राजेंद्र उपाध्याय
पिता
पिता हर चीज ताले में बंद रखते थे
और उनकी चाबियां कहीं रख कर भूल जाते थे
जब देखो घर में चाबी बनाने वाले सरदारजी आते रहते थे
और हर ताला, हर अलमारी खोल देते थे
कुछ दिन बद फिर वह चाबी खो जाती थी
और सरदारजी आते थे
यह सिलसिला चलता रहता था।
आखिर में वे कई चीजें कई अलमारियों में रख कर
भूल गए
और उनकी चाबियां बनाने वाले सरदारजी भी कहीं
चले गए
अलमारी में से निकाल नहीं पाए पिता
अपनी जिंदगी के बचे-खुचे वर्ष।
(दो)
पिता छोड़ गए चाबियों का एक गुच्छा
हमें मालूम नहीं वे किन तालों की हैं?
जब भी कोई मुश्किल मामला आता था
पिता से पूछता उसकी कुंजी कहां है?
पिता झट बता देते थे उसका पता
अब सवाल ही सवाल हैं
मामले ही मामले,
उनकी कुंजियां खो गई हैं।
खोजना
मुझे खोज पाना उतना आसान नहीं
मैं छुप सकता हूं
पेड़ों की कंदराओं में
पीपल के अंधेरे में
कुएं के पेट में उतर सकता हूं
नदियों के, समुद्रों के किनारे चट्टानों में
गुफाओं में
एक कंजूस की जेब में
सिक्के की तरह मैं बरसों पड़ा रह सकता हूं
एक औरत के पर्स में कंघी की तरह…।
मुझे छिपने के लिए
चाहिए बस थोड़ी सी जगह
एक किताब में फूल को जितनी चाहिए उतनी
एक गमले में पत्ती को चाहिए जितनी
बादल में छिपने को चाहिए बिजली को
बस उतनी
मैं पेड़ों में गोंद की तरह
गन्ने में रस की तरह
फल में सुगंध की तरह
छुपा रह सकता हूं …
मुझे खोज पाना उतना ही दुश्वार है
जितना देह में ढूंढ़ना मौत को।
क्षण भर दुपहर
क्षण भर उस दुपहर
चले आए तीनों पहर
सुबह, शाम, दुपहर
क्षण भर को रुकी बस
मैं उतरा वह चढ़ी
चली गई
मेरे साथ ही रह गई वह छवि
वह प्रतिमा
भीड़ में खड़ी दरवाजे पर
मेरी आवाज से देखा उसने
पलट कर क्षण भर
उस दुपहर
तनिक मुस्करा कर
किया मेरे भीतर उजाला
कुछ देर
उस दुपहर
जब मैं जल्दी में वह जल्दी में
मुझे दफ्तर जाना था
उसे घर
पर दोनों कहीं नहीं गए
रह गए वहीं थिर
उस दुपहर। ०.

