भूल-सुधार

एक बहुत पुरानी संदूक में से
निकली थीं मेरे बचपन की
कुछ किताबें-कापियां
जिन्हें विस्मित होकर
देख रही थीं
मेरी अधेड़ आंखें

कि अचानक
अपनी बनाई किसी
बहुत पुरानी पेंटिंग पर
अटक गर्इं मेरी निगाहें

वहां बीच सड़क पर कड़ी धूप में
मौजूद थे बरसों के थके कुछ लोग

उनकी बोलती आंखों से
मिलीं मेरी आंखें
और स्तब्ध रह गया मैं-

‘तुम्हारी बनाई इस पेंटिंग में
कहीं कोई छायादार पेड़ नहीं
बरसों से इस भीषण गरमी में
झुलस रहे हैं हम…’

अक्षम्य भूल-
सोचा मैंने

तभी मेरी सात बरस की पोती ने आकर
बना दिए उस पेंटिंग में
कुछ छायादार पेड़
कुछ रंग-बिरंगी चिड़ियां

इस तरह
बरसों बाद कुछ थके राहगीरों को
छायादार ठौर मिल गई

चौबीस घंटों में

मैं रात की जम्हाई हूं
और सुबह की स्फूर्ति भी

पतंगें कट कर लौट गई हैं
धरती की गोद में
विजेता बच्चों के चेहरों पर हैं मुस्कानें
हारे हुए बटोर रहे हैं
बिखरी उदासी के धागे

मेरे जेहन के संगणक में
दर्ज हैं दिन के सभी प्रहर
मेरी देह साक्षी है
प्रहरों के रंगों-खुशबुओं की
स्मृति के कलश में भरे हैं
समय के अनगिनत किस्से
धीरे-धीरे सूख कर चटख हो रही है
दिन की पेंटिंग

मछली की आंखों में बसी है
आकाश की नीलिमा
समय के अथाह जल में
एक गुड़ुप-सा हूं मैं

चौबीस घंटों के अनगिनत दोहराव से
बनी दुनिया में प्रहरों को
बीतते हुए देखता हूं मैं
तैयार करता हूं अपने परों को
नई उड़ान के लिए