जितनी बार लौटता हूं

जितनी बार लौटता हूं इस जगह
हर बार यहां कुछ बंटा हुआ लगता है
पहले का पता पुराना हो जाता है
भाषा गुम हो जाती है पहले वाली

मैं जिसका दरवाजा खटखटाता हूं
वह आदमी बदल जाता है
उसके घर की दिशा से मिलाता हूं
पिछली बार का नक्शा
वह नक्शा बदल जाता है

बच्चे बदल जाते हैं
स्त्रियां बदल जाती हैं
कोई आवाज पहले जैसी नहीं रहती मिठास भरी
चाय फीकी लगती है और
चेहरा थकान से भारी

बदलना जरूरी है,
पर यह तो कुछ अलग ही है बदलना
हर जगह दीवार है
हर चीज बंटी हुई लगती है इस तरह
जैसे असंख्य टुकड़ों में बदल गया है हमारा समय

पिछली बार आया था तो आंगन बहुत बड़ा था
इस बार देख रहा हूं कि यह चार टुकड़ों में बंट गया है
यह नयापन हैरान करता है
सिहर जाता हूं भीतर तक न जाने किस भय से
प्यास लगने पर नल से पीना चाहता हूं पानी
फिर डर लगता है कि वह नाराज न हो जाए
जिसके हिस्से में है इसका पानी।

बच्चे खेल रहे हैं

वे बच्चे खेल रहे हैं
उठते हैं गिरते हैं फिर तैयार हो जाते हैं
इस में चोट लगती है
छिल जाती है देह और कभी लहू भी बहता है
फिर भी जारी है उनका खेल
वे हार मानने के लिए तैयार नहीं हैं

क्या वे बड़े होकर ऐसे ही जीतेंगे जीने की
हर मुश्किल
या फिर परास्त हो जाएंगे एक झटके में!!

न्याय की बात

मेरे हिस्से की हवा में जो जहर है
उसके लिए मैं जिम्मेदार नहीं
मेरे हिस्से का पानी नहीं रहा पीने लायक
मेरे खेत में फसल खराब हो जाती है हर बार
मेरे घर में जो शोर है वह मेरी आवाज का नहीं
मेरी दवा नकली है
जबकि इसके मूल्य में मैंने
असली रुपया अदा किया था

हद यह है कि मैं शिकायत करना चाहता हूं तो
कहा जाता है कि यह कोई मुद्दा नहीं है
अदालत में जाने के लिए

अगर यही मेरी समस्या है
तो दूसरे मुद्दे कहां से मैं लाऊं!!
धूप का निकलना
यह जो कुहासा है
दरअसल, यह एक उम्मीद है
जैसे रात भी है एक आशा

अभी हाथ को हाथ नहीं सूझेगा
पंख को पंख नहीं देगा दिखाई
अभी हर रास्ता गुम है
हर गली बंद
ट्रेन अंधेरे से आती है
और गुम हो जाती है अंधेरे में

इतना कम है तापमान कि ठिठुरता है दिन
चू रहा है ओस का पानी हर पत्ते से

सचमुच ठहर जाना चाहिए जीवन को
जम जाना चाहिए बर्फ की तरह
मगर ऐसा है नहीं

हर पहिया घूम रहा है
पृथ्वी लगा रही है चक्कर
धूप का निकलना तय है। ०