क्षितिज यहां
जिसे सभी चाहते हैं
मैंने भी चाहा था आसमान! चाहने पर
थोड़ा और आसमान हो गया।
मैं जिसे जमीन पर होकर आसमान समझता रहा
वह तब तक आसमान ही बना रहा लेकिन मैं
जमीन था तो जमीन ही रहा हालांकि,
आसमान की ललक खत्म नहीं हुई।
वहां आसमान तक पहुंचने का मन ही मन अभियान जारी रहा, किंतु विचित्र है कि जब मैं आसमान में पहुंच गया तो यही धरती, जो मेरे पास रहती थी अब बहुत दूर और उतनी बहुत सुंदर नहीं दिख रही थी।
यह क्या हो गया मुझे आसमान में?
ज्यादा टिक नहीं सकता क्योंकि वहां
रहने की जगह नहीं है।
आकाश कोई गांव, घर और लोग नहीं है।
धरती पर ये तो सभी कुछ हैं और इतने-इतने दिनों से,
युग-युग से हैं। जन्म से अब तक मैं भी तो।
इन्हें पराया करके मैंने यह क्या किया?
आसमान ने रखा नहीं, क्योंकि उसके पास
इंसान रखने की जगह नहीं थी।
और आह! धरती मैंने खुद छोड़ी थी!
लेकिन वही जिसे मैं छोड़ कर गया था,
लौट कर गिरा तब, उसने मुझे यों रख लिया जैसे
उसे मैंने छोड़ा ही नहीं था। उसे तो इसका तनिक भी
मलाल नहीं था कि मैं उसे छोड़ गया था।
ठीक वैसे ही जैसे बिना बताए, बिना मां को पूछे छोड़
कर चला आया था गांव से एक बार!
और जब मां के पास लौटा, मां झटपट घैलची से भर
लुटिया ठंडा जल हाथ में देते हुए चिंता करने लगी-
‘धूप थोड़ी बिता कर ही आए होते बच्चा।’
धूप में सूखते धनिया जैसे सुवासित आंचल से
मेरे ललाट पर के लुढ़क रहे पसीने को पोंछा और लपक
कर घरेलू पंखा तलाशने गई कि मेरे माथे पर झलेगी।
हरेगी मेरे संताप, सफर की थकान,
निराशा की मेरी रात।
रात को वही ले गई सबेरा तक।
तब बड़े अदब और एहतियात से आकाश
सूरज को क्षितिज पर उतार रहा था।
ऐन मेरी बस्ती के आगे।
उतनी-सी जगह में
मिट्टी थी, पानी था, आग थी,
आकाश था, और आवश्यक हवा!
ये सब एक थाली भर अंगनई में पूरे वजूद में थे।
डेढ़ कोठरी, हम तीन भाई, तीन बहनें,
हमारी जननी थीं।
घैलची, बस्ता रखने की तख्ती, हम सबके लिए
अपनी-अपनी सांस लेने की जगह थी।
घुटन शब्द से कोई परिचय नहीं था।
बहुत छोटी खिड़कियों से बहुत प्रकाश आता था।
आधी कोठरी के एकांत को भी लेता था अपनी जद
में जहां यक्ष्मा ग्रस्त बड़ी दीदी
अब तब के हाल में फर्श पर मामूली बिस्तर में पड़ी रहतीं।
बर्तन धोते-धोते बीच-बीच में दीदी को पूछती हुई
जरा-सी ऊंची मां की आवाज थी-
‘कुछ चाहिए तो नहीं नीलम? बस चुटकी भर। मैं आई।’
उस उतनी जगह में बीमार का नाम- सबसे नीरोग
संबोधन था।
मुक्ति के लिए उत्कंठित, सचेष्ट
गरीबी की शांत गुलामी
आज से कितनी भिन्न थी।

