डिक्टेटर

तुम्हारी निर्मिति
तुम्हारी प्रकृति
तुम्हारे आत्म के
किसी नामालूम कोने में
अंधेरे के रक्तिम त्रिशूल-सा
चुपचाप बैठा है वह।

तीक्ष्ण धार वाली
लपलपाती जिह्वा के संकेत पर
सर्वात्म-नियंत्रण को सन्नद्ध।

टेक उठाता-
किसी खूनी गीत की।

मुखड़े को
बनाता भयानक।

आकर्षणहीनता की सीमा तक
विकर्षणशील-आकर्षक।

सर्वथा अनजान-
जूझते सामूहिक छंद की
निरंतर कसती घेराबंदी के
अनिवार्य प्रतिफलन-स्वरूप आसन्न-
त्रासद मृत्यु से।

डंक

बिच्छू ने डंक मारा
डंक।
आया था
अदृश्य होकर।
शैतान की तरह।
कि ईश्वर?
भांति-भांति के
वेश धरने में पटु।
मायावी।
भांति-भांति की
बोलियां बोलने में माहिर।
चाल-चलन वाली नहीं-

आनंदोत्सवी
चालें चलने में
प्रवीण।
अनैतिक आंख से
उतारता गुपचुप तस्वीर नग्न,
आत्मा की।

भुवन का
ताकतवर चौथा खंभा
कांपता।
क्या उसे फाड़ कर
निकलने वाला
नृ-सिंह?
चेतना की त्वचा
पड़ गई काली।
बिच्छू ने मारा डंक
बिच्छू ने।
सत्य के प्राण में
चढ़ रही विष की लहर।
झूठ रेंगता आ रहा
सभी दिशाओं से।
क्या तीसरा शिव-नेत्र
खींच रहा इसकी
श्वेत-श्याम प्राणवान तस्वीर?
हां,
बिच्छू ने डंक मारा।

डंक।