नरपत दान चारण
अपने ‘मन की बात’ कार्यक्रम में प्रधानमंत्री ने कहा कि आज जागरूकता के अभाव में कुपोषण से गरीब और संपन्न दोनों तरह के लोग पीड़ित हैं। उन्होंने कहा कि पूरे देश में सितंबर महीना ‘पोषण अभियान’ के रूप में मनाया जाएगा और उन्होंने लोगों से इससे जुड़ने और जानकारी प्राप्त करने की अपील की। इससे पहले प्रधानमंत्री 2022 तक देश से कुपोषण समाप्त करने की प्रतिबद्धता दोहरा चुके हैं। कुपोषण से निपटने के लिए केंद्र और राज्यों के बीच सभी योजनाओं में समन्वय बहुत जरूरी है। इसलिए राष्ट्रीय पोषण मिशन शुरू किया गया है। अगर कुपोषण को जड़ से खत्म कर दिया जाए तो भारत में मानव संसाधन से मिलने वाला लाभ कई गुना बढ़ जाएगा। कुपोषण के कारण देश को व्यापक रूप से शारीरिक, मानसिक, सामाजिक और करोड़ों डॉलर का आर्थिक नुकसान झेलना पड़ता है। दरअसल, न्यून पोषण एक ऐसा कारक है, जिसके कारण शिशु और मातृत्व मृत्यु दर अधिक होती है और बच्चे के जन्म के समय वजन कम हो जाता है।
कुपोषण की समस्या इसलिए गंभीर है, क्योंकि यह दृश्य होती है और एक पीढ़ी से दूसरी पीढ़ी में अंतरित होती रहती है। कुपोषण की गंभीरता को देखते हुए गत वर्ष अपने संबोधन में प्रधानमंत्री ने कहा था कि बाल कुपोषण को मिटाने के लिए तीन अतिरिक्त कदम उठाए जाने की जरूरत है। पहला, बच्चों को पर्याप्त स्तनपान कराना। दूसरा, सुरक्षित जल की आपूर्ति। और तीसरा, स्वास्थ्य रक्षा की अच्छी सुविधाएं मुहैया कराना। हमें इस बात को समझना होगा कि कुपोषण एक तरह से धीमा जहर है, जो शरीर को जिंदा तो रखता है, लेकिन भीतर से खोखला बनाता रहता है। इसकी अनदेखी न केवल वर्तमान बल्कि भविष्य को भी प्रभावित करती है। देश के भविष्य से जुड़ी इस गंभीर समस्या से निपटना नागरिकों और सरकार की साझा और अहम जिम्मेदारी है।
कुपोषण की गंभीरता को रेखांकित करने हुए विश्व बैंक ने कुपोषण की तुलना ब्लैक डेथ नामक महामारी से की है। इस महामारी के कारण अठारहवीं सदी में यूरोप की एक बड़ी आबादी मौत के मुंह में समा गई थी। सामान्य रूप से कुपोषण को सामान्य मामला मान लिया जाता है। दरअसल, कुपोषण का अर्थ है शरीर के अनुरूप पोषक आहार का न मिलना। एक स्तर के बाद कुपोषण से मानसिक विकास की प्रक्रिया अवरुद्ध हो जाती है। भारत में कुपोषण की समस्या वाकई गंभीर है। दक्षिण एशिया में भारत कुपोषण के मामले में सबसे बुरी स्थिति में है। भारत में अनुसूचित जनजाति, अनुसूचित जाति, अन्य पिछड़ा वर्ग और ग्रामीण समुदाय पर अत्यधिक कुपोषण का बोझ है।
अगर कुपोषण के आंकड़ों पर नजर डालें तो यूनिसेफ के अनुसार भारत में करीब 5.7 करोड़ बच्चे कुपोषण के शिकार हैं, जबकि देश में कुल कुपोषित लोगों की संख्या इससे भी अधिक है। यह आबादी का एक बड़ा हिस्सा है। कुपोषण के मामले में सबसे ज्यादा खराब स्थिति महिलाओं की है। 2015-16 के नेशनल फेमिली हेल्थ सर्वे-4 की मानें तो कुपोषण के कारण देश भर के 38.5 फीसद पांच साल तक के बच्चों की लंबाई उम्र से काफी कम थी। इनमें से इक्कीस फीसद में यह समस्या काफी गंभीर है। छोटे कद वाले बच्चों की तादाद शहरों में इकतीस फीसद और गांवों में इकतालीस फीसद के करीब है। दूसरी ओर स्वास्थ्य विभाग के आंकड़ों के अनुसार पांच साल से कम उम्र के पचास फीसद बच्चे और तीस फीसद गर्भवती महिलाएं कुपोषण की शिकार होती हैं। इसमें ज्यादातर वे गरीब परिवार हैं, जो अपने भोजन में पौष्टिकता को शामिल नहीं कर पाते हैं।
पोषक आहार न होने के कई कारण हैं। जैसे- महिलाओं का निम्न जीवन स्तर, पूरक आहार का अभाव और उनमें पोषण न होने संबंधी जानकारी का अभाव। इसके अलावा बच्चों में कुपोषण के कारणों में मां द्वारा बच्चे को दूध पिलाने का सही समय ज्ञात न होना, पर्याप्त मात्रा में भोजन न देना और साथ ही भोजन साफ बर्तनों में स्वच्छता के साथ तैयार नहीं किया जाना है। कुपोषण की समस्या बालिका शिशु के मामले में और बढ़ जाती है, जिसे बालक शिशु की तुलना में कमतर समझा जाता है। जब लड़की किशोरावस्था में पहुंचती है तो उसके कुपोषित होने और एनीमिया ग्रस्त होने तथा उसकी संज्ञानात्मक और शारीरिक क्षति होने की संभावना रहती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण के अनुसार भी लड़कों की अपेक्षा लड़कियां ज्यादा कुपोषित हैं। सत्तर फीसद किशोरियां एनीमिया यानी खून की कमी की शिकार हैं। इसलिए कुपोषण निवारण की नीति और कार्यक्रम को बालिकाओं और माताओं के स्वास्थ्य से जोड़ कर देखने की जरूरत अधिक है।
दरअसल बाल कुपोषण की शुरुआत महिला के गर्भवती होने के दौरान तथा बच्चे के जीवन के शुरुआती पहले साल में ही हो जाती है। एक आंकड़े के मुताबिक कुपोषण से देश में करीब सत्रह लाख बच्चे एक साल की उम्र पूरा करने से पहले और 1.8 लाख बच्चे एक महीने की उम्र पूरी किए बिना ही मौत के शिकार हो जाते हैं। इन मौतों का मुख्य कारण है, पर्याप्त स्तनपान न हो पाने से भूख, डायरिया और निमोनिया। यूनिसेफ की प्रोग्रेस फॉर चिल्ड्रन रिपोर्ट में चेतावनी दी गई कि अगर नवजात शिशु को आहार देने के उचित तरीके के साथ स्वास्थ्य के प्रति कुछ साधारण सावधानियां अपनाई जाएं, तो भारत में हर वर्ष होने वाली पांच वर्ष से कम आयु के छह लाख से ज्यादा बच्चों की मौत को टाला जा सकता है।
पोषण की कमी का एक अन्य कारण अनाज का सही वितरण न हो पाना भी है। इंडियन इंस्टिट्यूट आॅफ पब्लिक एडमिनिस्ट्रेशन की एक रिपोर्ट बताती है कि देश में हर साल करोड़ों टन अनाज, दाल, फल और सब्जियां वितरण प्रणाली में खराबी के चलते खराब हो जाते हैं तथा शादी समारोह, उत्सव, त्योहार आदि में बड़ी मात्रा में पका खाना बर्बाद कर दिया जाता है। इसलिए भुखमरी कुपोषण का एक बड़ा कारण है। भूख के कारण कमजोरी के शिकार बच्चों में बीमारियों से ग्रस्त होने का खतरा बना रहता है। इसके अलावा करोड़ों बच्चों का शारीरिक और मानसिक विकास नहीं हो पाता है।
हालांकि भारत में कुपोषण मिटाने के लिए काफी प्रयास किए जा रहे हैं। जैसे आयोडीन युक्त नमक, विटामिन ए, आयरन सप्लीमेंट, स्तनपान जागरूकता आदि। स्वच्छ भारत मिशन की सफलता ने भी कुपोषण मिटाने में अहम भूमिका अदा की है। देखने में भी आ रहा है कि देश कुपोषण से मुक्ति की ओर तेजी से आगे बढ़ रहा है। बहरहाल, अब यह उम्मीद की जाती है कि सरकार पोषाहार, गर्भवती महिलाओं और दूध पिलाने वाली मांओं को दी जाने वाली आर्थिक सहायता को सीधे जरूरतमंदों तक पहुंचाएगी, जिससे कि देश को कुपोषण मुक्त होने की ओर तेजी से आगे बढ़ने में सहायता मिलेगी।

