देवशंकर नवीन
भारत की अपनी उत्पादन-क्षमता जैसी भी हो, पर वैश्विक संचार-व्यवस्था के कारण भारतीय बाजार में उत्पाद का कोई अभाव नहीं दिखता। यहां हर कुछ उपलब्ध है। जगजाहिर है कि किसी देश का बाजार उन्नत उत्पादन-क्षमता और मजबूत क्रय-शक्ति से समृद्ध होता है। उत्पादन-क्षमता का रिश्ता कौशल और संसाधन से है, जबकि क्रय-शक्ति का रिश्ता रोजगार और उपार्जन से। उपार्जन का तो पता नहीं, पर विज्ञापनों की चकाचौंध देख कर सामान्य अर्थशास्त्रीय ज्ञान रखने वाला व्यक्ति भी मान बैठा है कि इस वक्त उन्नत व्यावसायिकता के लिए भारत एक बेहतरीन बाजार है। क्रय-शक्ति बढ़ाने के स्रोत की शिक्षा का कोई उद्यम बेशक न दिखे, पर गाहे-बगाहे हमें प्रतीत कराया जाता है कि हम विकास के युग में जी रहे हैं। हम तेजी से विकास कर रहे हैं।
मनुष्य कितना भी तर्कजीवी हो जाए, अपनी बौद्धिक क्षमता पर उसे कितना भी भरोसा हो जाए, पर तथ्यत: हम इस समय कठपुतली का जीवन जीने को विवश हैं। कोई मदारी है, जो हमें नचा रहा है। हमारा जीवन अपने वश में नहीं है। सबहिं नचावत राम गोसार्इं/ नाचत नर मर्कट की नार्इं। यह नाच बाजार में हो रहा है। बाजार स्वयं अपने समय के बौद्धिकों पर आश्रित रहता है। पर तथ्यत: उन्हें अपने पराश्रय से उबरने का कौशल मालूम है। वे जिन पर आश्रित होते हैं, उन्हें खरीद लेते हैं। उनके इस कौशल का ही परिणाम है कि आज का मनुष्य हर पल बाजार में जीता है। समाज-व्यवस्था और टीवी चैनलों के हर आचरण से ऐसा स्पष्ट है। घर बैठा, भोजन करता, टीवी देखता मनुष्य अचानक मन ही मन बाजार पहुंच जाता है। नियति उसे अन्य कुछ सोचने की मोहलत नहीं देती। विज्ञापनों द्वारा उन्हें संतान और अपने स्वास्थ्य के प्रति इतना आतंकित कर दिया जाता है; जीवन-मूल्य, राष्ट्र-मूल्य, संबंध-मूल्य की संवेदना जगा कर उन्हें इतना विह्वल कर दिया जाता है कि वह चाह कर भी घर में बैठ नहीं पाता। जेब अनुमति दे चाहे न दे, बेशक कर्ज ले, पर बाजार जाकर बलि का बकरा जरूर बन जाता है।
हर बाजार का प्राथमिक लक्ष्य क्रेता को सम्मोहित करना होता है। इस सम्मोहन के लिए भाषा अनिवार्य है। इसलिए जादुई सम्मोहन से भरी भाषा में उपभोक्ता तक पहुंचने की तरकीब व्यवसायियों ने भली-भांति अपना ली है। क्रेता की स्थानीयता के मद्देनजर वैश्विक बाजार में अपने उत्पाद बेचने के लिए स्थानीय भाषाओं का सहारा लेना अनिवार्य हो गया है। व्यवसायियों की पारखी नजर जनता का मन टटोलती रहती है। उन्हें मालूम है कि जनता दूरदर्शन के चैनल देखे, उपभोक्ता-सेवा केंद्र से बात करे, अखबार में विज्ञापन देखे, पंपलेट पढ़े, आॅनलाइन खरीद करे… उसे अपनी भाषा सम्मोहित करेगी। इसलिए वैश्विक बाजार की बहुभाषिकता के मद्देनजर सारे के सारे व्यवसायी अनुवाद की डगर पर चल पड़े हैं। अनुवाद का बाजार इन दिनों वाकई गरम है।
अनुवाद का फैलाव अब जितनी दिशाओं में हो चुका है, उनमें यह समझना श्रेयस्कर होगा कि यह एक विशेष कौशल है। दो भाषाओं का ज्ञान रखने वाला हर व्यक्ति हर विषय के पाठ का अनुवाद नहीं कर सकता। मुक्त रूप से काम करने वाले अधिकांश अनुवादक सोचते हैं कि अनुवाद के लिए दो भाषाओं की जानकारी मात्र पर्याप्त है; पर ऐसी समझ अनुवादकीय शिष्टाचार की अधूरी समझ है। बेहतरीन अनुवाद के लिए स्रोत और लक्ष्य-दोनों भाषाओं की गहन समझ के साथ-साथ दोनों पाठों के भाषिक जनपद की संस्कृति और पाठ के विषय की गहन समझ आवश्यक है। व्यवसाय की गहन समझ जिन्हें नहीं है, वे साहित्य या तकनीकी या अन्य विषयों के पाठ के कितने भी सुदक्ष अनुवादक हों, उनका काम जोखिम भरा रहेगा ही। व्यवसाय और विज्ञापन की दुनिया के बड़े-बड़े कर्मियों की राय में भी सामान्य अनुवाद और व्यावसायिक अनुवाद में बड़ा फर्क है। जन-संपर्क, व्यापार के क्षेत्र की बुनियादी विशेषज्ञता हासिल किए बिना व्यावसायिक अनुवाद के क्षेत्र में कूद पड़ना घातक है।
हर व्यवसाय की विपणन पद्धति भिन्न होती है। विज्ञापन की सूक्ष्म समझ रखने वाले लोग जानते होंगे कि पुस्तक, दाल-चावल-आटा, घी-तेल-मसाला, शृंगारिक सामग्री, सरकारी योजना और धार्मिक घोषणाओं के विज्ञापनों की भाषा अलग-अलग होगी। जाहिर है कि इनके अनुवाद की विधियां भी भिन्न-भिन्न होंगी। उत्पादन-गृह (प्रोडक्शन-हाउस) की व्यावसायिक नीतियों को समझे बिना इन क्षेत्र-विशेष के पाठ का अनुवाद चुनौतीपूर्ण होगा। फेसबुक, वाट्स-ऐप, ट्विटर पर भ्रष्ट अनुवाद के उदाहरण अक्सर देखे जाते हैं। जरूरतमंद, कौशलविहीन भ्रष्ट अनुवादक धन-लोलुपता के चलते अक्सर अज्ञात क्षेत्रों के पाठ का अनुवाद कर डालते हैं। उत्पादक भी अक्सर न्यूनतम अनुवाद-शुल्क से काम चलाने के चक्कर में ऐसे अनुवादकों से काम करा लेते हैं। इससे उत्पादकों का व्यवसाय तो आहत होता ही है, अनुवाद-व्यवसाय भी संदेहास्पद होता है। इससे बचने की जरूरत है।
विज्ञापन, प्रेस विज्ञप्ति, बिक्री व्याख्यान, व्यावसायिक प्रचार की सामग्री के अनुवाद की अलग सावधानियां होती हैं। इन पाठों की सैद्धांतिकी और प्रासंगिक ज्ञान में विशेषज्ञता हासिल कर कोई अनुवादक निश्चय ही व्यावसायिक रूप से सक्षम बन सकता है। आखिरकार अनुवाद-कर्म भी एक व्यवसाय है, जिसमें किसी अनुवादक की विशेषज्ञता और बेहतर सेवा के बदले उनके ग्राहक उन्हें बेहतर भुगतान देते हैं। व्यापार संबंधी पाठ के अनुवाद के लिए अनुवादकों का रचनात्मक होना अनिवार्य है। स्थानीय भाषा में अनूदित प्रचार सामग्री पढ़ कर लक्षित उपभोक्ता जब तक मसूस न करे कि वह बात उसकी भाषा में कही गई है, अनुवाद निरर्थक है। इसलिए व्यावसायिक पाठ के अनुवाद के लिए दक्ष अनुवादकों की आवश्यकता होती है।
व्यापार, सूचना-तंत्र एवं जनसंपर्क का क्षेत्र जितनी तेजी से आगे बढ़ रहा है, इन क्षेत्रों में अनुवाद की गुंजाइश भी बढ़ती जा रही है। इस क्षेत्रों में विपुल सामग्री है, जिनका अनुवाद जरूरी है। दुनिया भर की उत्पादक कंपनियां अपने दस्तावेजों का अनुवाद स्थानीय भाषाओं में करवा कर वैश्विक बाजार में फैलना चाहती हैं। व्यावसायिक प्रतिस्पर्द्धा की होड़ में सभी कंपनियों को जन-जन तक पहुंचने की जल्दी है। जल्दी नहीं पहुंचेंगे तो उनका उत्पाद बासी हो जाएगा। उन्हें रोज-रोज अपने मुखपत्र, प्रेस विज्ञप्ति बाजार में पहुंचाने होते हैं। नए-नए ब्रांडों के विस्तार और अपनी व्यावसायिक नीति से क्रेता-समूह को सम्मोहित करना होता है। क्षेत्रीय भाषाओं में प्रचार-सामग्री उपलब्ध करवा कर लक्षित बाजार में वर्चस्व बनाना होता है। इसके साथ-साथ मुहिम ऐसी भी हो कि वातावरण अनुकूलित रहे, कोई ऊब न आए, क्योंकि यह प्रक्रिया निरंतर बनी रहेगी, कभी रुकेगी नहीं। ऐसे में अनुवादकों के दायित्व को तौलना तो सहज है।
विक्रेता को हर हाल में क्रेता की भाषा बोलनी पड़ेगी- यह व्यवसाय का निर्णायक दर्शन है। विगत कुछ दशकों में दुनिया भर के छोटे-बड़े व्यवसायी यह निष्कर्ष निकाल चुके हैं कि अनुवाद उनकी व्यावसायिक रणनीति का अभिन्न हिस्सा है। वैश्विक सूचना से आक्रांत बाजार के तंत्रजाल से हम भली-भांति परिचित हैं। पूरी दुनिया हमेशा हमारे सामने होती है। भौतिक दूरियों से अब हम आतंकित नहीं होते। ई-कॉमर्स हमारी दिनचर्या को प्रभावित और कुछ हद तक निर्देशित करने लगा है। आॅनलाइन मार्केटिंग हमारे जीवन में प्रविष्ट है। पर ऐसे ग्राहकों की अब भी कमी नहीं है, जो अपनी बोली के अलावा कोई दूसरी भाषा नहीं जानते, इसीलिए हर लघु और मध्यम फलक के व्यवसायी अपनी वेबसाइट पर स्थानीय बाजारों की क्षेत्रीय भाषाओं की ओर उन्मुख हैं। सर्वेक्षण से तथ्य सामने आ चुका है कि क्रेता को किसी उत्पाद की सारी जानकारी जहां उपलब्ध होगी, वह वहीं से सामान खरीदेगा। व्यवसायी सुनिश्चित कर चुके हैं कि ग्राहकों का भाषा संस्कार बदलने की प्रतीक्षा करते हुए समय नष्ट करने और अपने व्यवसाय को नुकसान पहुंचाने के बजाय हमें ग्राहकों को उनकी भाषा में रिझाना चाहिए। वैश्विक बाजार में लक्षित ग्राहकों तक पहुंचने के लिए प्रचार सामग्री के अनुवाद से अधिक तेज और कुशल तरीका व्यवसायियों को कोई नहीं दिखता।
व्यावसायिक प्रचार सामग्री को स्थानीय बनाने से निस्संदेह उत्पाद की पहुंच उपभोक्ता तक होती है; इसके साथ-साथ यह भी सुनिश्चित होता है कि क्रेता तक सर्वाधिक पहुंच बनाने में कौन-सी भाषा सर्वाधिक सहायक होगी। आमतौर पर सीमांत क्षेत्र के के्रता की भाषा छोटी-छोटी कंपनियों के लिए लाभप्रद होती है, पर लक्षित बाजार के लिए मुद्रण और वितरण की लागत का ध्यान भी उन्हें रखना होता है। नए बाजार में आते ही नए ग्राहक अपनी स्थानीय भाषा में ग्राहक-सेवा सामग्री की अपेक्षा करने लगते हैं। शुरू-शुरू में यह कंपनी के बजट को प्रभावित अवश्य करता है, पर शीघ्र ही उसकी लाभप्रद परिणति सामने लगती है। ऐसा तभी लाभप्रद होगा, जब प्रभावी अनूदित पाठ बाजार में रहेगा।

