सदानंद शाही
मैं सोचना चाहता हूं
मैं सोचना चाहता हूं
पर
सोचने से डरता हूं
सोचना मुश्किल में न डाल दे
यही सोचता रहता हूं
मेरे चिकित्सक ने कहा है कि
इन दिनों
सोचना मुनासिब नहीं है स्वास्थ्य के लिए
अब मुश्किल यह है कि
जिस बात की मनाही हो जाती है
वही करने का जी होता है
चीनी मना हो तो मिठाई खाने का दिल करे
नमक मना हो तो नमक
बीबी बच्चों की नजर बचा कर
थोड़ा-बहुत हाथ साफ कर लेते हैं
आज मेरा मन सोचने का कर रहा है
तो भाई डॉक्टर जी
रोक सकें तो
रोक लीजिए
मैं थोड़ा सोच रहा हूं।
नागरिकता
मैं कविता की दुनिया का स्थायी नागरिक नहीं हूं
मेरे पास नहीं है इस दुनिया का ग्रीन कार्ड
कविता की दुनिया के बाहर
इतने सारे मोर्चे हैं
जिनसे जूझने में खप जाता है जीवन
इनसे न फुरसत मिलती है, न निजात
कि कविता की दुनिया की नागरिकता ले सकूं
इसलिए जब तब
आता जाता रहता हूं
कविता की दुनिया
बस पर्यटन है मेरे लिए
न कोई चुनौती
न कोई मोर्चा
न ही कोई किला
जिसे जीतने की बेचैनी हो
छुट्टियों में आता हूं
बेपरवाह घूमता हूं
थोड़ी-सी हवा
थोड़ा-सा प्यार
थोड़ी-सी भावुकता
बटोर कर रख लेता हूं
जैसे ऊंट भर लेता है अपने गुप्त थैले में
ढेर सारा पानी
फिर लौट जाता हूं वापस
उसी दुनिया में
जहां छोटे-छोटे मोर्चे
इंतजार करते रहते हैं
जैसे बछड़े
गायों के लौटने का इंतजार करते हैं।
काले में दाल
दाल में कुछ काला है
दाल में काला क्या है
दाल में काला क्यों है
दाल पीली होगी तो
उसमें काला होगा ही
दाढ़ी होगी तो
उसमें तिनका होगा ही
दाढ़ी और तिनके का संबंध
चोली और दामन का है
अब दाढ़ी उनकी हो
या मेरी
तिनके फंसेंगे ही
दाढ़ी अपना काम करेगी
तिनके अपना काम करेंगे
दाढ़ी में फंसे तिनके
दाल को स्वास्थ्य के लिए हानिकारक बताएंगे
और
बुद्धि को मनुष्य के लिए
मुहावरे शीर्षासन सीख रहे हैं
मुहावरे नए अवतार में
प्रकट हो रहे हैं
दाल में काला नहीं
काले में दाल है
दाढ़ी में तिनका नहीं
तिनके में दाढ़ी है
इसलिए चिंता केवल दाल की न करें
दाढ़ी भी चिंता का विषय हो सकती है…। ०

