दिल्ली में चांदनी चौक, सदर बाजार, मटिया महल, अनाज मंडी फिल्मिस्तान, लारेंस रोड, बाहरी दिल्ली के कई गांव- नरेला, बवाना, अलीपुर, शाहदरा, विश्वास नगर, गांधी नगर, धर्मपुरा, कैलाश नगर, रघुवर पुरा, करावल नगर, सभापुर, सबोली, तुगलकाबाद एक्सटेंशन, सोनिया विहार, मौजपुर, चांद बाग, चौहानपट्टी, खजूरी खास, सुल्तानपुरी, नंद नगरी, मदनपुर खादर, कोटला मुबारकपुर, दिलशाद गार्डन, मंडावली, न्यू अशोक नगर, गाजीपुर, चिल्ला गांव, बुराड़ी, बादली, मंगोलपुरी, जहांगीर पुरी, शालीमार बाग, पीतमपुरा, संगम विहार, जैतपुर, बदरपुर, कालकाजी, जंगपुरा, भोगल, खानपुर, अंबेडकर नगर, मदनगीर, मटियाला, तिलक नगर, नवादा, उत्तम नगर, हरि नगर, सागरपुर, डाबड़ी, पालम गांव, पालम विहार, कापसहेड़ा, नजफगढ़ और मंडोली ऐसे क्षेत्र हैं, जहां छोटे-बड़े कई कारखाने अवैध रूप से संचालित किए जा रहे हैं। नरेला, बवाना, ओखाला भले औद्योगिक क्षेत्र हैं, पर यहां भी कई कारखानों में नियमों को ताक पर रख कर काम कराया जा रहा है।

हर घंटे आग की तैंतीस घटनाएं
दिल्ली अग्निशमन विभाग के आंकड़े बताते हैं कि दिल्ली में करीब तीस हजार आग की सूचना हर साल मिलती है। अपने नारे ‘हम रक्षा करने के लिए काम करते हैं’ को आत्मसात करने वाले विभाग के आंकड़े बताते हैं कि यहां आग से हर दिन एक व्यक्ति मौत में मुंह में समा जाता है और छह लोग झुलसते हैं। दिल्ली में हर घंटे तैंतीस आग की घटनाएं सामने आ रही हैं। बावजूद इसके अग्निशमन विभाग में पैंतालीस फीसद पद रिक्त पड़े हैं।

बीते तीन साल के आंकड़ों के मुताबिक 2014-15 में तेईस हजार, 242 घटनाएं हुई। दो हजार अड़सठ लोग घायल हुए। 2015-16 में सताईस हजार, नवासी घटनाएं सामने आर्इं। दो हजार निन्यानबे लोग घायल हुए। इसी प्रकार 2016-17 में तीस हजार, 285 घटनाएं सामने आर्इं। 1987 लोग घायल हुए। 2017-18 में उनतीस हजार, 423 घटनाओं के बारे में दमकल विभाग को जानकारी मिली। इसी प्रकार 2018-19 में इकतीस हजार, 264 आग की घटनाओं की जानकारी विभाग को दी गई।

सुरक्षा के इंतजाम नहीं
अनाज मंडी के जिस कारखाने में तैंतालीस मजदूरों की जान चली गई, वह दो सौ गज के चार मंजिला इमारत में बिना अग्नि सुरक्षा उपायों के संचालित किया जा रहा था। कारखाने में लगी आग के समय सभी मजदूर सो रहे थे। संकरी गली होने के कारण दमकल अंदर तक नहीं जा सका और पूरा इलाका तारों के जाल से उलझा हुआ था। कारखाने की खिड़कियां काफी ऊंचाई पर थीं, और उनके ऊपर प्लास्टिक का सामान रखा था। रौशनी के पुख्ता इंतजाम नहीं थे और गेट बंद होने के कारण धुंआ फैलने के बाद बाहर निकलने का कोई आकस्मिक रास्ता नहीं बनाया गया था। ताला तोड़ कर दमकल वाले जब तक अंदर गए, तब तक काफी देर हो चुकी थी। लिहाजा ज्यादातर लोगों की दम घुटने से मौत हो गई। दिल्ली अग्निशमन विभाग के निदेशक अतुल गर्ग का कहना है कि दिल्ली की संकरी गलियों को देखते हुए रिहायशी इलाकों में व्यवसायिक गतिविधियों को संचालित करने की अनुमति किसी भी विभाग को नहीं देनी चाहिए। दमकल विभाग की ओर से इसकी अनुमति नहीं दी जाती।

लाइसेंस का गलत इस्तेमाल
आग लगने की कई घटनाओं में देखा गया है कि कारखाना मालिक लाइसेंस कोई अन्य सामान बनाने के लिए लेता है और उसमें अवैध रूप से कुछ और सामान बनाया जाता है। पिछले साल बवाना स्थित एक पटाखा कारखाने में लगी भीषण आग में सत्रह मजदूरों की मौत हो गई थी। जांच के बाद पता चला था कि कंपनी के मालिक ने प्लास्टिक का सामान बनाने के लिए लाइसेंस लिया था और उसकी आड़ में मामूली मजदूरी देकर मजदूरों से पटाखा बनवा रहा था। संबंधित विभाग को इसकी भनक न लगे, इस वजह से मालिक रात को काम करवाता था और मुख्य दरवाजे पर ताला जड़ देता था।

5 साल में 1974 मौतें

आंकड़ों पर नजर डालें तो 2013-14 से लेकर 2018-2019 तक 1974 लोगों की मौत आग की चपेट में आने से हो गई थी। हर साल तकीबन तीन सौ लोगों की मौत आग की चपेट में आने से हुई है।
साल             मौत            घायल
2013-14    372             1597
2014-15    291             1767
2015-16    339             1987
2016-17    277             2099
2017-18    318             2068
2018-19    297            2299