वे लौट रहे हैं
वैसे ही जैसे साइबेरिया से आए पक्षी
लौटते हैं मौसम बदलने के बाद
अपने घर

वे लौट रही हैं
वैसे ही जैसे दिन भर धूप में उड़ने के बाद
लौटती हैं चिड़ियां
धुंधलके शाम में
अपने घोंसले की ओर

वे सोच रहे हैं
कहां लौटें?
पूरी जिंदगी बिता दी उन्हें संवारने में
देश का अर्थ समझाने में कि
धरती का अर्थ मिट्टी नहीं होता
पानी का अर्थ नदी या तालाब नहीं
न ही आसमान का अर्थ होता है ऊंचाई

क्योंकि उन्हें पता है
धरती का अर्थ होता है अन्न
पानी का अर्थ होता है जीवन
और आसमान का अर्थ होता है
इस दुनिया में थोड़ी सी जगह

वे लौट रहे हैं
वे लौट रही हैं
वे उदास हैं
उदास आखों में है गोरख के स्वर्ग से विदा होने का दुख
दुख जिसे बांटा था शशि, बाला, साकेत, सतीश,
शमीम ने

उन सभी अनगिनत साथियों ने कि
बनाएंगे पूरी धरती को स्वर्ग
जहां पूरा होगा अपना सपना
नहीं होगा दुख
किसी स्वर्ग से विदा होने का
पूरी दुनिया होगी स्वर्ग

साथियो, स्वर्ग कहीं आसमान में नहीं होता
होता है इसी धरती पर
जहां रोज खिलते हैं बांस के फूल
खेतों में लहलहाती है धान की बालियां
खिलते हैं नव उदास चेहरों पर
सूरजमुखी के फूल
नदी की निनाद में गूंजती हैं
हवाओं की बहती हुई ध्वनियां
अमृत यहीं है
जीवन और मरण भी यहीं है
यहीं है प्राण इस धरती का
सब कुछ यहीं है

वे आएंगे एक बार फिर
वे लौटेंगी दुबारा
उदास आंखों में फिर होगी चमक
चारों तरफ खिलेंगे लाल, पीले बोगनबेलिया के फूल
पेरियार के गुलमोहर से फिर झरेंगे लाल पत्ते वाले फूल
फिर से ढाबों पर होगी
चाय के साथ दुनिया भर की बहसें
सिमट आएगा पूरा ज्ञान इस धरती का

वे फिर बनाएंगे रोज
एक नई दुनिया
तैरेगी आंखों में फिर से एक नई चमक
उनकी मुट्ठी में फिर होगी
पूरी कायनात
फिर खिलेंगे अरावली की पहाड़ियों पर पुटूस के फूल
अलसाया सूरज फिर से उठ खड़ा होगा
उसके पांवों में फिर से होगी
धरती को बांधने की धमक
समुद्र को समझाने की ललक
कि दुनिया ऐसे ही चलती है
ऐसे ही भागता है मन
स्मृतियां ऐसे ही रचती हैं संहिताएं

देवेंद्र चौबे