कविता भाटिया
हिंदी कविता के आरंभ से ही स्त्री अपनी वेदना, घुटन, प्रेम और अन्य अभिव्यक्तियों को स्वर देती रही है। वह निजी से लेकर पारिवारिक, सामाजिक, राष्ट्रीय चिंताओं को भी अपनी कविता का विषय बनाती रही है। कविता के प्रारंभिक काल में उसने अपनी रचनाओं के जरिए अपने समाज की रूढ़ियों, परंपराओं और चुनौतियों के बीच अपनी चुप्पी को तोड़ अपनी स्वायत्त पहचान बनाते हुए अपनी मुक्ति की आकांक्षा को स्वर दिया। समाज के बने-बनाए जड़ चौखट को तोड़ कर उसने अपनी नई भूमिका स्थापित की। उन आरंभिक स्त्री आत्माभिव्यक्तियों में उसके व्यक्तिगत जीवन के कुछ ऐसे सूत्र हैं, जिनसे आगे चल कर स्त्री विमर्श सैद्धांतिकी की आधारभूमि तैयार हुई। यह सच है कि स्वतंत्रता और समानता मनुष्य की चेतना का अंग है, तो स्त्री को भी बहुत दिनों तक दबाया नहीं जा सकता- मध्ययुगीन स्त्री साहित्य इसका स्पष्ट प्रमाण रहा है।
एंजिल्स की पुस्तक ‘द ओरिजन आॅफ फैमिली प्राइवेट प्रापर्टी’ के अनुसार सृष्टि के प्रारंभ से ही पुरुष सत्ता स्त्री की चेतना और उसकी गति को बाधित करती रही है। यही नहीं, न्याय, धर्म और समाज जैसी संस्थाएं भी पुरुष के ही निजी हितों की रक्षा करती है और स्त्री को कमजोर तथा हीन साबित करती है। मध्यकाल में मीरा का विद्रोही रूप आत्मसंघर्ष से पूरित नारी का स्वरूप है, तो आधुनिक काल में छायावादी कवयित्री महादेवी वर्मा की ‘पंथ रहने दो अपरिचित, प्राण रहने दो अकेला’ जैसी पंक्तियों में नारी स्वाभिमान, ‘तोड़ दो यह क्षितिज मैं भी देख लूं उस ओर क्या है’ में विद्रोह और मुक्ति की आकांक्षा तथा ‘भिक्षुक से फिर जाओगे जब लेकर अपना यह धन/ करुणामय तब समझोगे इन प्राणों का महंगापन’ में नवजागृत नारी का अहं स्पष्ट दिखाई देता है। सच यह है कि मनुष्य के रूप में उसकी स्वीकृति की उसकी मांग अब तक पूरी नहीं हो पाई है।
स्त्री रचनाकारों ने अपनी कविताओं के माध्यम से न केवल स्त्री की दशा का चित्रण किया, बल्कि उनमें उभरी अस्मिता, स्वतंत्रता और जागरूकता की चेतना को भी व्यक्त किया है। हिंदी साहित्य के आरंभिक काल में पुरुषवादी वर्चस्व के कारण स्त्री लेखन कभी मुख्यधारा में नहीं रहा। सच है, जिस समाज में पुरुषों के गृहत्याग या गमन प्रसंग को सराहा जाता हो- ‘नर यति कहा कर चल निकले/ नारी निकले तो असती है।’ (विष्णुप्रिया- मैथिलीशरण गुप्त) उसी समाज में मीरा पग घुंघरू बांध, साधु-संतों के बीच लोकलाज खोकर अपने ‘असती’ होने को सिक्त करती हैं।
बदलते समय के साथ-साथ स्त्री लेखकों ने अपनी रचनाओं में मनुष्य विरोधी स्थितियों, भीतरी अंतर्द्वंद्वों और अपनी छटपटाहट को बखूबी व्यक्त किया है। उन्होंने स्त्री को दमित बनाए रखने वाले जिम्मेदार कारकों की पड़ताल कर अपने असंतोष और आक्रोश- दोनों को उजागर किया। उनकी कविता का मूल भाव अपने बैचेन मन के प्रश्नों का समाधान ढ़ूंढ़ने की छटपटाहट तथा आवश्यक जागरूकता उत्पन्न करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
समकालीन स्त्री कविता में स्त्री पुरुष से अलग न पहचाने जाने की विडंबना की शिकार तो है ही, पुरुष उत्पीड़न और आतंक से सहमी हुई त्रस्त भी है। ऐसे में उसकी मुक्तिकामी चेतना अपने स्वत्व की पहचान में तड़पती है। युवा कवयित्री यथार्थ और जीवन के सहज अनुभवों को अपनी कविता का विषय बनाती है। पितृसत्ता के अंतर्विरोधों और विसंगतियों के प्रति विद्रोहात्मक प्रतिक्रिया का स्वर उसकी कविता में स्पष्ट सुना जा सकता है। आज की स्त्री बंनी-बनाई सीमा को तोड़ कर अनंत विस्तार और गहराई लिए समंदर छूने की आकांक्षी है।
हमारे समाज में लड़की का विवाह आज भी एक जटिल समस्या है। वर पक्ष की मांगों, दहेज की पूर्ति करने में तीन बेटियों के पिता की लाचारगी और उस बेटी की मन:स्थिति को ज्योति चावला की कविता ‘फिर भाग गई लड़की’ में स्पष्ट देखा जा सकता है। घर की चैहद्दी में कैद, अपने को मिटाते हुए ‘घर’ को रचने में व्यस्त होने की काबिलियत ही स्त्री को ‘अच्छी पत्नियां’ होना साबित करता है। जहां उनकी अपनी स्वतंत्र चाह और इच्छाओं का कोई मोल नहीं, उनके लिए स्वतंत्रता का अर्थ झरोखे की सलाखों से झांकता बित्ता भर आसमान है।
‘आह भर आसमां का छोटा-सा टुकड़ा/ नहीं कल्पना करती थी उड़ने की…/ आंगन की देहरी तक था उनका दायरा।’ (अनिता भारती)
सच है कि प्रेम में समर्पण, त्याग, उदारता, स्नेह, करुणा और दया जैसी अनेक कोमल भावनाएं समाहित है, पर जब दो युवा भाषा, जाति, वर्ण और धर्म की छद्म दीवारें तोड़ कर आपस में प्रेम करते हैं, तो खाप पंचायतों के रूप में पुरुष समाज की अहमन्यता और उनकी रूढ़िवादिता पर चोट लगती है, और फिर शुरू होता है उनके प्रतिरोध का तांडव। प्रेमी जनों को अमानवीय और हिंसक यातनाएं देकर उनके प्रेम का अंत कर दिया जाता है। शैलजा पाठक की ‘निर्णायक’ कविता में प्रेम के विरुद्ध खड़ी सफेद पगड़ियां पहने निर्णायकों, इज्जतदार भीड़ और प्रेमी युगल के अमानवीय हश्र का वर्णन है।
युवा कवयित्रियों ने केवल पितृसत्ता के दबाव में दबती स्त्री के दुखों और कष्टों का वर्णन नहीं किया, बल्कि उनका युवा मन उनकी उस संघर्ष चेतना पर भी विचार करता है, जो नई आशाओं और संभावनाओं को भी जन्म दे रही है। इसी संदर्भ में उन्होंने उन युवा स्त्रियों को भी अपनी कविता का विषय बनाया है, जिन्होंने समाज में अपनी विद्रोही भूमिका से अपनी अस्मिता और अस्तित्व को नए ढंग से रेखांकित किया। कवयित्री अनिता भारती पाकिस्तान की स्वात घाटी में लड़कियों की शिक्षा के लिए संघर्षरत मलाला युसूफजई और वहां की बेटियों के सुंदर भविष्य पर आततायियों की गिद्ध दृष्टि पर चिंता व्यक्त करती है। मणिपुर की मानवाधिकार कार्यकर्ता इरोम शर्मिला- जो पूर्वोत्तर राज्यों में सशस्त्र बल शक्तियां अधिनियम 1958 को हटाने के लिए लगभग सोलह वर्षों तक भूख हड़ताल पर रही, उनके संघर्ष को चित्रित करती विपिन चौधरी की कविता ‘रोशनी की लकीर’ युवा कविता के इतिहास में अपनी एक अलग पहचान दर्ज करती है।
इधर हाल की चर्चित कविताओं में भारत भूषण अग्रवाल से सम्मानित शुभम श्री की ‘पोएट्री मैनजमेंट’ कविता की जड़ता को तोड़ते हुए अपने नए ढंग और तेवर के लिए आलोचकों और काव्यप्रेमियों के बीच काफी विवादास्पद रही। यह रचना कविता के प्रचलित शिल्प में तोड़-फोड़ करती है। अगर ‘युवा स्त्री मन’ की बात करें तो, एकाएक ध्यान विमला मेहरा और वर्तिका नंदा द्वारा संपादित ‘तिनका तिनका तिहाड़’ की ओर जाता है। इसमें तिहाड़ बंदीगृह की महिला कैदियों की कविताएं है, जो उन्होंने सीखचों के पीछे रह कर लिखी हैं। ये कविताएं बताती हैं उनका जिस्म कैद है, मन नहीं। ये स्त्रियां कवयित्री कतई नहीं हैं और न ही उनकी कविताएं कविताओं के इतिहास में कभी शुमार होंगी, पर उनके शब्द आंसुओं और सपनों से भीगे हैं। उनमें जिंदगी से जुड़ी तस्वीरें हैं, उम्मीद है और भविष्य की बेहतरी का सपना भी।
इस तरह समकालीन कवयित्रियों का ‘युवा स्त्री मन’ स्त्री के तनावों, दुखों, यातना और इन सबके बीच उसकी अदम्य जिजीविषा और भीड़ में अपनी अलग पहचान बनाने की इच्छा लिए हुए विपरीत परिस्थितियों से निरंतर संघर्ष करने की शक्ति को मुख्य स्वर दे रहा है। वह नारेबाजी, बड़बोलेपन और दुरूहता से दूर गहरी मानवीय संवेदना से लबरेज तथा सहजता से युक्त है। इनकी कविता यात्रा जीवन के प्रति अटूट आस्था लिए, सहानुभूति और मानवीय भागीदारी का समर्थन करती हैं।
