अंजू शर्मा

कुछ क्षण किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रहा बसंत, पर मां की दवाई, आटे का खाली डिब्बा, बहन का फटा कुर्ता, एक साथ कितनी सारी चीजें आकर चेतावनी पर सवार होने लगीं। चेतावनी का स्वर उनसे जूझते हुए मंद पड़ने लगा। मंद और मंद… और मंद और फिर चेतावनी शांत हो गई। अब वहां कोई स्वर नहीं था। कुछ था तो बस पचास का वह नोट और बसंत की चौड़ी हो गई आंखें।

फटने के समय ही निकल जाता है बसंत घर से, पर आज थोड़ा लेट हो गया। सड़क पर थोड़ी बहुत आवाजाही शुरू हो चुकी थी। शुक्र है कि झाड़ू लगनी अभी शुरू नहीं हुई थी, वरना उसकी किस्मत पर भी फिर जाती झाड़ू। उसने सड़क पार की और मुख्य सड़क से अंदर वाली छोटी सड़क पर आ गया था। किनारे पर पड़ी दो बोतलें इसका कारण थीं, जिन्होंने दूर ही से उसका ध्यान खींच लिया था। उसने दौड़ कर दोनों बोतलें और उससे आगे पड़ी पन्नी और कुछ कागज उठा कर कंधे पर लटके अपने कद से भी बड़े प्लास्टिक के झोले के हवाले किया और आगे बढ़ गया।

उसके कोहनी और घुटने में अब भी दर्द है। उसे याद आई कल रात की वह घटना। मां की दवाई तीन दिन से खत्म थी। पूरे दिन भटकने पर भी थोड़ी पन्नियों और कागज के अलावा कुछ खास हाथ नहीं लगा, तो वह बाजार चला गया था। वहां लगने वाला साप्ताहिक शुक्र बाजार उस जैसे लड़कों को मालामाल कर देता है, उसने सुना था हरीश से। हरीश, उसके साथ कूड़ा बीनने वाला उसका हमउम्र हमपेशा लड़का, जो अपने अनुभव के चलते अब वरिष्ठ की श्रेणी में आ गया था। हरीश उसकी तरह किसी परिवार से नहीं जुड़ा था। उसके ही शब्दों में वह ‘सड़क पर पैदा होया मैं… बोले तो लावारिस, जिसका कोई वाली-वारिस ई नई।’
पर बसंत लावारिस नहीं था। उसके पीछे दो और पेट लगे थे। बाजार में पीछे बचे ‘माल’ का अंबार लगा होता है। जो लोगों के लिए कूड़ा-करकट, भंगार या कबाड़ है, उसके लिए वही माल है, रोजी रोटी है। लालच ने घेर लिया था बसंत को, उससे भी अधिक रोजी की चिंता ने।
‘उधर जाने का नई रे बसंत। अपना इलाका नई है। हाथ लग गया तो साबुत नई बचेगा रे।’ हरीश बोलता था।
लालच बड़ा था, क्योंकि भूख बड़ी थी। जरूरत उससे भी बड़ी। पांच मिनट में आधा झोला भर गया था, इतनी पन्नी, कागज, बोतल, प्लास्टिक मिले थे बसंत को बाजार उठने के बाद। झूम गया था उसका मन, पर वही हुआ जिसका डर था। लालच की सजा मिलनी थी, मिली भी। आ गया था एक को नजर। उसकी एक हुंकार पर पूरा गैंग जमा हो गया। खूब मार पड़ी। वह बेतहाशा भाग निकला वहां से। झोला तो पहले ही छीन लिया गया।
जब दूर आकर रुक कर सांस ली, तो अहसास हुआ। होंठ बगल से कट कर सूज गया था। वहां छलछला आए खून को उसने बाजू से पोंछ लिया था। मुंह में रक्त का नमकीन स्वाद घुला, तो उसने जोर से थूक दिया।
दार्इं कोहनी, बायां घुटना भी छिल गया था। कंधे में भी तेज दर्द था। रात भर कराहता रहा। रंजू ने हल्दी की सिंकाई की, तो कुछ आराम मिला। कब नींद आई, कुछ पता नहीं।
रंजू उसकी बड़ी बहन है। सड़क पर हुए एक हादसे में उसका एक पैर कट गया। हंसती-खेलती रंजू के साथ अब सहेलियां नहीं बैसाखी थी। जिन कोठियों में काम करती थी सब जाता रहा। अपाहिज लड़की को कौन काम देगा। मां तो पहले ही फेफड़े की बीमारी से लाचार हो चुकी है। बाप कभी होगा, पर बसंत ने उसका चेहरा तक नहीं देखा। उसके जन्म से पहले ही लापता हो गया कहीं। यह भी नहीं मालूम कि है या नहीं। होता भी तो कुछ फर्क नहीं। सड़क बनाने के काम में बेलदारी करता था, पर नशेड़ी था एक नंबर का… मां बताती है।
एक बड़ा भाई भी है, जो नशे की लत के कारण घर कम आता है। उसके साल के चार महीने चोरी-चकारी या उठाईगिरी में बीतते हैं और बाकी आठ जेल में। उससे छोटी एक बहन डेंगू का शिकार होकर ऊपर पहुंच गई, सीधे भगवान के पास। सबसे छोटा वही। जब तक मां-बहन कोठी का काम करती रहीं, हालात इतने खराब नहीं थे। पर अभी तो सब भगवान नहीं बसंत भरोसे।
आठ साल की उम्र में कौन काम देगा। एक बार लगा था एक होटल में। मालिक दिन निकले से आधी रात तक जम कर काम कराता था और पगार में से आधा काट लेता था- यह टूटा वह टूटा बोल कर। उसकी उम्र के चलते काम मिलना मुश्किल है। कानून का डर है सबको। उसको अब यह काम ही जमता है। यह माल बटोर कर इदरीस चचा को बेच देता है। गुजारा चल रहा है, पर एक-दो दिन माल न मिले, तो फाके के नौबत आ जाती है। पन्नी, गत्ता, कागज खूब मिलता है उसे। कभी किस्मत साथ दे, तो अच्छा कबाड़ भी हाथ लग जाता है। जैसे कोई ट्यूबलाइट की खराब पट्टी, कोई पुरानी मशीन, कोई खराब इलेक्ट्रॉनिक सामान। और कोई कोई दिन ऐसी चोट देकर जाता है कि कई दिन गुजर जाते हैं उससे उबरने में।
एक बार तेजाब से हाथ जल गया बैटरी फटने से, तो एक बार पैर कट गया था ब्लेड से। ‘ये लोग इतना खराब कचरा क्यों फेंकते हैं मां।’ उसके मासूम सवाल अब रोजी रोटी के बड़े प्रश्नचिह्न की छाया में गुम हो चुके हैं। जैसे वह गुम हो जाता है कचरे के ढेर में। जो कचरा सभ्य लोगों के दिल में जुगुप्सा जगाता है उसके चेहरे पर चमक ला देता है।
कल रात की चोटों ने उसकी गति को धीमा कर दिया था, पर रुक नहीं सकता बसंत। उसे चलते रहना है।
‘कल का दिन साला खराब गया, तो आज तो कुछ न कुछ जुगाड़ भिड़ाना ही है।’ वह सोच रहा था। उसके साथ के लड़के हाथ की सफाई दिखाने से भी बाज नहीं आते। पर बसंत चोरी-उठाईगिरी नहीं करेगा। बड़े भाई जैसा नहीं बनना उसको।
‘रे छोरा, पाम बचा के…’ सामने से आती वृद्धा ने जोर से चेताया, तो उसके साथ आता बच्चा ऐसे चिहुंका, जैसे कोई सांप-बिच्छू देख लिया हो। बसंत के चेहरे पर इस अकस्मात घटना से मुस्कान अभी फैलने ही को थी कि उसके होंठ के दार्इं ओर का हिस्सा दर्द की घोषणा करते हुए हड़ताल कर बैठा। दर्द की एक तेज लहर उसके चेहरे से उठी और पूरे जिस्म में फैल गई।
आदतन दर्द को दरकिनार कर, उसने आवाज की दिशा में देखा, तो उस खाली चौराहे पर उसकी नजर खींच लेने को पर्याप्त था कुछ, जो जमीन पर पड़ा हुआ था। चंद कदम आगे बढ़ाने पर वह ‘पड़ा हुआ’ रखे हुए में तब्दील होने लगा। क्या है यह सब?
दूर से यही दिखा कि एक फूटी हुई मटकी पर कुछ पड़ा है। बसंत ने थोड़ा और आगे जाकर देखने की कोशिश करनी चाही। इसी बीच उसने नोट किया कि दो और महिलाएं वहां से गुजरीं, तो उस ‘कुछ’ से बचते-बचाते कुछ बड़बड़ाते हुए निकलीं।
‘बेड़ा गर्क हो इनका… सुबह सुबह… पता नहीं कौन सत्यानाशी फेंक गई।’ महिलाएं उसके करीब से गुजरीं तो बड़बड़ाहट को शब्द मिल चुके थे।
अब बसंत इतना करीब तो आ चुका था कि वह साफ-साफ देख सके कि वह ‘कुछ’ दरअसल है क्या? दिन अभी निकल ही रहा था और उस समय एकाध साइकिल पर जाते छात्रों के अलावा केवल अलसुबह मंदिर जाने वाली महिलाएं ही वहां से गुजर रही थीं। बसंत ने पास आकर देखा- चौराहे के ठीक बीचोंबीच एक फूटी हुई मटकी से थोड़ा छिटक कर गिरी एक लाल कपड़े की छोटी-सी पोटली और कुछ महिलाओं के सिंगार का सामान। बसंत ने गौर से झुक कर देखा तो पाया…
‘हम्म… एक काजल है डंडी वाला, एक तेल की सीसी है खसबू वाली, एक दो तीन चार पांच… हम्म पांच लाल लाख की चूड़ियां हैं… नहीं कड़ा… नहीं चूड़ी… एक मुंह देखने का सीसा, एक कंघी और एक खसबू वाला साबुन… और वो लाल डिब्बी में क्या… सिंदूर?’ सबसे अधिक ध्यान खींच लेने वाली चीज थी- वह पचास का नया नकोर नोट और एक रुपए का सिक्का, जिसने बसंत को अधीर कर दिया।
‘ऐ छोरा, दीखे ना है… टोना है…’ एक और मंदिर जाती महिला ने उसे चेताया, तो बसंत सीधा खड़ा हो गया। उसके जाते ही उसने फिर झुका कर देखा। टूटी हुई मटकी के एक हिस्से पर अंदर की ओर सिंदूर या रोली से पांच लाल टीके काढ़े गए थे, तो दूसरे पर पांच टीके काजल से काढ़े गए थे।
‘टोना’ शब्द सुनते ही वह सिहर उठा। इस सिहरन का सिरा जाकर उन डरावनी कहानियों से भी मिलता था, जो मां से सुनी थी उसने। हर कहानी से जुड़ी चेतावनी बसंत को याद आने लगी। मां ने हमेशा ऐसी चीजों से बच कर रहने की बातें कही। यह कैसा टोना है? लाल कपड़ा, सिंदूर, कटा नीबू तो वह कई बार देखता था और कतरा कर निकल भी जाता था। पर टोने में यह सिंगार का सामान किसने रखा!
‘छुइयो ना, बस दूर से निकल जइयो छोरा, जो कहीं टोना दीखे। भूत चिपट जावे। यूं पट से मर जावे जो छू ले।’ अवचेतन में मां के शब्द गूंजे, तो बसंत के रुके हुए कदम आगे बढ़ गए। पर आगे तो बढ़ा ही नहीं जाता था। एक-एक कदम जैसे एक मन का होता जाता था।
‘उठा ले बसंत… पचास का नोट है… सारे दिन का खर्चा निकल जाएगा। कल भी खाली गया।’ मन के भीतर छिपे किसी चोर ने ललचाया।
‘ना… टोना है। छुइयो मत छोरा…’ मां की चेतावनी ने पीछा नहीं छोड़ा।
कुछ क्षण किंकर्तव्यविमूढ़ खड़ा रहा बसंत, पर मां की दवाई, आटे का खाली डिब्बा, बहन का फटा कुर्ता, एक साथ कितनी सारी चीजें आकर चेतावनी पर सवार होने लगीं। चेतावनी का स्वर उनसे जूझते हुए मंद पड़ने लगा। मंद और मंद… और मंद और फिर चेतावनी शांत हो गई। अब वहां कोई स्वर नहीं था। कुछ था तो बस पचास का वह नोट और बसंत की चौड़ी हो गई आंखें।
बसंत ने दौड़ कर पचास का नोट और सिक्का उठा कर जेब के हवाले किया। उसका नन्हा-सा हाथ किसी अनहोनी की आशंका से एक पल को कांपा। पीछे हटा भी, पर फिर रुक न पाया।
पैसे उठा कर वह चल पड़ा। उत्तेजना और डर से उसकी रीढ़ में सिहरन हो रही थी। उसका पूरा जिस्म थरथरा रहा था कि कुछ सोच कर वह फिर लौटा। इस बार उसने कंघा और छोटा फोल्डिंग शीशा उठा लिया। रंजू के काम आएगा। फिर एक-एक कर काजल, तेल, चूड़ियां, साबुन सब उठा लिया। सिंदूर छोड़ दिया, क्योंकि उसका बसंत के घर में कोई काम नहीं था। लाल पोटली खोल कर देखी, तो उसमें कुछ गुलगुले थे। बसंत के मुंह में पानी भर गया। उसने वह पोटली जेब के हवाले की और बाकी सामान किनारे पर पड़े एक कागज में लपेटा और आगे बढ़ चला। उसके कांपते पैर अब सधने लगे थे। अब उसे कोई डर छू भी नहीं रहा था। न डर न फिक्र, न भय न भूत। उससे निडर आज कोई नहीं था। दुनिया के सबसे बड़े डर ने उसका हर डर स्याहीचूस की तरह चूस लिया था- भूख और गरीबी।