नूतन पांडेय
ममा तो खुशी से पागल हो गईं। आज पोते का रिजल्ट आया है। एमबीबीएस पास कर डॉक्टर जो बन गया है। बूढ़ी दौड़ी महावीर स्थान की ओर। आंचल की खूंट में था पांच टका और दो यानी सात टका। हिसाब लगाया- पांच टके का लड््डू महावीरजी को, सवा टका भगवती स्थान में, बचा बारह आना। इसमें से अठन्नी तो पंडित को दक्षिणा देना पड़ेगा। क्षण भर के लिए मन खिन्न हो गया। मन ही मन बड़बड़ाई- ‘महावीरजी को तो भगवान का अंश चढ़ेगा, पर यह मुंहझौंसा पुजारी क्यों लेगा?’
पर तुरंत ही मन ने कहा- ‘आज खिसियाने का दिन नहीं है। ऐसा कितना रुपैया तो हमारा बबुआ कमा कर लाएगा।’ इतना सोचना था कि ममा हवा से बातें करने लगीं और पहुंच गर्इं महावीर स्थान।
सोनमा की दुकान से पांच टके का लड््डू खरीदा। बाकी पैसा संभाल कर खूंट में बांध कर चलने को हुर्इं, तभी सोनमा पूछ बैठा- ‘ममा, का बात है? आज कथी का परसाद चढ़ा रही हैं? बहुत खुश लग रही हैं?’
ममा चिहुंक कर बोलीं- ‘हमरा हरिंदरा डॉक्टर बन गया है।’
सोनमा ने पूछा- ‘आया है क्या?’
‘नहीं, चिठ्ठी आई है। कल हरिंदरा आएगा।’ ममा हरेंद्र को हरिंदरा ही बुलाती थीं। उनका कहना था कि इस पुकार में प्यार झलकता है।
खुशी के मारे जमीन पर पैर नहीं धरा जा रहा था। किसी तरह अपना पूजा-पाठ निबटा कर ममा घर पहुंचीं। लग रहा था कि वे किसी लाम से विजय लाभ कर वापस आई हैं। पतोहू से एक कप चाय की मांग हुई। हरिंदरा माय सोचती है- ‘रूआब त ऐसा दे रही हैं जैसे नौ महिना इन्होंने पेट में रखा था। आखिर सपूत तो हमहीं ने जना है।’ सोच कर थोड़ा तन कर काम करने लगी। फिर भी सास के समक्ष चुपचाप अपने काम में लगी रही। बहुत ही सीधी है बेचारी। आज पैंतीस वर्ष हो गए इस घर में, मजाल है कोई कह दे कि बहू ने सास को पलट कर जवाब दिया!
यही कारण है कि बुढ़िया भी ठसक में रहती है। चाय बनाते-बनाते हरिंदरा माय सोचती है- ‘कितना मेहनत करके बेटा को डॉक्टरी पढ़ाए हैं। नैहर वाला सारा गहना उसकी पढ़ाई पर दांव लगा दिए। आज कान-गला सब खाली है। तब बेटा तो लायक बन गया न! इंटर के बाद तो पढ़ाई बंद करने की नौबत आ गई थी, लेकिन भगवान की किरपा…। एक बार तो रिजल्ट दिया हुआ, पर यूनिवर्सिटी में क्या जो गड़बड़ हुआ कि फिर से कॉपी जांच किया गया। बड़का आदमी के बेटा-बेटी के कॉपी जांचा-जांची के चक्कर में हरिंदरा दसवां स्थान में फर्स्ट कर गया। उसका तो भागे जाग गया, स्कालरशिप मिल गया। हालांकि स्कॉलरशिप में कहां पुरता है। पांच बीघा खेत भी तो बंधकी रखे, गहना तो बेच ही दिए, तब कहीं जाकर आज यह सुख का दिन देखने को मिला है।’
इन्हीं सब विचारों में चाय खौलती जा रही थी कि अचानक बूढ़ी चिल्लाई- ‘ऐ हरिंदर माई! सो गई क्या?’ सुन कर हड़बड़ा के देगची को उतारा हरिंदर माई ने। थोड़ा हाथ भी जला, पर अब तो सब कुछ सुहाना ही सुहाना है। चाय छान कर सासू को दिया और खुद भी लिया। आज तो चाय कुछ अधिक ही मीठी लग रही है। मन की मिठास जो इसमें समाई है! चाय की चुस्की के साथ बूढ़ी ममा ने कहा- ‘आय हे कनिया! अब त हरिंदरा के बियाह भी करे पड़ेगा, है कि नैय? तुमने कैसी कनिया सोच रखा है?’ यह कहते-कहते बूढ़ी के मोतियाबिंद से धुंधलाई आंखें ऐसी चमकने लगीं जैसे नई बैट्री वाली टॉर्च। झुर्रियां पड़े गाल लाल हो उठे। सब कुछ जैसे रंगीन हो गया हो।
पुन: बुढ़िया ममा कहने लगीं- ‘मौर पहन कर हमारा पोता कैसा लगेगा? हम तो ऐसा ‘डोमकच’ करेंगे कि पूरा गांव देखता रह जाएगा।’ और विचारों में पोते की शादी की तैयारी में लग गर्इं ममा। झूम-झूम कार चाय की चुस्की के साथ कांपते स्वर में गीत भी गाए जा रही थीं- ‘घोड़ा… चढतय, मौ…र पिन्हतय हमर हरिंदरा ना…’। आज अगर कोई ममा से कुछ भी मांग देता तो वो खुशी-खुशी दे देतीं, जबकि इनको किसी को कुछ देने के नाम पर चिढ़ते ही देखा गया है।
‘अब क्या कमी है। डॉक्टर पोते के लिए तो बहुत बढ़िया-बढ़िया बतुर्हार (रिश्ता) आएगा। लड़की के साथ-साथ घर-द्वार, सर-संपत्ति सब देखा जाएगा। कम से कम पांच नहीं, तो चार लाख तो गिन कर हाथ पर लेना है, उसके अलावे गहना, कपड़ा-लत्ता, फर्नीचर और आजकल का सब सर-सामान।… वो क्या कहते हैं? हां! फ्रिज, टीवी, मिस्की- वही मसाला पीसने वाला- यह सब तो आएगा ही। जिंदगी भर का दुख हरिंदरा ने दूर कर दिया।’
इन्हीं सब उधेड़बुन में बूढ़ी ने खाना कुछ अधिक ही खाया। रात भर स्वप्न में डोमकच नाचती रहीं। स्वप्न में घर में बने फ्रिज का आईसक्रीम खाकर तो चार बचा हुआ दांत जैसे गल ही गया। बग-बग सफेद पॉलिएस्टर की साड़ी पहन पोता और पोत-पतोहू को जब परिछने गर्इं तब गले में सोने वाली सिकड़ी पहनना भी नहीं भूलीं। गदगद होकर पोपल मुंह से खूब गाली गार्इं… टिकुलबेच्चा के बेटी…, हरबहबा के बेटी…, जादूगरनी ना…।
स्वप्न देखते-देखते सुबह हो गई। हरिंदरा माई उठाने आई- ‘अम्माजी उठिए हरिंदर आ गया।’
पहले तो नींद में ही कहने लगीं- ‘रुको गीत पुराने दो।’ फिर हड़बड़ा कर उठ गर्इं और बोलीं- ‘दुलहिन को परिछने चलो, यहां खड़ी क्या हो? द्वार लगेगा कैसे?’
बहू चौंकी- ‘किसकी दुलहिन?’ जोर से बोली- ‘अम्मा हरिंदर आया है। उजरका मारुती में। एक साहेब भी हैं साथ में।’
इतने में हरिंदर अंदर आ ही गया। बोला- ‘गोड़ लगते हैं ममा।’
तब बूढ़ी को होश आया- ‘जुग-जुग जीअ। किसके साथ आए हो?’
‘ई डाक्टर साहेब हैं। हमारे सर्जरी के हेड।’
‘हां! अब त हमारा मुन्ना मोटर में चलेगा ही।’ स्वर में गर्व झलक रहा था। पुन: बोलीं- ‘बड़े-बड़े लोगों में उठेगा-बैठेगा। चलो मुंह-हांथ धो लो बबुआ! सामान कहां है?’
‘यही तो है।’ हाथ के ब्रीफकेस को दिखा कर बोला हरिंदर।
ममा हंसने लगीं- ‘इसकी मजाक करने की आदत गई नहीं। अरे! हम तुम्हारे अटैची-बेडिंग की बात कर रहे हैं। कहां है सब?’ कह कर ममा बाहर जाने को उठीं।
तभी हरेंदर बोला- ‘कुछ नहीं लाए हैं ममा। आज ही दस बजे तक वापस निकल जाएंगे। डॉक्टर साहब अस्पताल छोड़ कर आए हैं।’
‘डाक्टर साहेब को नाश्ता-पानी करा कर जाने दो। तुम थोड़े दिन आराम करो। कितना मेहनत लगा है। थोड़ा घर का दूध-घी खाओ। दस-पंद्रह दिन भी नहीं रहोगे तो क्या रहोगे!’ ममा अपने झोंक में कहे जा रही थीं।
हरिंदर झऊआ कर बोला- ‘तुम भी सठिया गई हो ममा। पंद्रह-बीस दिन यहां बैठेंगे तो मेरा भविष्य क्या मेरे लिए बैठा रहेगा?
इतने में हरिंदर के बाबू ने आकर कहा कि डॉक्टर साहब तुमको बुला रहे हैं। सुन कर दौड़ा हरिंदर बाहर की ओर।
बूढ़ी ने बेटे से कहा- ‘हरिंदरा कह रहा है कि अभी ही वापस जाएगा?’
उदास होकर बेटे ने कहा- ‘हां! डॉक्टर साहब हरिंदरा को मांगने आए हैं।’
‘माने?’ चौंक कर पूछा बूढ़ी ममा ने।
‘डॉक्टर साहेब अपनी इकलौती बेटी के लिए हरिंदरा का हाथ मांगने आए हैं। आजकल का लड़का; पहले ही तैयार होकर आया है।’ अन्सा कर बोले जा रहे थे हरेंदरा के बाबू- ‘बाप-माय का उम्मीद जैसे कुछ भी नहीं! उसके सामने है बस उसका अपना भविष्य। डॉक्टर ससुर की जमी-जमाई प्रैक्टिस के साथ दिख रही है उसकी पुरजोर संपत्ति। बड़ा डॉक्टर उसे घर जमाई बनाना चाहता है।’
बूढ़ी का मगज गरम हो गया। बिगड़ कर बोली- ‘आज तक इस खानदान में यह हुआ है जो आज होगा! बेटिहा बन कर आया है कि बेटहा? हमारा पोता मुफ्त का नहीं है, सारी पूंजी लगा कर डॉक्टर बनाए हैं। घर जमाई बनेगा! कह देने से हो गया क्या?’
दनदनाता हुआ हरिंदरा अंदर पहुंचा- ‘ममा! दिमाग खराब हो गया है क्या? देख नहीं रही हो कि एक शरीफ इंसान दरवाजे पर बैठा है। तुम लोगों को तो बस अपनी ही चिंता रहती है। दुनिया में रहने के लिए पैसा चाहिए, पैसा। बैठे-बैठे मुझे लक्ष्मी मिल रही है और तुम हो कि नाटक कर रही हो। सचमुच, बिल्कुल ही सठिया गई हो। बूढ़ी तो हो ही गई हो अब…
‘क्या बोले?’ उसकी बातें सुन कर बूढ़ी ने धुंधलाई आंखों से उसे देखा और चेहरे का भाव देख कर दंग रह गई। विश्वास ही नहीं हो रहा था कि उसका ही हरिंदरा है। इतना बड़ा हो गया? हाल तक तो बिना ममा के खिलाए एक कौर भी नहीं खाता था। मालिस से लेकर नहलाना तक उन्हें ही करना पड़ता था। कब यह बड़ा हो गया? नहीं-नहीं, यह हमारा हरिंदरा नहीं है! सपना है क्या? चिकोटी काट कर देखा। उफ्फ! यह तो दर्द किया। मतलब मैं जगी हुई हूं। पर…
उसके बाद कब हरिंदरा माय ने खाना-पीना बनाया! किसने खाया, किसने नहीं खाया? कब ग्यारह बज गया, कुछ भी ध्यान नहीं रहा बूढ़ी को। सब एक ही झटके में चूर-चूर हो गया। पैर छूकर हरिंदरा गाड़ी में बैठ गया। ड्राईवर ने गाड़ी स्टार्ट कर दी।
गाड़ी अपने रास्ते चल पड़ी और साथ ही ले गई बूढ़ी की सारी उम्मीदें, खुशियां और सुंदर सुनहरे सपने। पीछे रह गया धूल का गुबार, जिसमें समा गई पोलिएस्टर की साड़ी, सोने की सिकड़ी और ठंडी-ठंडी आईसक्रीम।

