्ण तरलता के साथ गतिशील रहते हैं। कभी ऊब नहीं होती। नीरसता नहीं आती। थकान नहीं लगती। समय की कमी नहीं अखरती। मुश्किल से मुश्किल काम भी बोझ नहीं बनता। सब कुछ इतनी खूबसूरती से होता जाता है कि महसूस ही नहीं होता, कोई प्रयत्न भी करना पड़ा है संपादित करने के लिए।
महत्त्व प्राप्ति की लालसा थी, तो उस रास्ते को क्यों छोड़ा जिस पर चल कर इच्छित मिलता था? सेवानिवृत्ति के बाद कर्मचारी संघ में पद पर बने रहना संभव नहीं था तो सलाहकार के रूप में ही सही, सक्रिय रहा जा सकता था। कुछ दिन पहले जो मित्र दिल्ली से आए थे, किसी न किसी रूप में जुड़े हुए हैं न कर्मचारी संघ से? मुझे तो केवल दो साल हुए हैं, वे पिछले दस वर्षों से अपनी उपस्थिति को दर्ज करा रहे हैं। मुझसे मिलने आते समय कर्मचारी संगठन के दो-तीन पुराने नेताओं का साथ होना इस बात का प्रमाण था कि उनका महत्त्व बरकरार है। मेरे लिए संभव नहीं होता क्या यह सब? मैंने न कोशिश की और न रुचि दिखाई। अब जब पिछड़ गया हूं तो अकेला, अनुपयोगी और व्यर्थ महसूस करते हुए तनावग्रस्त हो गया हूं। अकारण होने वाली थकान, खीझ, झुंझलाहट, अंसतोष, ऊब की जड़ में यह अव्यक्त तनाव ही तो नहीं है?
भीड़ में रहना मुझे पसंद है। अब एकांत चुना है मैंने। लोग तारीफ करें। मेरी स्थिति और हैसियत के संदर्भ में उनमें ईर्ष्याभाव हो। विरोध करने वालों को निस्सहायता तथा कमतरी का अहसास कराने के लिए जरूरी खेल खेलता रहूं। कहीं जाऊं तो सामान्य आदमी जैसा व्यवहार न किया जाए। कहूं, चाहे न कहूं, मगर इससे मुझे सुख मिलता है। एकांत में रह कर आजकल जो कुछ मैं करता हूं वह जीवन भर की साध लगी होगी, पर सचमुच मेरा भ्रम है। सब कुछ छोड़ कर केवल पढ़ता रहूं, क्योंकि चाहते हुए भी कभी पढ़ने के लिए समय नहीं निकाल पाया, यह वहम है।
मुझे बाहर निकलना होगा इन भ्रमों और वहमों से। वही करना होगा जो मुझे सर्वाधिक प्रिय है। न सही कर्मचारी संघ की राजनीति, पर मोहल्ले की विकास समिति है। वरिष्ठ नागरिकों के लिए काम करने वाली संस्थाएं हैं। सेवानिवृत्त कर्मचारी संगठन है। क्यों दूर जाता हूं? कालोनी के प्रवेश मार्गों पर दरवाजे लगवा कर सुरक्षा की दृष्टि से प्रहरी नियुक्त करने की चर्चा कई महीनों से विकास समिति में की जा रही है। धन जुटा कर इस व्यवस्था को लागू करने की बात बन नहीं पा रही है। संकेत मात्र देने की देर है, विकास समिति वाले हाथों-हाथ लेंगे। भले ही बासठ का हो गया हूं, पर मैं बूढ़ा नहीं हुआ हूं अभी। न मन से और न तन से।
मैं खड़ा हो जाता हूं। जोर से आवाज लगा कर पत्नी को कहता हूं, ‘सुनती हो, मैं विकास समिति के अध्यक्ष से मिलने जा रहा हूं।’
