चंद्र त्रिखा
लाहौर के एक छोटे से रेस्तरां के एक कोने में बैठा मिला था गुलाम रसूल। वह लाहौर की मेरी दूसरी यात्रा थी। पहली यात्रा के समय ही उससे मुलाकात हो गई थी। तब मैंने उससे पाकपटन के उस मकान का कोई फोटो मुझे मुहैया कराने का आग्रह किया था, जहां मेरा जन्म हुआ था। वह मुझे भाईजान कहता था। उसके अब्बा पाकपटन के थे, शायद इसलिए या फिर मेरी उम्र के तकाजे से। पहली मुलाकात में ही उसने तकाजा किया था, ‘आप तो अखबारों में लिखते हैं, क्यों नहीं उन औरतों के बारे में लिखते जो बंटवारे के दौरान वहशियत का शिकार बन गई थीं। आप लोगों ने तो यह सारा काम हमारे मंटो पर ही छोड़ दिया था। पर मंटो तो अदीब था, अखबार नवीस नहीं था। ‘तारीख के सियाह हाशिए वाले उन पन्नों को भी तरतीब मिलनी चाहिए’। मैं उसकी सोच पर तब दंग रह गया था। इस बार दूसरी दफा मिला तो भी उसने अपना पुराना इसरार दोहराया। तभी सोच लिया था कि इस बार लौटते ही यह काम करूंगा। इसी बीच मैंने इस खास मामले पर उसकी खास दिलचस्पी की वजह भी पूछ ली। उसके दिल में दबी आग बाहर आ गई।
गुलाम रसूल की मां रसूलन बी पहले रामयारी थी। लाहौर के एक मुहल्ले की रामयारी। रामयारी अपनी तीन सहेलियों के साथ उस वक्त अनारकली बाजार के एक संकरे कूचे में कुछ घरेलू सामान खरीदने आई थी। अचानक दंगाइयों का एक टोला आ पहुंचा। उन तीनों को तीन दहशतगर्दों ने उठा लिया और वे लोग कूचे से साथ सटी एक तंग गली में घुस गए। वहां से निकलते हुए वे एक हवेली में घुस गए। सहमी हुई, चीखती चिल्लाती तीनों लड़कियों को उस हवेली में पटक कर वे लोग अगले शिकारों की तलाश में फिर बाहर निकल गए। गुलाम रसूल की दास्तान लंबी थी। उसने खुद ही संक्षिप्त में बता दिया, ‘अरे भाईजान। मेरी ट्रैजेडी यह है कि मैं उस हादसे को जेहन से निकाल नहीं पा रहा। मेरे बाप चौधरी हशमत खां ने उस हवेली से ‘रामयारी’ को ‘हर्जाना’ चुकाकर ले लिया था और बाद में रामयारी, रसूलन बी बन गई। अब उस हादसे को आधी सदी बीच चली है मगर अम्मी को अभी भी वह हादसा नहीं भूलता। अम्मी ने ही एक बार बताया था कि कुछ बरस बाद उसे अनारकली बाजार में अमृतसर से आया एक पुराना बुजुर्ग मिला था। वह बुजुर्ग किसी जत्थे के साथ ननकाना साहब की तीर्थ यात्रा पर आया था। उसने अम्मी को बताया था कि मेरे ननिहाल के सभी लोग दंगाइयों का शिकार हो गए थे। मैं अब भी उस हादसे से उबर नहीं पाता। समझ नहीं आता कि ‘नफरत’ और ‘हिकारत’ का यह लावा कहां उगलूं? मां अभी भी बुढ़ापे में जब कभी घुटनों के दर्द से कराहती है तो उसके मुंह से सहज स्वभाव में ‘हाय राम’ निकल जाता है। अब्बा को यह पसंद नहीं। अब क्या करें? मां को अभी भी आयतें पूरी तरह से नहीं आतीं। मगर मुझे मालूम है, अब भी नहाते समय दबी आवाज में आपके हनुमान जी का पाठ कर लेती हैं। तुलसी का पौधा लाने का इसरार कर देती हैं। अब्बा से कह देती हैं, तुलसी के पत्तों वाली चाय पीने से बुखार नहीं आता। इस मुलाकात को एक लंबा अरसा बीत गया। दो-तीन बरस चंडीगढ़ के ही एक मित्र पत्रकार ननकाना साहब की यात्रा पर गए। मैंने उन्हें ताकीद की थी कि अपने लाहौर-प्रवास के दौरान या फिर ननकाना साहब जाकर गुलाम रसूल को फोन अवश्य करें। वह स्वयं आकर मिल जाएगा। मैंने उसी पत्रकार के हाथ कुछ मीठी रोटियां भी भेजीं। उन रोटियों को लाहौर वाले ‘रोट’ भी कह देते थे या फिर ‘मन’ भी बोल देते थे। ‘मन’ का अर्थ दिल से नहीं था। भारी वजन वाली किसी भी चीज को पुराने माप-तोल वाले ‘मन’ के साथ जोड़ देते थे। मुझे याद भी आया एक पुराना लोकगीत जिसे दोनों पंजाबों के गांवों में गाया जाता था।
उस लोकगीत का भाव था, ‘हे मेरी प्यारी मां, मेरे सात भाइयों की शादी-सगाई हो चुकी है। मगर एक भाई अभी भी ‘कुंवारा है। उसकी उम्र अभी भी बच्चों के खेल खेलने की है। उन्हीं खेलों में एक ‘वंझली’ भी है। मगर वह ‘वंझली’ कहां जाकर खेले? उसके लिए ऊंची व खुली जगह चाहिए। ऊंची व खुली जगहें तो सिर्फ लाहौर में हैं। मैंने मन भर वजन का मीठा पकवान बना लिया है अपने इस भाई के लिए जो ऊंची जगह पर खेलने लाहौर जाएगा’।
मैंने गुलाम रसूल के लिए ‘मीठी रोटियां’ भेजीं थीं। वह कई बार ऐसी रोटियों की फरमाइश अपनी मां से भी करता था, मगर मां का मन कभी उस तरह जा ही नहीं पाता था। उसका ज्यादातर वक्त पुरानी यादों में ही खर्च हो जाता था। लाहौर में गुलाम रसूल बड़े चाव से मेरे पत्रकार दोस्त से मिलने आया। मेरी भेजी गई मीठी रोटियों को उसने पहले तो चूमा, फिर माथे लगाया, फिर वहीं पर ही एक कौर तोड़कर स्वयं चाव से खाया और मेरे दोस्त के मुंह में भी डाला। मैंने अपने दोस्त से गुलाम रसूल को उसके अब्बा व अम्मी के लिए दो शॉल भी भेजे थे। उसने अम्मी का शॉल तो रख लिया, मगर अफसोस भरे लहजे में बताया कि अब्बा तो अब रहे नहीं। उनके एक बेहद अजीज दोस्त हैं डॉक्टर मनोहर लाल। वह भी उन गिने-चुने लोगों में शुमार हैं जो बंटवारे के वक्त यहीं रह गए थे। अब्बा से उनकी खूब छनती थी। अम्मी के रिश्ते से अब्बा कई बार मजाक-मजाक में मनोहर अंकल को ‘साला’ भी कह देते थे। मनोहर अंकल बुरा मानने की बजाय खुश होते थे। वैसे भी वह राखी वाले दिन मेरी अम्मी से मिलने आ जाते थे और एक चांदी का सिक्का दे जाते थे। अब यह शॉल मैं उन्हीं को दे दूंगा। अब्बा की रूह को भी तस्कीन मिलेगी। गुलाम रसूल के अब्बा की मौत का सुनकर मुझे भी बेहद अफसोस हुआ। साथ ही उसकी अम्मी की हालत के बारे में भी मेरी उत्सुकता बढ़ने लगी थी। मुझे लगता है रसूलन बी अपने खाविंद चौधरी हशमत खां को अब ज्यादा शिद्दत से याद करती होगी। व्यक्ति के जाने के बाद अक्सर ऐसे संबंधों की बुनियादें याद आ जाती हैं। रसूलन को वे पल अब भी याद होंगे जब दंगाइयों के चंगुल से छुड़ाकर वह उन्हें अपने घर ले आया था। उसे वे लम्हें भी भूले कहां होंगे जब चौधरी हशमत खां ने उसे तब तक छुआ तक नहीं था जब तक उसने खुद निकाह के लिए अपनी रजामंदी नहीं दी थी। उसने तो तब तक उसे रामयारी से रसूलन बी भी नहीं बनाया था। पिछली बार जिस दिन लाहौर गया था उससे अगले ही दिन शहीदे आजम भगत सिंह के शहीदी दिवस पर वहां एक ‘कैंडल मार्च’ का आयोजन था। ‘डॉन’ अखबार से खबर पढ़ी तो मैं भी उसी शादमान चौकन की ओर चल दिया जहां शहीदी रैली हो रही थी। शादमान चौक पुराने वक्त में उसी सेंट्रल जेल का ही एक हिस्सा था जहां भगत सिंह, राजगुरु व सुखदेव को फांसी दी गई थी। यही स्थल उन दिनों ‘फांसी घर’ कहा जाता था। अब वह एक बारौनक बाजार का चौराहा है।
वहां पर उस वक्त एक महिला नेता की तकरीर हो रही थी। उसकी तकरीर में विशेष बल इसी बात का था कि ये शहीद सांझे थे। उन्होंने जिस ब्रिटिश साम्राज्यवाद के खिलाफ जद्दोजहद की थी वह इस पूरे महाद्वीप पर काबिज था। इन शहीदों की लड़ाई भारत या पाकिस्तान की आजादी के लिए नहीं थी। वे उस वक्त पूरे मुल्क की आजादी के लिए कुर्बान हुए थे। तकरीर खत्म हुई तो मैं भीड़ को चीरकर आगे गया। मैंने उस महिला को प्रभावी तकरीर के लिए मुबारकबाद दी और अपना परिचय भी दिया। बातों-बातों में उसने बताया कि उसका जन्म भी पाकपटन में ही हुआ था। मैंने उसे अपनी फरमाइश बताई कि मुझे उस मकान की फोटो चाहिए थी जहां मैं पैदा हुआ था। वह हंस पड़ी थी, ‘जब पैदा वहां हुए थे तो पूरे पाकपटन से ही प्यार करो। एक मकान की फोटो का क्या करोगे। फिलहाल मेरे साथ फोटो खिंचवाओ बाद में मैं तुम्हें पाकपटन की फोटो एलबम भिजवा दूंगी’। उसने शाम को चाय पर बुलाया, उसी ‘टी-हाउस’ में, जहां गुलाम रसूल से मेरी मुलाकात हुई थी। मुझे अच्छा लगा। वहीं मैंने उसे भी गुलाम रसूल की बात बताई, मगर अनुरोध किया कि वह इस बारे में किसी से बात न करे, क्योंकि शहर में चर्चा आम हो जाए तो उस परिवार के लिए दिक्कतें पैदा हो सकती थीं। उसने वादा किया कि वह किसी की पारिवारिक जिंदगी में खलल डालने की कभी कोशिश नहीं करेगी। अब जब गुलाम रसूल की अम्मी के बारे में मेरी उत्सुकता बढ़ी तो मैंने कोशिश की कि अपनी इसी महिला मित्र के माध्यम से कुछ पता करूं। संयोगवश फोन भी मिल गया। मैंने उसे आग्रह किया कि गुलाम रसूल की अम्मी के बारे पता लगाए। अगले ही दिन उसने मुझे खबर दी कि रसूलन बी की हालत अच्छी नहीं थी। बेहोशी के आलम में वह चौधरी हशमत खां को पुकारती रहती थी। डॉक्टरों का भी कहना था कि उसकी जिंदगी का अब अल्लाह ही मालिक है। कुछ दिनों बाद मैंने एक बार फिर फोन मिलाया। आग्रह किया कि जब भी फुर्सत मिले गुलाम रसूल की मां के बारे पता करें। उसके बाद महीनों बीत गए। न फोन मिला, न ही कोई खबर आई। मगर मेरे जेहन में कुलबुलाहट जारी रही।
लगभग छह माह बाद हरिद्वार से एक फोन आया। फोन करने वाले ने अपना नाम लाहौर निवासी डॉक्टर मनोहर लाल बताया। मुझे एकाएक याद आ गया। गुलाम रसूल ने एक बार तब जिक्र भी किया था कि डॉक्टर मनोहर लाल का, जब मैं पिछली बार दो शाल उसके लिए ले गया था। डॉक्टर मनोहर लाल ने पहले तो उस बात के लिए शुक्रिया अदा किया कि चौधरी हशमत खां के नाम पर भेजी शाल पहनकर वह अक्सर मेरे जैसे अजनबी के लिए ईश्वर से प्रार्थना कर देते थे।
उनकी दूसरी खबर ने मुझे बेहद उदास कर दिया। उन्होंने बताया कि वह साल दो साल बाद लाहौर व आसपास के हिंदू-मंदिरों की ओर से दिवंगतों की अस्थियां लेकर हरिद्वार आते थे। इस बार जो अस्थियां लाए हैं, उनमें गुलाम रसूल की मां का अस्थिकलश भी शामिल है। उन्होंने बताया कि गुलाम रसूल ने उनसे विशेष रूप में ताकीद की थी कि यह सूचना भारत पहुंचने पर मुझे फोन पर दे दी जाए। गहरे शोक का इजहार करने के बाद मैंने उनसे गुजारिश भी कि वह अब उस परिवार के बुजुर्ग होने के नाते गुलाम रसूल का ध्यान रखें। अगले ही क्षण मेरी उत्सुकता ने करवट ली। मैंने पूछा, ‘तो क्या रसूलन बी को चिता में जलाने पर वहां कोई बवाल खड़ा नहीं हुआ?’ उन्होंने जवाब दिया, ‘नहीं ऐसा नहीं हुआ। दरअसल रसूलन बी ने अपने बेटे को मरने से पहले ही कह दिया था, पुराने संस्कारों के कारण मुझे चिता में ही जलाना बेहतर लगता है। मगर मैं यह नहीं चाहती कि मेरे किसी भी ऐसे फैसले से चौधरी हशमत खां सरीखे नेक इंसान की रूह को तकलीफ पहुंचे। इसलिए मुझे भी उनके करीब ही दफनाया जाए। लेकिन मुमकिन हो तो उस कब्र की मिट्टी का कुछ हिस्सा गंगा में बहा दिया जाए ताकि मेरी मुक्ति हो जाए।’ यह बताते-बताते डॉक्टर मनोहर लाल की आवाज भी भर्राने लगी थी और मेरी आंखें भी बरबस नम हो आर्इं। मुझे इस बात पर भी फख्र हुआ कि मेरे दोस्त गुलाम रसूल ने अपनी मां की अंतिम इच्छा का बेहतरीन ढंग से सम्मान किया था।

