दिल्ली अग्निशमन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों का दावा है कि दुनिया के अत्याधुनिक उपकरण विभाग के पास उपलब्ध हैं, लेकिन अधिकतर मामलों में देखा गया है कि आग पर काबू पाने के लिए विभाग के कर्मचारियों को घंटो मशक्कत करनी पड़ती है। इस मामले में भी देखा गया है कि आग पर काबू पाने में दमकलकर्मियों को कई घंटे तक मशक्कत करनी पड़ी। दमकल विभाग का दावा है कि सत्तर फीट तक की ऊंचाई पर लगी आग पर काबू पाने के लिए बेड़े में उपकरण है। पर सवाल खड़ा होता है कि संकरी और तंग गलियों में आग लगने के बाद सभी इंतजाम कागजी साबित होते हैं। हालांकि, छोटे वाहनों पर लगे पंप और मोटरसाइकिल युक्त पंप होने का दावा विभाग की ओर से किया जाता है। पर आग लगने पर ये उपकरण किस प्रकार से मददगार साबित होते हैं। इस संबंध में कोई भी अधिकारी कुछ बोलने को तैयार नहीं है। कई बार देखा गया है कि ऊंची इमारत में आग लगने के बाद पड़ोसियों के घर की छत पर कूद कर लोग अपनी जान बचाते हैं, जो कम जोखिम भरा नहीं होता है।
कानून का खौफ नहीं
बार काउंसिल ऑफ दिल्ली के सचिव विष्णु शर्मा का कहना है कि आज आग के मुहाने पर दिल्ली खड़ी है। चाहे अनधिकृत कॉलोनियों हो या फिर औद्योगिक क्षेत्र, बड़े स्तर पर ऐसे कारखाने चल रहे हैं, जहां पर जान जोखिम में डाल कर मजदूर काम करते हैं। इन मजूदरों से तय समय से अधिक काम लिया जाता है। नियम-कानून को ताक पर रख कर कारखाने दिन-रात संचालित होते हैं। ऐसी घटना घटित होने पर कारखाना मालिक या फिर संचालक के खिलाफ भारतीय दंड संहिता की धारा 304 ए (लापरवाही) का मामला दर्ज होता है, जो जमानती होता है। कई बार तो मालिकों को छह-सात महीने में ही जमानत मिल जाती है। इसके साथ ही संबंधित निगरानी एजंसियां उदासीन रवैया अपनाती हैं। मालिक रिश्वत देकर धड़ल्ले से ऐसे कारखानों का संचालन दिल्ली के हर हिस्से में कर रहे हैं।
पलयान है बड़ी समस्या
दिल्ली विश्वविद्यालय के प्रोफेसर गौरव सिंह का कहना है कि जब तक पलायन नहीं रुकेगा, तब तक ऐसे हादसों में जान गंवाने वालों की संख्या बढ़ती रहेगी। बिहार, झारखंड, उत्तर प्रदेश, ओडिशा, मध्यप्रदेश, राजस्थान और आसपास के राज्यों से दिल्ली में बड़ी संख्या में मजदूर रोजगार की तलाश में आते हैं। इन मजदूरों को नौकरी देने वाले शोषण भी करते हैं और उन्हें सुविधा के नाम पर केवल रहने का स्थान मुहैया करा दिया जाता है। यही कारण है कि वे जहां काम करते हैं वहीं रात को आराम भी करते हैं। जब इस प्रकार की घटना घटित होती है तो वे मौत के मुंह में असमय समा जाते हैं।
शॉर्ट-सर्किट बता देना आसान
पीड़ित परिजनों का आरोप है कि आग की हर घटना के बाद हर बार संबंधित एजंसियों जो शुरुआती कारण बताती हैं। अपने आप में चौंकाने वाला होता है। हर बार दावा किया जाता है कि आग शॉट-सर्किट की वजह से लगी होगी। संबंधित एजंसियां अपनी नाकामियों को छुपाने के लिए यह रटा-रटाया जवाब देकर अपना पल्ला झाड लेती हैं। मोहम्मद साकिर के भाई मोहम्मद जाकिर का आरोप है कि आखिर हर घटना के पीछे शॉट-सर्किट कारण ही क्यों बता दिया जाता है। अगर यह सही कारण है तो वे उपाय क्यों नहीं किए जा रहे, जिससे इससे निजात पाई जा सके।
जान की कीमत मुआवजा नहीं
उपहार सिनेमा अग्निकांड में अपने शादीशुदा तीन छोटे भाइयों को गंवाने वाले छतरपुर के राजेंद्र तंवर कहते हैं कि अनाज मंडी में तैंतालीस निर्दोष लोगों की मौत ने उनके सालों पुराने जख्म को भरने से बदले ताजा कर दिया है। उपहार कांड में सामूहिक लड़ाई लड़ी गई और सामूहिक मुआवजा भी मिला, लेकिन जान की कीमत मुआवजे से नहीं तौली जा सकती। इस बार भी मृतक के रिश्तदारों को मुआवजे का एलान दिल्ली सरकार, बिहार सरकार, केंद्र सरकार और दिल्ली भाजपा की ओर से किया गया है। पर सवाल है कि किसी अन्य की लापरवाही से अपनों को खोने वाले मुआवजे की राशि लेकर अपने दुख-दर्द को कैसे भूलेंगे।

