मां का सुबह फोन आया, ‘देखो बेटा, आज धन तेरस है, आज भी शाम को रोशनी कर लेना। और देखो मिट्टी के दीये जरूर जलाना।’ बड़ी दीदी के बेटा हुआ है। दशहरे के अगले दिन खबर आई और मां को अचानक अमेरिका जाना पड़ा। घर पर पीछे रह गए थे कन्हैया, दुलारी और उनके पापा। अब पापा को तो अपने कामकाज से फुरसत नहीं मिल पाती। दीवाली के पहले तो जैसे सारी दुनिया का काम उनके सिर हो! देर रात आते- अल्ल सुबह हाथ में सेंडविच चबाते हुए कार की ओर भागते।
रास्ते से सेलफोन पर बात करते, ‘दुलारी, देखो घर पर वह सभी कुछ करना जो तुम्हारी मां करती रही हैं। साफ-सफाई, परदे बदल लेना… और हां, काम वाली, चैकीदार, ड्राइवर के लिए कपड़े वगैरह खरीद लेना… अच्छा फिर बात करता हूं… लाईन पर और कोई है।…’
इधर मां से आधी-अधूरी बात हुई और दुलारी के मन में सवाल घर कर गया, ‘ये मां मिट््टी के दीये के लिए क्यों कह रही थीं?’
‘अरे छोड़ यार, हम ऐसी रोशनी करेंगे कि मां भी देखती रह जाएंगी, कंप्यूटर पर लाइव दिखाएंगे। मां… ये हमारे जमाने की दीवाली है, कहां लुप-लुप करते दीये…।’ कन्हैया ने मां की बात को मजाक में उड़ा दिया।
फिर भाई-बहन ने नाश्ता किया और दोनों बाजार निकल गए।
‘उफ्फ! ये बाजार को क्या हो गया है? सड़क तो जैसे गायब ही हो गई?’ फुटपाथ के नीचे तक लग गर्इं दुकानों और भारी भीड़ को देख कर दुलारी बोली।
यह बात फुटपाथ पर मिट्टी के खिलौने बेचने वाले ने सुन ली, ‘बेटा इस त्योहर से सबको उम्मीदें होती हैं। आपका घर रोशन होगा तो रोशनी हम तक भी पहुंचेगी।’ भीड़ के शोर में भाई-बहनों के कान तक बात आई और चली गई। चमकीले बंदनवार खरीदे गए, मोमबत्ती के बने रंगबिरंगे दीये, रंग बदलने वाली बिजली के बल्बों की ढेर सारी लड़ियां। खील-बताशे, चांदी के लक्ष्मी-गणेश, कपड़े।… लो चार बज गए। भूखे-प्यासे भाई-बहन घर की ओर भागे। काम वाली आंटी ने कुछ तो बना कर रखा होगा!
लगता है, आज सूरज पश्चिम में निकला था! पापा घर पर बैठे हुए थे। दोनों के मुंह से निकल गया, ‘ये क्या? कमाल हो गया!’ पापा समझ गए थे कि बच्चे क्या कहना चाहते हैं। वे मंद-मंद मुस्कुराए और अपने हाथ का एक कागज का पैकेटे खालने लगे।
‘क्या लाए हो पापा?’ कन्हैया ने पूछा।
पापा केवल मुस्कुराए। पैकेट खोला, उसके मुंह से जो झांक रहा था, उसे देख दोनों बच्चों के मुंह पर मुस्कान दौड़ गई। पापा के हाथ का पैकेट दुलारी ने लिया और रसोईघर की ऊपरी अलमारी पर खिसका दिया।
तभी दरवाजे पर घंटी बजी, बिजली वाला आया था। दोनों बच्चे उसके साथ लग गए और पूरे घर को लाल, पीली बत्तियों से सजा दिया। अंधेरा घिर आया था। बटन दबाया तो घर की खूबसूरती देख कर दोनों की थकान कहीं गायब हो गई। नए बरतन के साथ पूजा हुई और दुलारी ने चट से मोम वाले दीये जला कर रख दिए। फिर कंप्यूटर खोला गया, कैमरे को सैट किया गया। उधर जैसे मां इंतजार ही कर रही थीं, घर की सजावट देख कर वह बहुत खुश हुर्इं। बड़ी दीदी, अमन जीजाजी सभी भारत के इस रोशनी के त्योहार को देख कर अभिभूत थे। शायद मां की आंखें कंप्यूटर की छोटी-सी स्क्रीन पर कुछ तलाश रही थीं। उन्होंने पूछ ही लिया, ‘दुलारी बेटा दीये नहीं दिख रहे हैं?’ सुनते ही कन्हैया ने सिर पर हाथ रख लिया, ‘हे भगवान, इतना सजाया और ये हैं कि अभी भी मिट््टी के आउट डेटेड दीये के पीछे पड़ी हैं।’
‘नहीं मां, वह देखो दरवाजे के पास, दीया रखा तो है!’ दुलारी ने इशारा किया।
‘लेकिन वह तो मोम वाला लगता है?’ मां ने पूछा।
‘ मां… आप भी! अरे दीया तेल से जले या मोम से, उजाला तो हो रहा है न!’ दुलारी ने कहा।
अगले दिन दीवाली की धूम थी। लोगों का घर पर आना-जाना। शाम को जैसे ही पूरा घर पूजा करने बैठा, दरवाजे की लड़ी में एक-दो रंग ने काम करना बंद कर दिया। सभी ने सोचा चलो ठीक हो जाएगा। अभी गणेश-लक्ष्मी की मूर्तियां उठाई ही थीं कि सारे घर की बत्ती गुल हो गई। यह क्या? इनवर्टर भी काम नहीं कर रहा है। पापा ने मीटर के पास फ्यूज को खटपट किया, लेकिन अंधेरा दूर नहीं हुआ।
कन्हैया ने तत्काल बिजली वाले को फोन लगा दिया। ये क्या! उसने फोन उठाया नहीं। कन्हैया को गुस्सा आ रहा था। पापा बोले, ‘इसमें गुस्सा करने की क्या बात है? बिजली वाला भी तो त्योहार मना रहा होगा!’
मोम के दीयों में पूजा हो गई। लेकिन पचास दीयों का मोम घंटे भर में चुकने लगा। बच्चों को याद आया, मां ने कहा था कि पूजा के बाद एक दीया सुबह तक जलना चाहिए। एक तरफ घर पर अंधेरा छाने का खतरा, दूसरी तरफ पूजा की परंपरा की चिंता। दोनों बच्चों की यह हालत देख कर भी पापा मुस्कुरा रहे थे और इससे कन्हैया को खीज आ रहा थी। लेकिन दुलारी कुछ-कुछ समझ गई।
वह दौड़ कर रसोई में गई, पापा के लाए पैकेट को ऊपर अलमारी से निकाल लाई। उसमें से निकले गेरू से पुते लाल दीये और बड़ा सा बंडल रूई का। बड़े से दीये में घी भरा गया, रूई से बत्ती बनाई और पूजा वाली जगह का अंधेरा दूर हो गया। दुलारी जब बड़े से थाल में दीये सजा रही थी, कन्हैया भी पहुंच गया। ‘ये… ये कहां से आए? हम तो लाए नहीं थे?’
दुलारी ने पापा की ओर पलकें उठा दीं। अब कन्हैया की आंखें झुकी हुई थीं। भाई-बहन ने रूई से जल्दी से लंबी वाली बत्तियां कातीं। कुछ मिनट में ही घर का हर कोना जगमग कर रहा था। जहां लगता तेल कम है, दोनों में से कोई आकर दीये में तेल भर देता। चारों तरफ बिजली की चकाचौंध और उसके बीच हवा की लय के साथ नाचते दीयों की रोशनी।
पटाखे चलाना तो तीन साल पहले ही छोड़ चुके हैं। सो, बालकनी में खड़े होकर दीयों की लौ के साथ बातें करना बेहद सुहावना लगा रहा था। मां को कंप्यूटर पर यह दृश्य दिखाया, लेकिन यह नहीं बताया कि बिजली खराब है। वह बहुत खुश थीं कि उनकी गैरमौजूदगी में बच्चों ने परंपरा का पालन भली प्रकार किया।
पापा ने बच्चों को खील-बताशे, मिठाई खाने को बुलाया। पापा बोले, ‘दीवाली के मायने हैं अपने चारों ओर का अंधेरा मिटाना। मिट््टी का काम करने वाले कुम्हार के घर पर, तेल निकालने वाले के मकान पर, कपास बोने वाले किसान के खेत पर, तभी दीये जल पाएंगे जब हम पारंपरिक रूप से दीयों से प्रकाश करेंगे।’
‘और पापा हम हर साल एक दिन एक घंटे रात में बिजली बंद कर ऊर्जा बचत और पृथ्वी बचाने का जो संकल्प लेते हैं वह क्यों नहीं दीवाली की रात को ही हो! हजारों दीये, उससे हजारों लोगों को रोजगार और साथ में लक्ष्मी-गणेश-सरस्वती का स्वागत भी।’
-पंकज चतुर्वेदी

