राकेश भारतीय

आवाजें अब और तेज हो गई थीं और आते-जाते लोग बरामदे में अपने कदम दो क्षण थाम कर उन्हें सुनने का प्रयास करते, फिर आगे बढ़ जाते। इस बहुमंजिला आवासीय परिसर की बनावट में हर फ्लैट के सामने लंबे-लंबे बरामदे के फायदे भी थे, नुकसान भी। फायदा रोज के टहलने वालों को तब दिखता था, जब झमाझम बरसात होती। तब वे इस बरामदे में ही तेज-तेज चल कर अपना कोटा पूरा कर लेते थे। और नुकसान! सुबह से रात तक हर दस-पंद्रह मिनट पर कोई न कोई आपके फ्लैट के सामने से कहीं न कहीं आता-जाता रहता था। और, आज इस वक्त फ्लैट नंबर चौबीस के सामने से गुजर रहा हर व्यक्ति इसके बंद दरवाजे के पीछे चल रहे पति-पत्नी के झगड़े के बारे में जान ही गया होगा। हां, वे शायद यह न जान पाए होंगे कि उस बंद दरवाजे के पीछे कमरे के एक कोने में झगड़े के चश्मदीद गवाह दो बच्चे भी बैठे हैं, जो अपने मां-बाप के पल-पल बढ़ते जा रहे झगड़े पर बेचैन हो रहे हैं, पर फिलहाल बोल कुछ नहीं रहे हैं।

‘तू गंदी औरत, तू गंदी बीवी, गंदी गंदी गंदी…’। मुंह से फेचकुर-सा फेंकने लगे कमल चोपड़ा चीखे।
‘तू गंदा…। गंदा गंदा गंदा…’ रूही चोपड़ा की तीखी आवाज ध्वनि-प्रदूषण फैलाने में कमल को आगे न निकलने देने के लिए कटिबद्ध लग रही थी।
गंदी-गंदे विशेषणों के आदान-प्रदान के बीच लड़के अभिनव ने नोट किया कि पिता ने आज मां को ‘तू’ कह कर संबोधित किया है, जवाब में मां से ‘तू’ संबोधन पाया है।
तीन-चार महीने पहले पड़ोसी लड़के के साथ खेलते हुए अभिनव ने उसे ‘तू’ कहा ही था कि इसी पिता ने टोका था कि ‘तू’ सभ्य-संबोधन नहीं है, ‘तुम’ या ‘आप’ का प्रयोग करना चाहिए।
लड़की रुचिरा के हाथ में एक कॉपी थी, जिसका वही पन्ना अब तक खुला पड़ा था, जिस पर झगड़ा शुरू होने के समय उसने होमवर्क करना शुरू ही किया था। देर से बंद पड़ी कलम को खोल कर रुचिरा ने खुले पन्ने पर दो-तीन बार लहराया और सारे पन्ने झटके से पलटते हुए आखिरी पन्ने पर लिख डाला- इस हल्ले में होमवर्क कैसे होगा!
दूर सीमा पर तैनात अर्धसैनिक-बल के एक अधिकारी कमल दो-तीन महीने में एक बार घर आ पाते थे और इसके पहले बच्चों ने उनकी तथा एक प्राइवेट स्कूल में अस्थाई शिक्षिका के रूप में यहां कार्यरत रूही की छिटपुट नोक-झोंक ही देखी-सुनी थी। कुछ दिनों की छुट्टी में आए पिता द्वारा लाए गए उपहारों पर उनका ध्यान ज्यादा रहता था, उनको अपने स्कूल-सहपाठियों के किस्से सुनाने का उत्साह ज्यादा रहता था। मां द्वारा उनके रहने के दौरान अच्छे-अच्छे पकवान बनाए जाने का फायदा उठाने पर तो रहता ही था।
पर इस समय बच्चे सोचे जा रहे थे कि आज इनके अचानक इस कदर झगड़ने का कारण क्या है! इनके विकृत हुए चेहरों पर एक-दूसरे के प्रति इस कदर घृणा झलकने का कारण क्या है।

वैसे न अचानक कुछ हुआ था, न कारण बस कोई एक था और न ही एक-दूसरे के प्रति घृणा का भाव आज ही चेहरे पर झलका था।
हां, पहले बच्चों के सो जाने के बाद शयनकक्ष में फुफकारते हुए पति-पत्नी आवाज को भरसक एक सीमा में रखते हुए झगड़ते थे। आज उन्होंने शयनकक्ष के बाहर अपनी आवाज एक-दूसरे पर अस्वाभाविक रूप से ऊंची करते हुए प्रक्षेपित की थी।
झगड़ने के मुद्दे भी महीनों में बनते-बढ़ते रहे थे, आज सारे मुद्दों पर बतबड़ एक साथ हो रही थी।
‘वहां जान हथेली पर रख कर हम डटे रहते हैं। हर वक्त पीछे छूटे परिवार का ही खयाल…’
‘तो क्या यहां जान कम हलकान होती है! इस बेहूदे शहर में रहना ही…’ पति की बात काट कर चीखी पत्नी की भी बात कट गई और एक-दूसरे की जिंदगी को ज्यादा कठिन न सिद्ध होने देने की बतबड़ी होड़ पंद्रह-बीस मिनट तक चलती रही।
‘तो तुझे पता नहीं था शादी करते वक्त कि फौजी की जिंदगी कैसी होती है? बारह साल बाद सपना आया है?’ कमल की आवाज फिर ऊंची उठी।
‘बड़े आए फौजी बनने वाले। बाकी नहीं फौजी हैं, सारे साथवाले फेमिली-स्टेशन कब के ले चुके और ये हमें यहां छोड़ने के बहाने…’
‘मैं बहाने नहीं बना रहा।’ पत्नी की बात काट कर कमल गुर्रा उठा।
‘तो क्या बन्ना रिया?’ चिढ़ाने वाले उच्चारण से रूही ने पति को और भड़काना चाहा।
पर कमल की आंखों में एक क्षण के लिए अवसाद कौंध गया। फिर अपने को संभालकर वह बोला- ‘जानती नहीं कि अगले प्रमोशन के लिए मेरा इस पोस्टिंग पर बना रहना बहुत जरूरी है। तू फौजी की बीवी बनने लायक नहीं है, घसियारे की बीवी बनने लायक है।’
‘तू होगा घसियारा…’
‘तू होगी घसियारन।…’

पति-पत्नी ने एक-दूसरे को नीचा दिखाने वाले विशेषणों का बखान करने में अपनी-अपनी कल्पना-शक्ति का भरपूर दुरुपयोग किया।
रुचिरा ने कॉपी के एक पन्ने के शीर्ष पर लिखा- ‘मुझे तो भूख लग रही है।’ और अभिनव की ओर बढ़ा दिया। अभिनव ने इबारत पढ़ कर बेचारगी की एक मुस्कान झलकाई और वापस लिखा- ‘मुझे भी। और मुझे नहीं लग रहा कि मम्मी आज किसी को खाना देगी।’
अभिनव के वाक्य पर रुचिरा सोच में पड़ गई। और दो मिनट सोचने के बाद उसने नई इबारत अभिनव की ओर बढ़ा दी- ‘बगल वाले कमरे की मेज पर बिस्किट के तीन पैकेट पड़े हैं। नजर बचा कर लाने की कोशिश करूं?’
बहन की कॉपी हाथ में लिए-लिए अभिनव ने भाई-बहन के बैठे रहने की जगह और दरवाजे के बीच के प्रकट-संभावित व्यवधानों का जायजा लिया और किंचित अफसोस का भाव चेहरे पर लाकर अंतत: अपनी राय कॉपी पर जाहिर की- ‘कोई स्कोप नहीं। ये लोग लड़ते-लड़ते बीच की स्पेस में आ-जा रहे हैं।’
इबारत पढ़ कर रुचिरा के चेहरे पर चिढ़ गहरा गई और एक नजर अब भी एक-दूसरे पर चिल्लाते जा रहे मां-बाप पर डाल कर उसने बार्इं हथेली माथे पर ठोंकी। यह देख कर अभिनव ने दो बार अपनी हथेली बहन की ओर लहरा कर सब्र रखने का इशारा किया।
कमल और रूही के झगड़े में अब एक नया कोण उछल रहा था। रूही की अचानक उछाल दी गई टिप्पणी से तिलमिलाए कमल की बेहद आक्रामक प्रति-टिप्पणी ने जैसे आग में घी डालने का काम किया। ‘यू स्वाइन… हाऊ डेयर यू अटैक माई कैरेक्टर…’
रूही के लंबे-लंबे नाखूनों वाले हाथ कमल की दिशा में इस तरह लहराए जैसे उसका मुंह ही नोच लेने का इरादा हो।
पति की पोस्टिंग की जगह पर किसी महिला के साथ ‘लपट-सपट’ को वहां से उसके न हटने की मुख्य वजह बताने का कूट-भाषा में किया गया आक्षेप उलटा पड़ गया था, क्योंकि वैसा ही आक्षेप रूही पर कमल द्वारा किंचित कड़ी शब्दावली में जड़ दिया गया था। अवचेतन में शायद बच्चों की उपस्थिति का अहसास बने रहने के कारण कूट-भाषा तथा अंग्रेजी का प्रयोग हुआ था।

पर बच्चे न इतने छोटे रह गए थे और न ही इतने बेवकूफ। छोटी बहन पर गाली-गलौज का बुरा असर न पड़ने देने की कोशिश में अभिनव ने उसकी ओर कान बंद करने का इशारा प्रक्षेपित किया तो रुचिरा ने फिर एक बार अपनी कॉपी भाई की ओर बढ़ा दी।
खुले हुए पन्ने पर लिखा था- ‘ये लोग गाली दे रहे हैं। छी, छी।’ अभिनव का चेहरा पहले गंभीर हुआ, फिर उसने क्रोधभरी दृष्टि मां-बाप की ओर डाली। पर वहां अब रूही का मंद-मंद विलाप शुरू हो चुका था- ‘मुझे सताने वाले को भगवान सजा देंगे।… ये आदमी मुझ पर उंगली उठा रहा है।… इसे भगवान सजा देंगे…’
‘कर ले नाटक… कर ले।’ कह कर कमल ने व्यंग्य किया तो तिलमिला कर रूही ने ऊपर हाथ उठाते हुए चीत्कार किया- ‘आहररह्, भगवान!’
इस आहभरी प्रतिक्रिया को नजरदांज कर कमल ने दोनों हथेलियों को गालों पर टिकाते हुए शायद अपने-आप को किंचित शांत करने के प्रयास में मुंह गोल किया, जैसे सीटी बजाने जा रहा हो। उसकी हरकत को अनदेखा कर रूही ‘आररह्’, आररह्’ करते हुए कलपती रही।
बच्चे मां-बाप की झगड़लीला का एक-एक चरण ध्यान से देखते जा रहे थे। इस मोड़ पर बच्चों के मन में थोड़ी आशा जगी। झगड़े के मंद पड़ते-पड़ते खत्म ही हो जाने की। और इस आशा में सांस लगभग थामे हुए वे एक-दूसरे को धैर्य रखने का इशारा करते रहे। पर नहीं।… झगड़ा इस बार रूही की फुफकारने के अंदाज में की गई टिप्पणी से भड़क उठा, और क्या खूब भड़का।
‘क्या औकात थी तेरे खानदान की शादी के वक्त? बस तेरी नौकरी थी, दिखाने के वास्ते।’ रूही ने कहा था।
‘औकात! अपने खानदान की औकात देखी है? बनिया-बक्कालों ने ब्लैकमनी जमा कर लिया, यही औकात है न चोर कहीं के!…’
‘चोप्प! चोर होगा तू।…’
‘तेरा खानदान, तेरी सारी रिश्तेदारी चोर। चोरी का पैसा उड़ाने की आदत लेकर आई थी न यहां, नहीं उड़ाने को मिल रहा तो गला फाड़ रही…’
‘चोप्प, फटीचर! खबरदार जो मेरे खानदान को बुरा-भला कहा।’
‘तू मुंह बंद कर अपना, नहीं तो और बखिए उधेड़ दूंगा। समझती क्या है अपने-आप को?’
‘तू क्या समझता है?’

तू-तड़ाक का नया दौर बच्चों को नए सिरे से परेशान कर रहा था और परेशानी उनकी अंतड़ियों को कोंचने लगी भूख की वजह से पल-प्रतिपल बढ़ती जा रही थी। पपड़िया रहे होंठों की ओर एक उंगली और कुलबुलाती अंतड़ियों वाले पेट की ओर दूसरी उंगली दिखाते हुए रुचिरा ने भाई को अपनी स्थिति का संकेत भेजा। मात्र दो-ढाई फिट की ही दूरी पर बैठे अभिनव ने कोई मदद न कर पाने की अपनी मजबूरी का इजहार दोनों हाथ फैला कर किया। फिर एक तरफ झुकते हुए सान्त्वना में बहन का गाल थपथपा दिया।
पर अपनी भी कुलबुलाती अंतड़ियों के सहनसीमा के पार कुलबुलाने को उद्यत महसूस कर अभिनव अब इस विकल्प पर गौर करने लगा था कि बगल के कमरे में रखे बिस्किट तक दौड़ लगाने के बहन के सुझाव पर अमल करे।
पर उसकी सोच में भाला मार दिया रूही की चीख ने। ‘मैं सब कुछ छोड़ कर चली जाउंगी यहां से।’
उस चीख के जवाब में कमल चीखा- ‘चली जा। पर जाएगी कहां?’
‘जहन्नुम में।’

‘तेरे लायक जगह वही है।’ हिकारत से हिनहिना कर कमल ने इतना कहा, तो अभिनव के अंदर एक अजीब सा डर सिर उठा दिया। ‘क्या नौबत यहां तक पहुंच सकती है?’ मन ही मन यह प्रश्न अपने-आप से करते हुए वह चुपचाप बहन को देखने लगा।
रुचिरा का चेहरा मुरझा गया था और अब उसकी आंखें डबडबाई-सी लगने लगी थीं। यह देख कर अभिनव के अंदर के डर के समांतर, मां-बाप के प्रति क्रोध की लहर उठने लगी। बैठे-बैठे उसके पैर भी दुखने लगे थे और वह अब सोचने लगा था कि इस बेचारगी से उबरने के लिए कुछ करना ही पड़ेगा। पर करे तो क्या करे! यह झगड़ा तो रुकने का नाम ही नहीं ले रहा है! इनमें से किसी को परवाह नहीं कि घंटों से बिना कुछ खाए-पिए दो बच्चे भी यहां बैठे हैं।
क्या उठ कर बिस्किट लाए ही? पर, चंद बिस्किट काफी नहीं होंगे। इस समय तक तो खाना खाकर वे सोने भी चले जाते हैं।… और हां, सोशल साइंसेज की टीचर ने डायरी में नोट लिख कर, मां को दिखा कर उनके हस्ताक्षर के बाद लौटाने को कहा था। इस हाल में कैसे हस्ताक्षर होगा, कैसे कल टीचर को डायरी दिखाई जाएगी।… कल सारे साथियों के सामने क्लास में उसकी भद्दगी होगी। यह सोच कर ही अभिनव रुआंसा होने लगा।
पर क्या कल स्कूल जाने की नौबत आएगी! अभी तक झगड़ा नहीं खत्म हुआ है; कब वह कुछ खाएगा, कब सोएगा, कब उठेगा, कैसे सुबह तैयार होगा! …अब क्रोध की एक तेज लहर उसको आवृत्त करने लगी। बहन की सुबकी कानों में पड़ते ही क्रोध कई गुना बढ़ गया।

‘बंद कर अब यह नाटक, गंदी औरत!’ अब जाकर कमल की नजरों के दायरे में बच्चे आए तो उसने रूही से अपेक्षाकृत मद्धिम स्वर में कहा। पर ‘गंदी औरत’ के संबोधन ने रूही को और भड़का दिया, और वह चीखी- ‘चोप्प, गंदे आदमी! मेरी जिंदगी को तबाह कर दिया तूने।’ कमल अभी यह सोच ही रहा था कि क्या कहे, तभी अभिनव ने अपनी जगह से झटके से उठ कर उसकी ओर दौड़ लगा दी। ‘गंदे पापा… गंदी मम्मी… गंदे गंदे गंदे… गंदी गंदी गंदी…’ क्रोधभरी आंखों से पिता-मां को बारी-बारी से घूर कर अभिनव जितनी जोर से चिल्ला सकता था, चिल्लाया। भाई की पहल का अहसास होने में रुचिरा को दो क्षण लगे, फिर वह भी उठ कर आगे बढ़ी और रुलाई से विकृत हो रखी आवाज में बोली- ‘गंदे गंदे गंदे… गंदी गंदी गंदी… आप दोनों गंदी बातें करते हैं।’ और रुचिरा फफक-फफक कर रोने लगी। इस नई स्थिति के निशाने पर बने पति-पत्नी इतने घंटों में पहली बार एक-दूसरे की ओर बिना क्रोध या घृणा के, नजर फेंके। पर इसके पहले कि वे कुछ कहें या करें, अभिनव ने लपक कर बहन का हाथ पकड़ा और ‘चल यहां से…’ कहते हुए बाहर खुलने वाले दरवाजे की ओर भागा। रात के इस समय फ्लैट नंबर चौबीस के सामने के बरामदे से ही नहीं, तमाम अन्य फ्लैटों के सामने के बरामदे से भी गुजर रहे व्यक्तियों को एक विचित्र दृश्य देखने को मिल रहा था। दो बच्चे पूरा जोर लगा कर भाग रहे थे और उनका नाम ले-लेकर चिल्लाते हुए एक पुरुष और एक स्त्री उनके पास पहुंचने का प्रयास कर रहे थे। ०