जितेंद्र श्रीवास्तव
उर्दू काव्य संसार में पंडित हरिचंद अख्तर को वह शोहरत नहीं मिली, जिसके वे हकदार थे। अदब की दुनिया में यह कोई आश्चर्यजनक घटना नहीं है। हर कालखंड में कुछ लोग अलक्षित रह जाते हैं। हरिचंद अख्तर गहरे आलोचनात्मक विवेक के कवि हैं। उनकी समूची शायरी में एक ‘क्रिटिकल एप्रोच’ दिखाई देता है। कह सकते हैं कि वे निरी भावुकता के कवि नहीं हैं। उनके यहां व्यंग्य से भरी बौद्धिकता है। यही कारण है कि उनकी शायरी को महज हास्य की शायरी नहीं कह सकते। उनका एक शेर देखें-
मिलेगी शैख को जन्नत, हमें दोजख अता होगा
बस इतनी बात है जिसके लिए महशर बपा होगा।
और-
तिरी दुनिया में सब्र ओ शुक्र से हमने बसर कर ली
तिरी दुनिया से बढ़कर भी तिरे दोजख में क्या होगा।
बेहद हल्के-फुल्के अंदाज में कही गई इन पंक्तियों में इंकलाबी चेतना है। नहीं भूलना चाहिए कि इंकलाब का मतलब सिर्फ लाल झंडा उठाना नहीं होता। दिमागी जहालत का सांस्कृतिक इलाज भी इंकलाब है।
पंडित हरिचंद अख्तर की शायरी की एक विशेषता यह भी है कि वे प्रेम को परंपरागत नजरिए से नहीं देखते हैं। उनकी कविता में प्रेम में ईश्वर हो जाने की स्थिति का जिक्र है। इसे ही वे मुहब्बत का मेयार मानते हैं। और सबसे सुंदर बात तो यह है कि अगर प्रेम में ईश्वर हो जाने की स्थिति आ ही जाए तो ईश्वर इससे नाराज नहीं होता।
शबाब आया किसी बुत पर फिदा होने का वक्त आया
मिरी दुनिया में बंदे के खुदा होने का वक्त आया।
सामान्यतया सुनिए तो लगेगा कि हंसने-हंसाने की बात है, लेकिन इसकी दार्शनिक गहराई में उतरें तो पता लगेगा कि कोई भी प्रेम ईश्वर की सृष्टि के समानांतर अपनी सृष्टि का सृजन करता है। अपना विश्व बनाता है और इस विश्व के विधाता प्रेम में विन्यस्त दोनों ही होते हैं, कोई एक नहीं। स्वतंत्र प्रेम पितृसत्ता का विलोम रचता है, जबकि सामाजिक ढांचे में आरोपित प्रेम पितृसत्ता का पोषण करता है। कवि मानस की स्वतंत्रता के सर्जक होते हैं, इसलिए वे प्रेम की स्वतंत्रता के पक्षधर होते हैं। हरिचंद अख्तर की शायरी भी यही करती है। यह शायर खुदा को अस्वीकार नहीं करता, लेकिन प्रेम के स्वतंत्र विश्व की हिमायत करता है। यहीं यह याद रखना भी उचित होगा कि पंडित हरिचंद अख्तर नास्तिक नहीं हैं, लेकिन आस्तिकता को लेकर आलोचनात्मक हैं। वे स्वर्ग-नरक की पूरी परिकल्पना को प्रश्नांकित करते हैं।
उनका एक शेर ऐसा है, जो सहचर बन गया है-
हमें भी आ पड़ा है दोस्तों से कुछ काम यानी
हमारे दोस्तों के बे-वफा होने का वक्त आया।
इस नश्वर संसार की सच्चाई को इससे अधिक सुंदर ढंग से नहीं कहा जा सकता है। यह शेर कलेजे में धक से लगता है। उनकी एक गजल ऐसी है, जो किसी के भी कंठ में बस जाएगी।
कलियों का तबस्सुम हो, कि तुम हो कि सबा हो
इस रात के सन्नाटे में, कोई तो सदा हो।
ये रंग, ये अंदाज-ए-नवाजिश तो वही है
शायद कि कहीं पहले भी तू मुझसे मिला है।
यूं तेरी निगाहों में असर ढूंढ़ रहा हूं
जैसे कि तुझे दिल के धड़कने का पता हो।
इस गजल में आगे एक पंक्ति आती है-
तुम बामे फलक से कभी उतरो तो पता हो।
अब इस मिसरे को चाहें तो सनम से किए गए निवेदन की तरह देखिए और चाहें तो शोषक और शोषित के बीच अंतर को समझने और समझाने के लिए आह्वान की तरह देखिए। अच्छी कविता सदा अर्थ के लिए अवकाश का सृजन करती है।
अगर पंडित हरिचंद अख्तर को कोई ठीक से समझ ले तो उसके लिए इश्क की राह थोड़ी आसान हो जाएगी। उनके इस शेर को सुनते हुए मिर्जा गालिब याद आते हैं-
बज्म-ए-दुश्मन है खुदा के लिए आराम से बैठ
बार-बार ऐ दिल-ए-नादां तुझे क्या होता है।
मिरी सूरत मिरी हालत मिरी रंगत देखी
आपने देख लिया इश्क में क्या होता है।
पंडित जी अपने एक शेर में अपनी महबूबा से मुखातिब हैं, लेकिन क्या गजब कि यह शेर हमारे दौर के हुक्मरानों पर लागू होता है-
हम जो कहते हैं हमेशा ही गलत कहते हैं
आपका हुक्म दुरुस्त और बजा होता है।
उनकी शायरी की एक विशेषता यह भी है कि कई बार जब वे कोई नई बात नहीं भी कहते हैं तब भी उनके कहने का अंदाज बिल्कुल नया होता है और अंदाज का यही नयापन ऐसे अशआर को महत्त्वपूर्ण बना देता है। एक शेर-
दूर तो हट जाऊं लेकिन फिक्र-ए-मोहब्बत ने मारा
बेहद नाजुक रिश्ता है टूट न जाए डरता हूं।
किसी भी श्रेष्ठ कवि की तरह हरिचंद अख्तर भी उम्मीद के कवि हैं। उनकी शायरी में उम्मीदों के चिराग रौशन हैं। वे सिर्फ विध्वंस की बात नहीं करते, उनकी शायरी में निर्माण की गहरी आकांक्षा है। मसलन-
उम्मीदों से दिल-ए-बर्बाद को आबाद करता हूं
मिटाने के लिए दुनिया नई ईजाद करता हूं।
उनकी शायरी में युवाओं के लिए बहुत कुछ है। बानगी के लिए चंद अशआर-
सैर-ए-दुनिया से गरज थी महव-ए-दुनिया कर दिया
मैंने क्या चाहा मिरे अल्लाह ने क्या कर दिया।
हां इसी कम-बख्त दिल ने कर दिया इफशा-ए-राज
हां इसी कम-बख्त दिल ने मुझको रुसवा किया।
हुस्न ने पहले तो सब मुझ पर हकीकत खोल दी
और फिर खामोश रहने का इशारा कर दिया।
कोई चाहे तो इन अशआर को निर्गुण की तरह पढ़ सकता है। प्रेम और अध्यात्म में बहुत बारीक-सा फर्क है। सूफियों ने तो प्रेम को ही अध्यात्म का मार्ग माना था। वैसे भी, प्रेम की पराकाष्ठा अध्यात्म के एकांत का सृजन करती है। पंडित जी का यह शेर भी युवाओं के दिल के बेहद करीब जाने लायक है-
मिली थी आंख और आहा-ओ-फुगां तक बात आ पहुंची
जरा सी बात थी लेकिन यहां तक आ पहुंची।
पंडित हरिचंद अख्तर की शायरी सचेत करने वाली है। वे आलोचनात्मक विवेक के कवि हैं। कोई चेतस शायर ही कह सकता है कि-
भरोसा किस कदर है तुझको अख्तर उसकी रहमत पर
अगर वो शैख साहिब का खुदा निकला तो क्या होगा।
उन्होंने धर्म के ठेकेदारों की खूब खबर ली है।
शैख और पंडित धर्म और इस्लाम की बातें करें
कुछ खुदा के कहर कुछ इस्लाम की बातें करें।
हम खड़े सुनते रहें और दिल में ये कहते रहें
अब ये रुखसत हों तो हम कुछ काम की बातें करें।
वैसे अपनी मूल चेतना में पंडित हरिचंद अख्तर प्रेम के शायर हैं। उनका कहने का ढंग नया है। उनकी शायरी में संवाद का गुण है। वह अपने पढ़ने और सुनने वालों से बोलती-बतियाती है। आप उसे पढ़ेंगे तो महसूस होगा जैसे कोई आपसे गुफ्तगू कर रहा है। कोई दोस्त जो आहिस्ता से अभी आपके कंधे पर हाथ रख देगा। किसी शायर की कविताएं अपने पढ़ने और सुनने वालों की दोस्त बन जाएं, इससे बड़ी उपलब्धि किसी शायर के लिए कुछ भी नहीं। तुम जब पास होते हो गोया दूसरा नहीं होता- यह एकात्म ही किसी शायर की दिली ख्वाहिश होती है। उनकी ओर से उनके उस्ताद हफीज जालंधरी का शेर याद आता है-
मोहब्बत करने वाले कम न होंगे
तिरी महफिल में लेकिन हम न होंगे।

