रमेश दवे
भारत को एक प्राचीनतावादी देश कहा जा सकता है, क्योंकि यहां पूर्वजों, पुरातन मूल्यों और पुराणों के प्रति अत्यधिक प्रेम है। इस देश के प्रत्येक शहरी-ग्रामीण नागरिक का मनोविज्ञान भी अद्भुत है- एक तो हर नागरिक किसी भी रोग की त्वरित औषधि या इलाज बता देता है, जैसे वह वैद्य, हकीम या डॉक्टर हो। दूसरा, वह किसी भी अवसर पर धर्म के नाम से, धर्मग्रंथों के नाम से, अवतार, पैगंबर के नाम से इस प्रकार उपदेश दे डालता है, जैसे धर्म उसके अनुभव का अध्यात्म हो और वह धर्म का विशेषज्ञ हो। एक तथ्य और भी रोचक है- वह आधुनिकता का कटु आलोचक है। यहां तक कि निंदक होता है, भले ही वह आधुनिकता के कई लाभ ले रहा हो। एक तथ्य यह भी है कि वह भविष्य की सारी कल्पना पंडे, पुजारी, ज्योतिष, जन्म-कुंडली, हस्तरेखा, अंक ज्योतिष, टेरो कार्ड आदि के साथ अपने अंधविश्वास के आधार पर करता है। उसे जीवन-सत्य और जीवन-संदर्भ से दूर रह कर असत्यों में, झांसों, लालचों में जीने की ऐसी आदत पड़ गई है कि वह यथार्थ पर विश्वास ही नहीं करता।
इस प्रकार के समाज को शिक्षित-दीक्षित करने के लिए जब भी कोई शिक्षा-नीति आती है, बुजुर्ग अपने जमाने की श्रेष्ठता का गुणगान करते हैं, प्रौढ़ और युवा उनके कॉलेज-स्कूल काल की कीर्ति-कथा कहते हैं, और बच्चे केवल जो सीख रहे हैं, वह कितना अच्छा, कितना खराब, कितना आनंददायी और कितना ऊबाऊ है, इस पर अपनी राय व्यक्त कर देते हैं। मतलब यह कि राय नीति के आधार पर नहीं, बल्कि अपने अच्छे-बुरे अनुभवों के आधार पर दी जाती है। नीति का समूचा विज्ञान तो अंतत: सरकारी ही होता है।
हम जिसे आधुनिक शिक्षा या शिक्षा-प्रणाली कहते हैं, उसका सूत्रपात तो अंग्रेजों ने ईस्ट इंडिया कंपनी के माध्यम से कर दिया था। उसके बाद तो स्वदेशी संस्कृत, अरबी-फारसी और अपनी भाषा में शिक्षा देने के विरुद्ध अंग्रेजी में शिक्षा का जो दौर शुरू हुआ वह आज तक थमा नहीं, बल्कि अंग्रेजी भाषा का मोह इस कदर बढ़ गया कि हर प्रकार के स्वदेशी-भाषापन से हमें नफरत होने लगी। अंग्रेजी विषय, भाषा और माध्यम की शिक्षा न केवल शहर-कस्बों में, बल्कि गांव-गांव में फैल गई और लोग समझने लगे कि अंग्रेजी ही ज्ञान की भाषा है, रोजगार की भाषा है और प्रतिष्ठा की भाषा है। इस दिशा में ईसाई मिशनरियों ने ऐसा संजाल (नेटवर्क) रच दिया कि शिक्षा उनका प्रेम का दायित्व न होकर व्यापार और ईसाईकरण का लुभावना औजार या उपकरण बन गई। जहां तक हिंदी का प्रश्न है, उसे तथाकथित बुद्धिजीवियों और धर्मांधों ने सांप्रदायिक भाषा घोषित कर दिया।
भारत में अंगे्रजों ने अपने शासन काल में कई आयोग, समितियां और नीतियां रचीं। वुड्स, हंटर, सार्जेंट से लेकर स्वतंत्र भारत में राधाकृष्णन, मुदालियर, कोठारी, चट्टोपाध्याय आयोगों और उनसे जुड़ी अनेक स्कूल और विश्वविद्यालय स्तर की समितियां बनाई गई। सबकी रिपोर्ट आई। दो सौ-चार सौ पृष्ठों की रिपोर्टों में से केवल दो-चार सिफारिशें लागू हो सकीं। इसके बाद यह लगा कि आयोग तो कारगर नहीं, इसलिए उसकी अनुशंसा के आधार पर नीति बनाई जाए। पहली नीति कोठारी आयोग के आधार पर वर्ष 1968 में बनी, मगर उसका क्रियान्वयन-पत्र यानी प्रोग्राम आॅफ एक्शन तैयार न होेने से नीति से नाता टूट गया। फिर राजीव गांधी के कार्यकाल में नरसिंह राव ने 1986 में संसद में नीति पेश करके पास कराई और बाद में प्रोग्राम आॅफ एक्शन भी जारी हुआ। सरकारें बदलने पर कभी जनार्दन समिति ने, तो कभी यशपाल समिति ने सुझाव दिए।
वर्ष 1992 में नीति और कार्य-पत्र में संशोधन हुए। नीति लागू हुई, नए प्रयोग आए, नवोदय स्कूल बने, संकुल बने, उच्च शिक्षा के संस्थान और आयोग बने और देश भर में पांच लाख स्कूल, एक लाख से अधिक कॉलेज, दो-ढाई हजार विश्वविद्यालय, सौ-पचास संस्थान अलग-अलग क्षेत्रों में निजी और सरकारी स्तर पर फैला दिए गए। यह तो नहीं कहा जा सकता कि इन उपायों से कोई लाभ नहीं हुआ, मगर संस्थायीकरण से एक तो भ्रष्टाचार फैला और दूसरे गुणवत्ता गिरी। शिक्षा में भ्रष्टाचार का इस प्रकार हर स्तर पर प्रवेश हो गया। शिक्षा का एक नया लालचवाद प्राथमिक से विश्वविद्यालयों तक छा गया। शिक्षा नीति की नैतिकता के बजाय घोटालों की घटनाएं बन गई।
भारत सरकार ने जो लगभग पांच सौ पृष्ठ का राष्ट्रीय शिक्षा नीति प्रारूप जारी किया है, वह अभूतपूर्व तो नहीं कहा जा सकता, बल्कि 1985 में जो प्रारूप जारी हुआ था उसमें वर्तमान व्यवस्था की कटु आलोचना भी थी। इस बार वैसा आलोचनात्मक प्रारूप तो नहीं है, लेकिन वर्तमान व्यवस्था में बहुत कुछ परिवर्तन के सुझाव हैं। नीति कोई भी सरकार बनाए, वह किसी दल, किसी विचारधारा या धर्म की नीति होती है। वह जन के लिए जन की शिक्षा की नीति होती है। जन की शिक्षा के सबसे बड़े माध्यम सरकारी स्कूल-कॉलेज, विश्वविद्यालय और राष्ट्रीय संस्थान होते हैं। प्रश्न इन संस्थाओं को उत्कृष्टता से जोड़ने का है। अब औपनिवेशिकता के नाम पर सरकारी संस्थाओं को कोसा नहीं जा सकता, क्योंकि सरकारी संस्थाओं को घोर उपेक्षा और गरीबी का मॉडल स्वयं सरकार ने ही बनाया है। अगर सरकारी संस्थाओं में उत्कृष्ट शिक्षक, उत्कृष्ट संसाधन, उत्कृष्ट प्रयोगशालाएं, गं्रथालय और भ्रष्टाचार रहित निगरानी पूरी ईमानदारी से कर दी जाए, तो जन का विश्वास सरकारी तंत्र पर बढ़ेगा और निजी संस्थाओं की चोंचलेबाजी और लालची व्यापारिक प्रवृत्ति से जनता भी शोषणमुक्त होगी। निजी स्कूल-कॉलेजों और निजी विश्वविद्यालयों की जो व्यावसायिक पैदावार बढ़ती जा रही है, उसे भी कानून द्वारा नियंत्रित किया जाए। माना कि नैक, नेट यूजीसी, एनसीटी और मेडिकल, इंजीनियरिंग या तकनीकी शिक्षा समितियां जांच के लिए सरकार ने बनाई हैं, मगर उनसे गुणवत्ता के बजाय भ्रष्टाचार अधिक बढ़ा है।
सरकार का कर्तव्य लोक-कल्याणकारी व्यवस्था रचना है। भारत जैसे देश में अभी यूरोप-अमेरिका के स्मार्ट नेटवर्क की उतनी जरूरत नहीं है, जितनी उपलब्ध संस्थानों को ही उत्कृष्ट या स्मार्ट बनाने की। दिल्ली सरकार ने पूरे संकल्प से जब स्कूल और अस्पताल सुधारे, तो विरोधी भी इस काम की प्रशंसा करने लगे। सरकारी उपक्रमों को जिम्मेदारी-विहीन, आलसी, बेईमान बनने से रोकना होगा। हमें अपने राजनीतिक चरित्र से ईमानदारी साबित करनी होगी। जब नीति निर्माता, नेता, शासक, प्रशासक राष्ट्रीय चरित्र का अर्थ देश के संसाधनों के प्रति ईमानदारी और जिम्मेदारी का रचेंगे, तो जनता का भी चरित्र वैसा ही बनेगा। इसलिए शिक्षा, स्वास्थ्य, सार्वजनिक सेवा से भार मुक्त होकर तो सरकार गरीबी की ही रचना करेगी और निम्न स्तर की शिक्षा और निम्न स्तर के स्वास्थ्य के राष्ट्रीय कुशलता न तो बढ़ेगी और न कायम रहेगी। इसलिए ये सरकार की राजनीतिक और आर्थिक नीतियों के मुद्दे होने चाहिए।
यह सच है कि किसी भी देश के लिए नीतियां महत्त्वपूर्ण होती हैं। नीतियों से देश की व्यवस्था यानी सरकार और जनता परिचालित, नियंत्रित और अनुशासित होती है। नीति का सर्वाधिक महत्त्वपूर्ण दस्तावेज तो संविधान होता है, फिर चाहे वह लोकतंत्र हो, एकतंत्र या तानाशाही। संविधान के अंदर से तरह-तरह की नीति संहिताएं, दंड-संहिता, साक्ष्य कानून, उपभोक्ता कानून और भी कई कानून जन्म लेते हैं, जिनके जरिए सरकार चलती है। शिक्षा में भी नीति का अर्थ यह है कि सरकारी, निजी, पब्लिक, गुरुकुल आश्रम स्कूल आदि के जरिए शैक्षिक अराजकता व्याप्त न हो। मनमानी फीस, मनमाना पाठ्यक्रम, मनमानी पाठ्य पुस्तकें और मनमाने टेस्ट और परीक्षाएं न होकर उन्हें बोर्ड द्वारा नियंत्रित किया जा सके और बोर्ड को भी सरकार नीति-निर्देश देकर उनकी स्वायत्तता निर्धारित कर सके। होेमवर्क, सतत टेस्ट और परीक्षाएं बुरी बात नहीं, क्योंकि इनसे सीखने की गति का आकलन और विश्लेषण होता है, मगर इन्हें ग्रेड या अंकों की प्रतियोगिता बनाना बच्चों और पालकों पर मनोवैज्ञानिक दबाव पैदा करता है। इसलिए ग्रेड रहित जांच जरूरी है।
अब प्रश्न है कि इतनी नीतियां, आयोग, सरकारें, बोर्ड्स आदि होने के बावजूद शिक्षा का स्तर क्यों नहीं ऊंचा हुआ, निजी स्कूलों, निजी कॉलेजों, निजी विश्वविद्यालयों, मेडिकल, इंजीनियरिंग और अन्य संस्थानों पर नीतियों का प्रभाव क्यों नहीं? शैक्षिक संस्थाएं अपराधों का अड््डा क्यों बन रही है? रैगिंग के नाम पर हिंसा और अपराध क्यों हो रहे हैं? शिक्षक अपने फर्ज के प्रति ईमानदार क्यों नहीं? क्या लोकतंत्र ने धरना, प्रदर्शन, हड़ताल, बहिष्कार आदि का अधिकार देकर कानून तोड़ने, फर्ज न निभाने और मनमानी करने की आजादी दे दी है? प्रजातंत्र को सजा-तंत्र न बनाया जाए।
शिक्षा जनता की शक्ति और विवेक की प्रतीक होती है। शिक्षा चाहे किसी भी माध्यम से दी जाए, चाहे गुरुकुल, आश्रम हों या निजी और सरकारी स्कूल-कॉलेज, जब उनका लोकव्यापी करण हो ही गया है, तो उन्हें मिटा कर नई व्यवस्था पैदा करना लगभग असंभव है। करना यह होगा कि नीति को उसी प्रकार व्यावहारिक और कठोर बनाना होगा, जिस प्रकार हाल ही परिवहन-नियम और प्लास्टिक मुक्ति, खुले में शौच से मुक्ति के लिए नियम बना कर उन्हें सख्ती से लागू किया गया है। इसके लिए शैक्षिक-प्रशासन में ईमानदार और कर्तव्यनिष्ठ अधिकारियों की जरूरत है, वरना नीतियां धराशायी होती रहेंगी और शिक्षा केवल बेरोजगार पैदा करने का माध्यम बन कर रह जाएगी, जिससे देश का नैतिक, आर्थिक, राजनीतिक और मानवीय स्तर भी ऊंचा नहीं उठ पाएगा।

