भारतेंदु हरिश्चंद्र को आधुनिक हिंदी साहित्य के साथ-साथ हिंदी रंगमंच का भी जनक कहा जाता है। वे आधुनिक भारत के महान हिंदी लेखकों में से थे। उनका जन्म वाराणसी के चौखंभा मोहल्ले में हुआ था। उनके पिता गोपाल चंद्र भी कवि थे। इस तरह उनको काव्य-प्रतिभा अपने पिता से विरासत में मिली थी। भारतेंदु को अपने माता-पिता का स्नेह बहुत कम वर्षों तक मिल पाया।

हिंदी नाटक और रंगमंच के प्रवर्तक
भारतेंदु का सबसे बड़ा योगदान नाटक और रंगमंच के क्षेत्र में रहा। उनके नाटक लेखन की शुरुआत बांग्ला के विद्यासुंदर (1867) नाटक के अनुवाद से हुई। उन्होंने पहली बार हिंदी में मौलिक नाटकों की रचना की। उन्होंने मौलिक और अनूदित मिला कर कुल सत्रह नाटकों की रचना की। भारतेंदु को हिंदी का पहला मौलिक नाट्य चिंतक भी माना जाता है। उनसे पहले के नाटक धार्मिक और भावुकता प्रधान थे। इसकी जगह भारतेंदु ने पौराणिक, ऐतिहासिक, राजनीतिक और सामाजिक नाटक लिखे। इसके जरिए उन्होंने तार्किक चिंतन विकसित करने की कोशिश की। भारतेंदु ने पारसी और पश्चिमी थिएटर के प्रभाव से दूर हिंदी रंगमंच की स्थापना की।

‘भारतेंदु’ की उपाधि
उन्होंने अपना जीवन हिंदी साहित्य के विकास के लिए समर्पित कर दिया था। भारतेंदु के साहित्यिक योगदान के कारण ही 1857 से 1900 तक के काल को भारतेंदु युग के नाम से जाना जाता है। भारतेंदु श्रेष्ठ पत्रकार भी थे। उन्होंने अठारह वर्ष की अवस्था में ‘कविवचनसुधा’ नामक पत्रिका निकाली, जिसमें उस समय के बड़े-बड़े रचनाकारों की रचनाएं छपती थीं। बीस वर्ष की उम्र में वे आॅनरेरी मजिस्ट्रेट बनाए गए और आधुनिक हिंदी साहित्य के जनक के रूप मे प्रतिष्ठित हुए। उन्होंने ‘कविवचनसुधा’ के अलावा 1873 में ‘हरिश्चंद्र मैगजीन’ और 1874 में स्त्री शिक्षा के लिए ‘बाला बोधिनी’ नामक पत्रिकाएं निकालीं। इन पत्रिकाओं के जरिए उन्होंने लोगों में देशप्रेम भरने का प्रयास किया। उनके योगदान को देखते हुए काशी के विद्वानों ने उन्हें 1880 में ‘भारतेंदु’ की उपाधि से नवाजा था।

आधुनिक हिंदी के जनक
भारतेंदु के समय में राजकाज और संभ्रांत वर्ग की भाषा फारसी थी। वहीं, अंग्रेजी का वर्चस्व भी बढ़ता जा रहा था। साहित्य में ब्रजभाषा का बोलबाला था। फारसी के प्रभाव वाली उर्दू भी चलन में आ गई थी। ऐसे समय में भारतेंदु ने लोकभाषाओं और फारसी से मुक्त उर्दू के आधार पर खड़ी बोली का विकास किया। आज की हिंदी भारतेंदु की ही देन है। यही कारण है कि उन्हें आधुनिक हिंदी का जनक माना जाता है।

रचनात्मक अवदान
भारतेंदु ने नई मीडिया जैसे रिपोर्ट, प्रकाशन, संपादक को पत्र, अनुवाद और साहित्यिक कार्यों का इस्तेमाल किया। उन्होंने अपनी पत्रिकाओं के लिए अनेक निबंध, आलोचना और रिपोर्ताज लिखे। इन विधाओं को उनके साथियों ने भी समृद्ध किया था। भारतेंदु ने देश की गरीबी, पराधीनता, शासकों के अमानवीय शोषण के बारे में खूब लिखा।
भारतेंदु ने इक्कीस काव्यग्रंथ, अड़तालीस प्रबंध काव्य और अनेक मुक्तकों की रचना की थी। वे गद्य खड़ी बोली में लिखते थे, जबकि उनकी कविताएं ब्रज भाषा में हुआ करती थीं।

सम्मान
भारत का सूचना और प्रसारण मंत्रालय पत्रकारिता एवं जनसंचार के क्षेत्र में हिन्दी भाषा में मौलिक लेखन को बढ़ावा देने के लिए भारतेंदु हरिश्चंद्र पुरस्कार प्रदान करता है। इस पुरस्कार की शुरुआत 1983 में की गई।
निधन : उन्होंने सिर्फ चौंतीस साल की उम्र में दुनिया को अलविदा कह दिया।