मत्स्य न्याय

हमने सुना है
पढ़ा भी था बचपन में
कानून मनुष्य के लिए गढ़ा गया था
मनुष्य कानून के लिए नहीं
जंगल में लागू है लेकिन
शेर-बकरी का कानून

एक दिन शेर ने नदी किनारे
पानी पीते-पीते
तर्क देकर धमकाया था
बकरी को
‘पानी जूठा मत कर
देखती नहीं मैं जंगल का राजा हूं’

‘मैं तो निचले घाट पर हूं महाराज
आपका जूठा पानी
पी रही हूं’
बकरी मिमियाई

सिंह ने घुड़की दी
‘तुम्हारे बाप ने कल
इसी जगह पानी पिया
और जूठा कर दिया
जिसे मैं पी रहा हूं आज’

‘वह पानी तो कल ही बह गया महाराज’
बकरी रोनी-रोनी होकर बोली

सिंह गरजा
‘देख मैं जंगल का राजा हूं
बलवान हूं
मेरा तर्क चलता है यहां
तुम बकरी हो
मैं तुम्हें खाऊंगा…’

शेर बकरी को खा गया
जंगल का कानून लागू हो गया…
मत्स्य न्याय!
साझा मुद्दा

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आओ किसी साझा
मुद्दे पर बात करें
तुम सही हो या मैं
यह सही या वह
छोड़ो इस बहस को

अपनी-अपनी नजर में
तुम भी सही थे
और मैं भी
वह भी सही था
और वह भी…!

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हम दोनों जिसे मानें
वही सही
आओ आज लड़ें
उसे ही लेकर
उनके खिलाफ
जो हमें गलत सिद्ध करके
सदियों से दबाते आए हैं
छोड़ो इस ‘लड़ाई’ शब्द का
मोह
बंद करो ये लड़ाइयां
‘हम दोनों’-
नहीं नहीं ‘हम सभी’
संग-संग चलें
मिल कर कुछ करें! ०