हवा और पानी के बिना आदमी जिंदा ही नहीं रह सकता, यह बात सच है। मगर जीवन को टिकाने वाली चीज तो खुराक ही है। अन्न मनुष्य का प्राण है। खुराक तीन प्रकार की होती है- मांसाहार, शाकाहार और मिश्राहार। असंख्य लोग मिश्राहारी हैं। ‘मांस’ में मछली और पक्षी भी आ जाते हैं। दूध को हम किसी भी तरह शाकाहार में नहीं गिन सकते। सच पूछा जाय तो वह मांस का ही एक रूप है। मगर लौकिक भाषा में वह मांसाहार में नहीं गिना जाता। जो गुण मांस में हैं वे अधिकांश दूध में भी हैं। डॉक्टरी भाषा में वह प्राणिज खुराक- एनिमल फूड- माना जाता है। अंडे सामान्यत: मांसाहार में गिने जाते हैं, मगर दरअसल वे मांस नहीं हैं। आजकल तो अंडे ऐसे तरीके से पैदा किए जाते हैं कि मुर्गी मुर्गे को देखे बिना भी अंडे देती है। अंडों में चूजा कभी बनता ही नहीं है। इसलिए जिन्हें दूध पीने में कोई संकोच नहीं, उन्हें इस प्रकार के अंडे खाने में कोई संकोच नहीं होना चाहिए। डॉक्टरी मत का झुकाव मुख्यत: मिश्राहारी की ओर है। मगर पश्चिम में डॉक्टरों का एक बड़ा समुदाय ऐसा है, जिसका यह दृढ़ मत है कि मनुष्य के शरीर की रचना को देखते हुए वह शाकाहारी ही लगता है। उसके दांत, आमाशय इत्यादि उसे शाकाहारी सिद्ध करते हैं। शाकाहार में फलों का समावेश होता है। फलों में ताजे फल और सूखा मेवा अर्थात बादाम, पिस्ता, अखरोट, चिलगोजा इत्यादि आ जाते हैं।
अब जरा युक्ताहार के बारे में विचार करें। मनुष्य-शरीर को स्नायु बनाने वाले, गर्मी देने वाले, चर्बी बढ़ाने वाले, क्षार देने वाले और मल निकालने वाले द्रव्यों की आवश्यकता रहती है। स्नायु बनाने वाले द्रव्य दूध, मांस, दालों और सूखे मेवों से मिलते हैं। दूध और मांस से मिलने वाले द्रव्य दालों वगैरह की अपेक्षा अधिक आसानी से पच जाते हैं और सर्वांश में वे अधिक लाभदायक हैं। दूध और मांस में दूध का दर्जा ऊपर है। डॉक्टर लोग कहते हैं कि जब मांस नहीं पचता, तब भी दूध पच जाता है। जो लोग मांस नहीं खाते, उन्हें तो दूध से बहुत बड़ी मदद मिलती है। पाचन की दृष्टि से कच्चे अंडे सबसे अच्छे माने जाते हैं। मगर दूध या अंडे सब कहां से पाएं? सब जगह ये मिलते भी नहीं। दूध के बारे में एक बहुत जरूरी बात यहीं मैं कह दूं। मक्खन निकाला हुआ दूध निकम्मा नहीं होता। वह अत्यंत कीमती पदार्थ है। कभी-कभी तो वह मक्खन वाले दूध से भी अधिक उपयोगी होता है। दूध का मुख्य गुण स्नायु बनाने वाले प्राणिज पदार्थ की आवश्यकता पूरी करना है। मक्खन निकाल लेने पर भी उसका यह गुण कायम होता है। इसके अलावा सबका सब मक्खन दूध में से निकाल सके, ऐसा यंत्र तो अभी तक बना ही नहीं है; और बनने की संभावना भी कम ही है।
पूर्ण या अपूर्ण दूध के सिवा दूसरे पदार्थों की शरीर को आवश्यकता रहती है। दूध से दूसरे दर्जे पर गेहूं, बाजरा, जुआर, चावल कौश अनाज रखे जा सकते हैं। हिंदुस्तान के अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग किस्म के अनाज पाए जाते हैं। कई जगहों पर केवल स्वाद के खातिर एक ही गुण वाले एक से अधिक अनाज खाए जाते हैं। जैसे कि गेहूं, बाजरा और चावल तीनों चीजें थोड़ी-थोड़ी मात्रा में एक साथ खाई जाती हैं। शरीर के पोषण के लिए इस मिश्रण की आवश्यकता नहीं है। इससे खुराक की मात्रा पर अंकुश नहीं रहता और आमाशय का काम अधिक बढ़ जाता है। एक समय में एक ही तरह का अनाज खाना ठीक माना जाएगा। इन अनाजों में से मुख्यत: स्टार्च (निशास्ता) मिलता है। गेहूं सब अनाजों का राजा है। दुनिया पर नजर डालें तो गेहूं सबसे ज्यादा खाया जाता है। आरोग्य की दृष्टि से गेहूं मिले तो चावल अनावश्यक है। जहां गेहूं न मिले और बाजरा, जुआर इत्यादि अच्छे न लगें या अनुकूल न आएं, वहां चावल लेना चाहिए।
अनाजमात्र को अच्छी तरह साफ करके हाथ-चक्की में पीस कर बिना छाने इस्तेमाल करना चाहिए। अनाज की भूसी में सत्त्व और क्षार भी रहते हैं। दोनों बड़े उपयोगी पदार्थ हैं। इसके उपरांत भूसी में एक ऐसा पदार्थ होता है, जो बगैर पचे ही निकल जाता है और अपने साथ मल को भी निकालता है। चावल का दाना नाजुक होने के कारण ईश्वर ने उसके ऊपर छिलका बनाया है, जो खाने के काम का नहीं होता। इसलिए चावल को कूटना पड़ता है। कुटाई उतनी ही करनी चाहिए जिससे ऊपर का छिलका निकल जावे। मशीन में चावल के छिलके के अलावा उसकी भूसी भी बिलकुल निकाल डाली जाती है। इसका कारण यह है कि चावल की भूसी में बहुत मिठास रहती है; इसलिए अगर भूसी रखी जाय तो उसमें सुसरी या कीड़ा पड़ जाता है। गेहूं और चावल की भूसी निकाल दें, तो बाकी स्टार्च रह जाता है; और भूसी में अनाज का बहुत कीमती हिस्सा चला जाता है। गेहूं और चावल की भूसी को अकेला पका कर भी खाया जा सकता है। उसकी रोटी भी बन सकती है। कोंकणी चावलों का तो आटा पीस कर उसकी रोटी ही गरीब लोग खाते हैं। पूरे चावल पका कर खाने की अपेक्षा चावल के आटे की रोटी शायद अधिक आसानी से पचती हो और थोड़ी खाने से पूरा संतोष भी दे। दाल या शाक के साथ रोटी खाने की आदत आम है। इससे रोटी पूरी तरह चबाई नहीं जाती। स्टार्च वाले पदार्थों को जितना चबाया जाए और जितने वे लार के साथ मिलें उतना ही अच्छा है। यह लार स्टार्च के पचने में मदद करती है। अगर खुराक को बिना चबाए निगला जाय, तो उसके पचन में लार की मदद नहीं मिल सकती। इसलिए खुराक को उसी स्थिति में खाना चाहिए कि जिससे उसे चबाना पड़े, अधिक लाभदायक है।
स्टार्च-प्रधान अनाजों के बाद स्नायु बांधने वाली (प्रोटीनप्रधान) दालों इत्यादि को दूसरा स्थान दिया जाता है। दाल के बिना खुराक को अपूर्ण माना जाता है। मांसाहारी को भी दाल तो चाहिए ही। जिस आदमी को मेहनत-मजदूरी करनी पड़ती है और जिसे पूरी मात्रा में दूध नहीं मिलता, उसका गुजारा दाल के बिना न चले यह समझा जा सकता है। मगर यह भी कि जिन्हें शारीरिक काम कम करना पड़ता है और जिन्हें दूध पूरी मात्रा में मिल जाता है, उन्हें दाल की आवश्यकता नहीं है। सामान्यत: दाल भारी खुराक मानी जाती है और स्टार्च-प्रधान अनाज की अपेक्षा बहुत कम मात्रा में खाई जाती है। दालों में मटर और लोबिया बहुत भारी हैं। मूंग और मसूर हलके माने जाते हैं। तीसरा दर्जा शाकभाजी को और फलों को देना चाहिए। ताजी शाकभाजी में पत्तों वाली जो भी भाजी मिले वह काफी मात्रा में हर रोज लेनी चाहिए। जो शाक स्टार्च-प्रधान हैं, उनकी गिनती शाकभाजी में यहां नहीं की गई है। आलू, शकरकंद, रतालू और जमीकंद स्टार्च-प्रधान शाक हैं। इन्हें अनाज की पदवी देनी चाहिए। दूसरे कम स्टार्च वाले शाक काफी मात्रा में लेने चाहिए। ककड़ी, लूनो की भाजी, सरसों का साग, सोए की भाजी, टमाटर इत्यादि को पकाने की कोई आवश्यकता नहीं रहती। उन्हें साफ करके और अच्छी तरह धोकर थोड़ी मात्रा में कच्चा खाना चाहिए। ०
(‘आरोग्य की कुंजी’ से साभार)

