मानस मनोहर
पिछले कुछ सालों में लोगों की भोजन संबंधी रुचियां काफी तेजी से बदली हैं। पोषण आदि को लेकर काफी जागरूकता आई है। इसकी बड़ी वजह शहरों, कस्बों तक में बड़े पैमाने पर ढाबों, रेस्तरां वगैरह का खुलना, संचार माध्यमों पर खानपान को लेकर लगातार चर्चा चलते रहना है। इसके चलते रसोई के उपकरण बदले हैं, उनमें निरंतर बदलाव हो रहे हैं, तो घरों में भोजन पकाने की पारंपरिक विधियां भी बदली हैं। मगर गलत खानपान की वजह से बीमारियां भी बढ़ी हैं। इसका एक कारण भोजन पकाने में उचित सावधानी नहीं बरती जाना है। इस बार इसी पर बात करते हैं।
खहते हैं कि भोजन के पचने की प्रक्रिया मुंह से ही शुरू हो जानी चाहिए, यानी भोजन को जितना चबाएंगे, उसका रस उतना ही शरीर को मिलेगा, वह उतनी ही आसानी से पचेगा। मगर पाकशास्त्र कहता है कि भोजन के गुण पकाने के साथ ही अपना प्रभाव दिखाना शुरू कर देते हैं। आप भोजन किस तरह की मानसिक स्थिति में पकाते हैं, उसका भी आपके भोजन पर असर पड़ता है। अगर भोजन खिन्न मन से पकाते और खाते हैं, तो वह शरीर में पहुंच कर विकार पैदा करेगा ही। इसी तरह हड़बड़ी में पकाया गया भोजन शरीर को जरूरी पोषण देने के बजाय नुकसान ही पहुंचाएगा।
तर्क है कि शहरों में लोगों के पास समय बहुत कम है। इसलिए अक्सर भोजन पकाने के मामले में हड़बड़ी देखी जाती है। बहुत सारे लोग फटाफट तैयार होने वाला भोजन तैयार करके फटाफट खाते हुए दफ्तर के लिए या फिर बच्चे स्कूल के लिए निकल जाते हैं। इस हड़बड़ी में तैयार भोजन का दुष्परिणाम सबसे अधिक हमारे बच्चों पर नजर आता है। वे सुबह ऊंघते हुए स्कूल के लिए तैयार होते हैं, उनके माता-पिता फटाफट उनके लिए कुछ नाश्ता तैयार करते हैं और हाथ में पकड़ा देते हैं। उनमें ज्यादातर घरों में ब्रेड-बटर-जैम, सैंडविच या फिर परांठे ही बनते हैं। वे बस पकड़ने, स्कूल समय पर पहुंचने की जल्दी में भागते हुए खाते हैं। माता-पिता समझते हैं कि वे उन्हें भरपूर पोषण दे रहे हैं, पर गलत ढंग से पका हुआ और गलत ढंग से खाया हुआ भोजन उनके शरीर पर उल्टा असर ही दिखाता है। यह एक बहाना है कि भोजन पकाने के लिए समय नहीं होता। घंटों बैठ कर टीवी देखने, मोबाइल फोन पर गप्पें हांकने या आलत-फालतू चीजें देखने-पढ़ने का समय तो लोगों के पास खूब है, पर भोजन पकाने का समय नहीं है! पहले इस मानसिकता से पार पाना होगा। भोजन पकाते समय भी दूसरे काम किए जा सकते हैं। बस समझने की जरूरत है कि भोजन पकाने का सही तरीका क्या है।
आग और आंच
भोजन पकाने में आग और आंच की भूमिका महत्त्वपूर्ण होती है। कहावत है कि सहज पके सो मीठा होय। तेज आंच पर पका भोजन सेहत के लिए ठीक नहीं होता। जो लोग हड़बड़ी में भोजन पकाते हैं, अक्सर आंच तेज रख कर ही पकाते हैं। इस तरह भोजन पका जैसा दिखता तो है, पर वह वास्तव में सहज ढंग से पका हुआ नहीं होता। इसी तरह जल्दी भोजन पकाने के मकसद से कुकर, ओवन जैसे रसोई के कुछ उपकरण भी बना लिए गए हैं, जिनमें पारंपरिक तरीके से पकने वाले भोजन की अपेक्षा बहुत कम समय लगता है। तेज आंच पर और कम समय में पके हुए भोजन का स्वाद भी उचित नहीं होता। इसलिए आग और आंच का ध्यान रखना बहुत जरूरी है।
आग का अध्ययन करें, तो आप देखेंगे कि कोयले या फिर लकड़ी की आग पर बने भोजन का स्वाद गैस पर बने भोजन की अपेक्षा बेहतर होता है। इसी तरह बिजली के उपकरणों की अपेक्षा गैस पर पके भोजन का स्वाद बेहतर होता है। हालांकि शहरों में लकड़ी या कोयले के चूल्हे इस्तेमाल करना संभव नहीं, पर गैस के चूल्हे की आंच का ध्यान रख कर भोजन का पोषण और स्वाद बढ़ाया जा सकता है।
जितना कम हो सके, धीमी आंच पर भोजन पकाएं। जैसे राजमा, चने, उड़द की दाल वगैरह को कुकर में रख कर बिल्कुल धीमी आंच पर रख कर एक से सवा घंटे तक पकने दें। राजमा और चने यानी छोले पकाना बहुत सारे लोगों के लिए खास काम होता है। पहले उसे उबारते हैं, फिर उसका मसाला तैयार करते हैं। इसकी कोई जरूरत नहीं। कुकर में पहले ही तड़का देकर उसमें टमाटर, प्याज, लहसुन का छौंक लगा लें। दो मिनट तक भूनने के बाद उसमें भीगे हुए राजमा डाल दें। ऊपर से नमक और मसाला, हल्दी, खटाई वगैरह डाल दें। राजमा के डूबने भर का पानी डालें और ढक्कन लगा दें। आंच को बिल्कुल धीमा कर दें और करीब सवा घंटे तक भूल जाएं कि उसमें कितनी सीटी आई या नहीं आई। इस बीच दूसरे काम भी करते रहें। सवा घंटे बाद एक बार देख लें कि राजमा या चने नरम हो गए हैं या नहीं। अगर जरूरत हो, तो और पंद्रह-बीस मिनट पकने दें। अगर राजमा और चने को अधिक मुलायम बनाना है, तो उसमें थोड़ा-सा ईनो या बेकिंग पाउडर डाल सकते हैं।
इसी तरह हर अनाज की प्रकृति को समझें और उसे पकाने के लिए बर्तन के चुनाव में सावधानी बरतें। जैसे मंूग की दाल बनानी हो, तो समझें कि इसकी प्रकृति कोमल होती है। अगर उसे कुकर में पकाएंगे, तो उसके गल कर पानी की तरह हो जाने की आशंका रहेगी। इसलिए उसे पहले ही तड़का वगैरह लगा कर ढक्कन वाली कड़ाही में धीमी आंच पर कम से कम आधे घंटे तक पकने दें, फिर जब वह फट जाए, तो आंच बंद कर दें। फिर देखें कि उसका स्वाद कैसा निखर कर आता है। चावल और रोटी के लिए मध्यम आंच रखी जा सकती है। हरी सब्जियों को पूरी तरह पका कर गलाना जरूरी नहीं होता। धीमी आंच पर आधा से कुछ अधिक पक जाने के बाद आंच बंद कर दें, तो उसका पोषण बना रहता है। दाल और सब्जियां बनाने के लिए हमेशा ढक्कनदार बर्तन का उपयोग करें।
भोजन पकाने के मामले में अनाजों, सब्जियों आदि की प्रकृति और उन्हें पकाने में आंच को लेकर निरंतर अध्ययन करते रहें, क्योंकि हर चूल्हे का बर्नर और हर कुकर की प्रकृति अलग होती है। इसलिए अपने उपकरणों के बारे में भी जानकारी रखें और उसी के मुताबिक धीमी आंच पर भोजन पकाएं, देर तक पकाएं, हड़बड़ी में न तो पकाएं और न खाएं। भोजन पकाने की आग और आंच का पेट की आग से तालमेल रहेगा, तभी भोजन सेहत के अनुकूल रहेगा।

