महेश आलोक
बसंत
पत्तियां जो अपने हरे कपड़े
किसी उत्सव के लिए बचा कर रखती हैं
पेड़ों की आलमारी में
सूखने के पहले जड़ों से कह रही हैं
पृथ्वी को शर्म से लाल तो होने दो
हम भी अपना नर्म दिल निकाल देंगे बाहर
सूरज से मोहब्बत करने के लिए
एक चित्र
तारों की बरसात जितना सौंदर्य फूटता है
उसकी पंखुड़ियों से
चंद्रमा की हिचकियों
की पूर्व संध्या पर दीपक जलाते आकाश का टूटता शरीर
करवटें लेता है
नदी की तलहटी में
झरने के साथ नीचे उतरतीं असंख्य धाराएं
अपने उजास से मथ देती हैं
भोर का समुद्र
घनघोर बारिश की एकतार बूंदों का अपारदर्शी चरित्र
अपनी सप्तपर्णी गंध से भर देता है
आत्मा की सौ प्रतिशत प्रसन्नता
पानी के बहाव जितना सुख
फूटता है उसके गुलाब से
प्रतीक्षा
वह चूल्हे में लगी लकड़ी की खुशबू में थी
उसकी आंखें लगातार सेंक रही थीं रोटियां
सुबह और शाम सूरज और चंद्रमा उतरते थे तवे पर
अपने को सोंधी खुशबू से लबरेज करने के लिए
खुशबू में पक रही है
उसकी देह
एक दस्तक की प्रतीक्षा में
हवा की चौखट पर
एक हवा बंद करती है उसकी देह की खिड़कियां
और सुनते ही मधुमक्खियों और तितलियों का संगीत
खोल देती है दस बार
एक भ्रमर दूत बजा रहा है बांसुरी
हवा की चौखट पर
टूट कर
एक बादल शहद में डूबा हुआ
वह बचाती है देह को ज्वालामुखी की
मुस्कुराहट से
भूकम्प को मित्रता करने से
रोकती है वह
सुदूर अंधेरे में जाती सड़क के अंतिम छोर
से लटके चंद्रमा के मुंह पर रख देती है
अंतत:
एक बादल
शहद में डूबा हुआ

